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डार्क मोड

अपने पांव पर खड़े होने को तैयार भारत का रेशम उद्योग

चीन से आयात बढऩे की वजह से बैकफुट पर आया भारत का रेशम उद्योग फिर से अपने पांव पर खड़े होने को तैयार है.

अपडेटेड 7 मार्च , 2014
वाराणसी के टेक्सटाइल डिजाइनर श्रीभास चंद्र सुपाकर को उम्मीद है कि भारत जल्द ही विदेश से कच्चे रेशम (सिल्क) खरीदना बंद कर देगा. वे कहते हैं, ‘‘जब भी आयातित कच्चे रेशम की कीमतें बढ़ती हैं तो उसका असर घरेलू रेशम की कीमतों पर भी पड़ता है. अगर हम आयात बंद कर सकें तो यह समस्या खुद ही खत्म हो जाएगी.’’

उनकी यह इच्छा आने वाले कुछ वर्षों में पूरी होती दिखती है. भारत में रेशम उद्योग में ‘‘स्वदेशी’’ आंदोलन होता नजर आ रहा है. भारत का रेशम उद्योग दुनियाभर के रेशम उत्पादन का 15 फीसदी है. पिछले कुछ वर्षों में कच्चे रेशम का घरेलू उत्पादन करीब 30 फीसदी बढ़कर 2012-13 में 23,679 टन हो गया, जो 2007-08 में 18,320 टन था.

इस अवधि में कच्चे रेशम के आयात में 38 फीसदी की कमी आई और वह 4,951 टन पर आ गया जबकि पांच साल पहले वह 7,922 टन था. मौजूदा वित्त वर्ष में भी यही रुझान जारी है. इस वित्त वर्ष के पहले छह महीनों (अप्रैल-सितंबर 2013) में कच्चे रेशम का आयात सिर्फ 1,175 टन हुआ. भारत कच्चे रेशम का आयात मुख्य रूप से चीन से करता है.

दुनिया के रेशम उद्योग में चीन का हिस्सा करीब 82 फीसदी है. कपड़ा मंत्रालय के अधीन काम करने वाले सेंट्रल सिल्क बोर्ड के संयुक्त सचिव के.के. शेट्टी कहते हैं, ‘‘हम रेशम के आयात को खत्म कर देना और 2020 तक भारत को आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं.’’

शेट्टी कहते हैं कि घरेलू रेशम सस्ता भी है. आयातित रेशम का धागा 4,500 रु. प्रति किग्रा के हिसाब से बिकता है, जबकि घरेलू रेशम का धागा 3,500 रु. से 3,800 रु. प्रति किग्रा पड़ता है. शेट्टी के मुताबिक, भारत में हैंडलूम करीब 85 फीसदी रेशम की खपत करता है, जबकि पावरलूम में इसकी खपत महज 15 फीसदी है.

रेशम के दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता भारत ने अब बाइवोलटिन ग्रेड के कपड़े का उत्पादन शुरू कर दिया है, जिसका इस्तेमाल पावरलूम में किया जा सकता है. वे कहते हैं, ‘‘हमने रेशम के कीड़ों की नई किस्म विकसित की है, जो पावरलूमों के अनुकूल रेशम का उत्पादन कर सकते हैं.’’

बंगलुरू स्थित निर्यात कंपनी थुंगा सिल्क इंटरनेशनल और अपने पावरलूम में घरेलू कच्चे रेशम का उपयोग करने वाले थुंगा रामचंद्र का कहना है कि उनकी कंपनी अपने 68 पावरलूमों में आयातित और घरेलू, दोनों तरह के रेशम का इस्तेमाल करती है. वे कहते हैं, ‘‘हमारे कुछ विदेशी खरीदार घरेलू रेशम से बने नमूनों को देखकर अपना ऑर्डर देते हैं.’’

