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सेक्स एजुकेशन को लेकर बिल्कुल भी खामोश न रहें

मिथकों को भूल जाएं. सेक्स एजुकेशन से बच्चों को कोई नुकसान नहीं, बल्कि यह उनके लिए सुरक्षा कवच है.

अपडेटेड 14 जुलाई , 2014
स्कूलों में सेक्स एजुकेशन देने के मुद्दे पर उठने वाले हंगामे पर मुझे हमेशा हैरानी होती है. आखिर कुछ लोग क्यों भड़क जाते हैं और आरोप लगाने लगते हैं कि इससे मासूमियत नष्ट हो जाएगी? मुझे लगता है कि उनकी नजर में सेक्स एजुकेशन शिक्षा न होकर बच्चों के साथ कामुक विषयों या कमोबेश अश्लील बातों पर होने वाली चर्चा है.

इसी वजह से वे हो-हल्ला मचाते फिरते हैं. लेकिन समय आ गया है कि वे जागें और वास्तविकता को जानें कि ये सारी गंदगी अधिकांश बच्चों तक महज एक बटन या माउस के क्लिक के साथ पहुंच रही है. यकीन नहीं हो रहा? तो गूगल सर्च बार में टाइप करें 'हाउ टू' और देखें कि कैसे 'हाउ टु डू सेक्स' या 'हाउ टु किस' के बेहिसाब तरीके आपके लिए परोस दिए जाते हैं.

इसलिए मिथकों के मकडज़ाल से बाहर निकलें. आज की दुनिया में यौन शिक्षा उतनी ही अहम है जितना पढ़ऩा, लिखना और गणित. अगर यह प्रस्ताव अजीब लगता है तो इन आसान सवालों का जवाब दें:

आप चाहते हैं कि आपका बच्चा अपने शरीर में हो रहे बदलावों पर शर्म महसूस करे?

आप चाहते हैं कि आपका बच्चा सेक्स से जुड़ी जानकारी पोर्न साइट से हासिल करे?

आप चाहेंगे कि आपका बच्चा इस सोच के साथ बड़ा हो कि सेक्स गंदी चीज है और बीमार मानसिकता वाले ही सेक्स के बारे में सोचते हैं?

क्या आप चाहेंगे कि आपका बच्चा यौन हिंसा का शिकार हो जाए, क्योंकि वह शायद समझ ही न पाए कि उसके ऊपर क्या गुजर रही है और उसे अपने बड़ों की मदद लेनी चाहिए.

अगर जवाब 'नहीं' है तो आपको मान लेना चाहिए कि बच्चों के लिए सेक्स एजुकेशन बेहद जरूरी है.

मेरे पति और मैंने तय किया था कि बच्चों के बड़े होने के दौरान उन्हें सहज और स्वाभाविक तरीके से सेक्स एजुकेशन दी जाएगी. हमारे पूरे परिवार की वन्य जीवन में दिलचस्पी रही है, इसलिए हमारे बच्चे बहुत छोटे से ही जानवरों की मेटिंग और ब्रीडिंग जैसे शब्दों से वाकिफ  थे. मुझे याद है कि मैं अपने चार साल के बेटे को इंग्लैंड में लाइफ साइंस म्युजियम दिखाने ले गई थी, वहां उसने बच्चों के लिए बनाए गए एक वीडियो में देखा कि कैसे एक बच्चे का जन्म होता है. उसे वह वीडियो बहुत पसंद आया और उसने सवालों की बौछार कर दी थी.

हमने आसान भाषा में जवाब दिए और वह समझ गया था. बेटी को भी हमने ऐसे ही बताया था. जैसे-जैसे वे बड़े हो रहे थे, सवालों का दायरा भी बड़ा हो रहा था और हम कोशिश करते कि उन्हें तथ्यपरक जानकारी दें. कभी-कभी उनके सवाल असहज भी कर देते थे.

