महाराष्ट्र हमेशा से संतों और फकीरों की धरती रहा है. शिरडी के साईं बाबा इनमें इसलिए अलग हैं कि क्योंकि वे 19वीं शताब्दी के फकीर थे और उनकी तस्वीरें ली गईं थीं. साईं बाबा की तस्वीरें बहुत कम हैं फिर भी दूसरे संतों की काल्पनिक आकृतियों के विपरीत उनकी रक्त और मांस की सजीव देह सिर्फ भारत में ही नहीं, दुनियाभर में करोड़ों भक्तों को आश्वस्त करती है.
साईं बाबा के जन्म के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं है. 1858 में एक दिन वे मुंबई से 240 किलोमीटर दूर शिरडी में एक बारात के साथ प्रकट हुए. यह जानकारी साईं भक्त गोविंद धाबोलकर उर्फ हेमादपंत की रची उनकी जीवनी श्री साईं सत्यचरित्र में दी गई है. उनका काफिला शिरडी में खांडोबा मंदिर के पास रुका जिसके पुजारी ने इस नौजवान फकीर का स्वागत साईं कहकर किया. साईं का अर्थ है संत और भगवान. यहीं से यह नाम उनके साथ जुड़ गया.
फकीर के वेश में वे एक टूटी-फूटी मस्जिद में रहा करते थे और अल्लाह मालिक के साथ-साथ भारतीय धर्म ग्रंथों का जाप किया करते थे. वे ब्रह्मज्ञान और ब्राह्मण (धर्म नहीं बल्कि ब्रह्मा के मूर्त रूप) की बातें करते थे. वे मस्जिद में अग्नि प्रज्ज्वलित रखते थे और उसकी राख प्रसाद के रूप में भक्तों को देते थे. वे चिलम पीते थे और कभी-कभी भक्तों को भी थमा देते थे.
साईं का मंत्र था, “सबका मालिक एक.” हिंदू उन्हें साईं नाथ कहते थे. यानी वे नाथ संप्रदाय के योगी माने जाते हैं जो शताब्दियों से कुंडलिनी जागरण की परंपरा का निर्वाह करते हैं. मुसलमानों के लिए वे साईं बाबा यानी ऐसे औलिया हैं जिनके पास गजब की संजीवनी शक्तियां थीं. उनकी कथा चमत्कारों से भरी पड़ी है. सबसे अधिक प्रचलित घटना वह है जब उन्होंने पानी से दीपक जला दिए थे.
साईं ने 15 अक्तूबर,1918 को समाधि ली थी. शिरडी में उनके पूजा स्थल का संचालन करने वाले श्री साईं बाबा संस्थान ट्रस्ट में 2,200 से अधिक स्थायी और 4,000 ठेके पर कर्मचारी हैं. लगभग 38,000 भक्त रोज शिरडी पहुंचते हैं.
साईं बाबा के जन्म के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं है. 1858 में एक दिन वे मुंबई से 240 किलोमीटर दूर शिरडी में एक बारात के साथ प्रकट हुए. यह जानकारी साईं भक्त गोविंद धाबोलकर उर्फ हेमादपंत की रची उनकी जीवनी श्री साईं सत्यचरित्र में दी गई है. उनका काफिला शिरडी में खांडोबा मंदिर के पास रुका जिसके पुजारी ने इस नौजवान फकीर का स्वागत साईं कहकर किया. साईं का अर्थ है संत और भगवान. यहीं से यह नाम उनके साथ जुड़ गया.
फकीर के वेश में वे एक टूटी-फूटी मस्जिद में रहा करते थे और अल्लाह मालिक के साथ-साथ भारतीय धर्म ग्रंथों का जाप किया करते थे. वे ब्रह्मज्ञान और ब्राह्मण (धर्म नहीं बल्कि ब्रह्मा के मूर्त रूप) की बातें करते थे. वे मस्जिद में अग्नि प्रज्ज्वलित रखते थे और उसकी राख प्रसाद के रूप में भक्तों को देते थे. वे चिलम पीते थे और कभी-कभी भक्तों को भी थमा देते थे.
साईं का मंत्र था, “सबका मालिक एक.” हिंदू उन्हें साईं नाथ कहते थे. यानी वे नाथ संप्रदाय के योगी माने जाते हैं जो शताब्दियों से कुंडलिनी जागरण की परंपरा का निर्वाह करते हैं. मुसलमानों के लिए वे साईं बाबा यानी ऐसे औलिया हैं जिनके पास गजब की संजीवनी शक्तियां थीं. उनकी कथा चमत्कारों से भरी पड़ी है. सबसे अधिक प्रचलित घटना वह है जब उन्होंने पानी से दीपक जला दिए थे.
साईं ने 15 अक्तूबर,1918 को समाधि ली थी. शिरडी में उनके पूजा स्थल का संचालन करने वाले श्री साईं बाबा संस्थान ट्रस्ट में 2,200 से अधिक स्थायी और 4,000 ठेके पर कर्मचारी हैं. लगभग 38,000 भक्त रोज शिरडी पहुंचते हैं.

