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आशा और हताशा के बीच राजीव गांधी के हत्यारों के रिहाई समर्थक

दोषियों की सजा माफ करने का हक केंद्र के पास है लेकिन वकीलों को उम्मीद है कि जयललिता कोई व्यावहारिक तरीका अपनाएंगी.

अपडेटेड 7 मार्च , 2014
सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुरुगन, पेरारिवलन और संतन की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदलने के दो दिन बाद उनके समर्थकों और तमिल राष्ट्रवादी समूहों का उत्सव जल्दी ही निराशा में बदल गया, जब सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि अगली सुनवाई 6 मार्च तक यथास्थिति बरकरार रखी जाए.

पेरारिवलन की मां अर्पुतम अम्मल ने इंडिया टुडे  से कहा, ''मैं बेहद दुखी में हूं. सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद भी केंद्र सरकार उन्हें जेल में रखने को इतनी इच्छुक क्यों दिख रही है? कोर्ट ने साफ कह दिया है कि दया याचिका पर देरी के आधार पर वह यह निर्णय कर रहा है. लेकिन अब कुछ लोग तर्क दे रहे हैं कि ये लोग निर्दोष नहीं हैं. वे अब गड़े मुर्दे क्यों उखाड़ रहे हैं?”

फांसी की सजा से बच गए दो दोषियों में से एक मुरुगन की मां सोमानी ने कहा, ''मैं अपने बेटे से मिलने के लिए बेकरार हूं. वह और उसकी पत्नी नलिनी एक साथ नहीं हैं. उनकी बेटी लंदन में कहीं है. मैं यह सपना देखती रही कि वे एक साथ हो जाएं और मैं भी उनके साथ रहूं. सब कुछ बिखर गया है, लेकिन उम्मीद की किरण अब भी बाकी है.

लेकिन इस मामले में तमिलनाडु सरकार के कदम के बारे में टीवी पर राहुल गांधी की टिप्पणी देखकर मुझे फिर चिंता होने लगी है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने मुझे फिर से अंधेरे में डाल दिया है.”

नलिनी और मुरुगन के वकील पुगझेंधी कहते हैं, ''दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 432 के तहत राज्य सरकार को यह अधिकार होता है कि यदि आजीवन कारावास के किसी कैदी ने जेल में 14 साल बिता लिये तो उसे रिहा कर दिया जाए. धारा 433 (ए) के तहत यदि मामला एक्सप्लोसिव ऐक्ट, आम्र्स ऐक्ट, टाडा या पोटा के तहत दर्ज है तो राज्य सरकार को इस पर केंद्र की राय लेनी होगी.

राज्य सरकार के पास एक और विकल्प यह है कि वह इन्हें रिहा करने के लिए राज्यपाल के अधिकारों का इस्तेमाल करे जैसा कि उसने नलिनी की सजा को घटाकर आजीवन कारावास में बदलने के लिए किया था. धारा 161 का इस्तेमाल करने के लिए केंद्र सरकार का इजाजत लेने की भी जरूरत नहीं होगी. देखते हैं कि राज्य सरकार क्या करती है.”

पुगझेंधी वेल्लूर जेल में नलिनी और मुरुगन से मिल चुके हैं. हाल के घटनाक्रम पर दोनों ने राहत की सांस ली थी. सूत्रों का कहना है कि उनकी बेटी हरिद्रा मां-बाप से मिलने के लिए लंदन से चेन्नै आ रही है और यह परिवार लंदन में बसने की तैयारी कर रहा है, लेकिन यह तमिलनाडु सरकार के सहयोग से ही हो सकता है.

जयललिता के सामने कुछ विकल्प हैं. वे 6 मार्च तक अगली सुनवाई का इंतजार कर सकती हैं. पहला विकल्प, यथास्थिति बरकरार रखनी है, इसलिए वे सभी सातों लोगों को रिहा नहीं कर सकतीं. दूसरा विकल्प, वे पेरारिवलन, मुरुगन और संतन को छोड़कर नलिनी, रॉबर्ट पायस, जयकुमार और रविचंद्रन को रिहा कर सकती हैं क्योंकि केंद्र सरकार ने पुनर्विचार याचिका में सिर्फ उक्त तीनों का ही नाम दिया है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, ''मौत की सजा के बदले स्वत: आजीवन कारावास की सजा नहीं दी जाती. ऐसी सजा को आजीवन कारावास में बदलने के लिए एक विस्तृत प्रक्रिया है जिसका लगता है कि तमिलनाडु सरकार ने पालन नहीं किया है.” सॉलिसिटर जनरल मोहन परासरन और एएसजी सिद्धार्थ लूथरा का दावा है कि राजीव गांधी हत्या मामले में दोषियों की सजा माफ करने का अधिकार सिर्फ केंद्र के पास है.

पेरारिवलन के वकील प्रभु ने फोन पर हुई बातचीत में कहा, ''उन्होंने केंद्र सरकार के ऐक्ट्स के तहत सजा पूरी कर ली है. अब उन पर धारा 302 और 120बी के तहत मामले चल रहे हैं जो राज्य सरकार के तहत आते हैं. इसलिए यह केस हमारे पक्ष में जाना निश्चित है.”

क्या तमिलनाडु सरकार सिर्फ नलिनी, रॉबर्ट, प्यास, जेयाकुमार और रविचंद्रन को ही रिहा करेगी? सूत्रों का कहना है कि कोर्ट में मामला होने के कारण जयललिता ऐसा नहीं करना चाहतीं. इसलिए 6 मार्च तक वे इनमें से किसी को भी रिहा न कर व्यावहारिक तरीका अपनाएंगी. लेकिन इन लोगों की रिहाई इतनी भी आसान नहीं होगी क्योंकि कानूनी प्रक्रिया काफी पेचीदा है.

अर्पुथम अम्माल कहती हैं कि उनकी उम्मीद अब भी कायम है. उन्होंने कहा, ''मैं मुख्यमंत्री जयललिता से सचिवालय में मिली हूं. हमारी इस मुलाकात से मुझे उम्मीद बंधी है. वह उन्हें रिहा कर देंगी.”
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