स्कूलों में सेक्स एजुकेशन की शुरुआत जूनियर ग्रेड से ही होनी चाहिए. रिसर्च के मुताबिक बच्चे पिछले दशक की तुलना में अब थोड़ा पहले यौवन की दहलीज पर पहुंच रहे हैं. पहले लड़कियां 10 और 13 के बीच और लड़के 11 से 14 तक यौवनावस्था पर पहुंचते थे, पर अब वे एक-दो साल पहले ही तरुणाई पर पहुंच रहे हैं.

इसलिए बच्चों को सेक्स से जुड़ी जानकारी सही समय पर देना उनके हित में है. आंकड़ों के मुताबिक, स्कैंडिनेवियन देशों में अन्य देशों के मुकाबले किशोरों में गर्भधारण और यौन संक्रमित रोगों के मामले काफी कम पाए गए हैं. जाहिर है, इसके पीछे 10 साल की उम्र से ही बच्चों को दी जा रही व्यापक सेक्स एजुकेशन की अहम भूमिका होगी.

आखिर सेक्स एजुकेशन किस तरह दी जाए? सबसे अच्छा तरीका है कि बच्चों को लड़के और लड़कियों के अलग-अलग समूहों में बांटा जाए और उसके बाद उन्हें सेक्स से जुड़े विषय पर जानकारी दी जाए. इससे उन्हें सवाल पूछने में संकोच नहीं होगा. इसे ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए मां-बाप के लिए भी ऐसी चर्चा का आयोजन किया जाए और उन्हें भी इस विषय पर सहजता से बातचीत करने के लिए तैयार किया जाए.

शिक्षक ऐसा हो जो बच्चों के सेक्स संबंधी सवालों का सहज और सही जवाब दे सके. सबसे जरूरी है कि सीखने की पूरी प्रक्रिया बच्चों के लिए भावनात्मक तौर पर सुकून भरी हो, जहां किसी भी सवाल पर उनके बारे में कोई नजरिया न बने, न ही मजाक उड़ाया जाए.

पढ़ाए जाने वाले विषयों में लड़के और लड़कियों में हो रहे शारीरिक बदलाव, विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षण, इरेक्शन, पीरियड्स, स्वच्छता, यौन झुकाव, गर्भाधान, गर्भावस्था, जन्म, लड़के-लड़कियों में फर्क जैसे मुद्दे और साइबर दुनिया से बचाव करने के उपाय शामिल हों. किशोरों के साथ की जाने वाली चर्चा को ज्यादा दिलचस्प बनाने के लिए सिनेमा, संगीत और खेल का सहारा लिया जा सकता है.

सबसे महत्वपूर्ण यह समझना है कि अच्छा स्पर्श, बुरा स्पर्श किसे कहते हैं और यौन हिंसा क्या है? बच्चों को खुद को सुरक्षित रखने का तरीका सिखाने की जरूरत है और उन्हें यह भी बताना है कि असुरक्षित महसूस करने पर खुद को कैसे बचाएं. इसके लिए खुलकर बातें करें, चर्चा करें और खुद करके दिखाएं जब तक वे अच्छी तरह से समझ न जाएं.

महिला और बाल विकास मंत्रालय की ओर से बाल यौन उत्पीडऩ पर कराए गए 2007 के अध्ययन के मुताबिक, 53.2 प्रतिशत बच्चे यौन हिंसा का शिकार होते हैं. मीडिया में बलात्कार और यौन हिंसा के बढ़ते मामलों को देखने के बाद भी हम बाल यौन उत्पीडऩ पर खुलकर बात करने में संकोच कर रहे हैं. एक समाज के रूप में हमारी यह सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम वास्तविकता को नकारने के अपने खोखले रवैए से बाहर निकलें और यौन शिक्षा को बच्चों के पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाएं जिससे हमारे बच्चे जिंदगी का सबसे जरूरी कौशल सीख सकें.

(डॉ. शैलजा सेन चिल्ड्रेन फर्स्ट (बच्चों और किशोरों की मेंटल हेल्थ सर्विस) में चाइल्ड ऐंड एडोलेसेंट साइकोलॉजिस्ट, फैमिली थेरेपिस्ट और ट्रेनर हैं.)
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