जहां गिरता आयात और बढ़ता उत्पादन सकारात्मक संकेत है, वहीं रेशम उद्योग को कई दूसरी चुनौतियों का सामना भी करना पड़ रहा है. भारत का रेशम आयात खर्च लगातार बढ़ रहा है. 2012-13 में देश ने कच्चे रेशम के आयात पर 1,236 करोड़ रु. चुकाए थे, जबकि पांच साल पहले यह रकम 734 करोड़ रु. थी.

इसकी वजह रेशम की कीमतों में इजाफा और रुपए की गिरती कीमत थी. रुपए के कमजोर पडऩे से देश से रेशम के निर्यात पर भी असर पड़ा है. 2008 में शुरू हुई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक मंदी से अमेरिका और यूरोप में रेशम की मांग पहले ही घट गई थी, जबकि अमेरिका और यूरोप भारत के रेशम उत्पादों के सबसे बड़े बाजार रहे हैं.

कपड़ा क्षेत्र के दूसरे हिस्सों की तरह हमारा रेशम उद्योग भी तकनीकी के मामले में अब भी पिछड़ा है. इस उद्योग का बड़ा हिस्सा पिछले दो दशकों में जहां पावरलूमों पर आधारित हो गया है, वहीं हैंडलूम के उत्पादों को भी नया जीवन मिल गया है. उत्तर प्रदेश के वाराणसी और बिहार के भागलपुर जैसे रेशम के पारंपरिक शहरों में हैंडलूम के उत्पादों को न सिर्फ देश में बल्कि विदेश में भी खरीदार मिल रहे हैं.

टोकियो में रेडिमेड कपड़ों की रिटेल कंपनी काफ्का की मैनेजर योको मत्सुमोतो कहती हैं कि वे हैंडलूम में बने रेशम के स्कार्फ और अन्य उत्पाद का ऑर्डर देने के लिए साल में दो बार वाराणसी आती हैं. वे बताती हैं कि काफ्का के वाराणसी से मंगाए जाने वाले उत्पादों की कीमत पिछले दो साल में दोगुना होकर तीन करोड़ रु. हो गई है.

मशहूर रिटेल चेन्स जैसे फैब इंडिया और रॉ मैंगो भी वाराणसी और भागलपुर से रेशम के कपड़े मंगाती हैं. भागलपुर में बुनकरों के कोऑपरेटिव के सचिव निरंजन पोद्दार कहते हैं कि उन्होंने प्रख्यात डिजाइनर सव्यसाची मुखर्जी के लिए दुपट्टे तैयार किए हैं और फैबइंडिया को भी अपने कपड़े दिए हैं. उनके कोऑपरेटिव के पास 100 से ज्यादा हैंडलूम हैं और यह साल में पांच करोड़ रु. से ज्यादा की आमदनी करता है.

वाराणसी में हैंडलूम का कोऑपरेटिव चलाने वाले अमरेश प्रसाद कुशवाहा कहते हैं कि 2000 से 2010 के बीच का समय मांग में गिरावट आने से काफी मुश्किल था, क्योंकि खरीदार पावरलूम में बना सस्ता सामान चाहते थे. हाल के वर्षों में उन्होंने फैबइंडिया के साथ काम करना शुरू किया है, जो उन्हें खास तरह के डिजाइन देता है और हैंडलूम के उत्पादों की कीमत तय करता है.

हालांकि कुशवाहा हैंडलूम पर बुनाई के भविष्य को लेकर चिंतित हैं. वे कहते हैं कि नई पीढ़ी बुनाई के काम को अपना पेशा बनाने में ज्यादा रुचि नहीं ले रही है, क्योंकि यह काफी मेहनत का काम है. उनके ज्यादातर बुनकरों की उम्र 45 से 55 साल है, जो दिन में 250 रु. से 300 रु. तक कमाई करते हैं. वे कहते हैं, ‘‘कोई भी पावरलूम पर काम करके इतनी रकम कमा सकता है और उसमें मेहनत भी बहुत कम करनी पड़ती है. मैं सोच रहा हूं कि युवाओं के लिए इसे कैसे आकर्षक पेशा बनाया जाए.’’
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