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इलाहाबाद के झूंसी में खूनी गैंगवार

माफिया के संघर्ष के लिए कुख्यात इलाहाबाद का झूंसी इलाका जमीन की लड़ाई में फिर लहूलुहान. गैंगवार और बढ़ने की आशंका.

अपडेटेड 4 मार्च , 2014
इलाहाबाद के पूरब में वाराणसी की ओर जाने वाले हाइवे के रास्ते गंगा नदी पार करते ही टाउन एरिया झूंसी पहुंच जाते हैं. तकरीबन पांच किलोमीटर आगे चलने के बाद दाहिनी तरफ एक सड़क छतनाग की ओर जाती है. इसी सड़क पर दाईं ओर 'जिला अपराध निरोधक समिति इलाहाबाद' का एक बोर्ड लगा हुआ है और उस पर सूक्ति लिखी है: 'अपराध से घृणा करो, अपराधी से नहीं. '

इसी बोर्ड के पीछे सड़क के दूसरी तरफ वह तीन बिस्वा जमीन है, जिस पर कब्जे के लिए  वर्चस्व की जंग से एक बार फिर झूंसी में खूनी गैंगवार का दौर वापस आ गया है.

कभी रेत के अवैध खनन के लिए कुख्यात संगम से दो किलामीटर दूर गंगा के किनारे बसा झूंसी अब जमीन पर कब्जे और जातीय संघर्ष के चलते वर्चस्व की जंग का केंद्र बनकर उभर रहा है. पिछले दो वर्ष के दौरान जमीन पर कब्जे और जातीय संघर्ष के छोटे-बड़े मामले मिलाकर 100 से ज्यादा मामले मुकदमों की शक्ल अख्तियार कर चुके हैं, जो इलाहाबाद के दूसरे इलाकों की तुलना में सबसे अधिक हैं.

झूंसी में पिछले एक दशक के दौरान हुए हर गैंगवार में आरोपी रहे झूंसी के छतनाग गांव के  निवासी मनोज गिरी उर्फ छुट्टन की अपराध की दुनिया में एक शार्पशूटर अपराधी के तौर पर पहचान है. उसने जैसे ही जमीन के कारोबार में अपने पांव पसारने शुरू किए, पिछले चार वर्ष से शांत रहे झूंसी में जातीय संघर्ष और गैंगवार की पटकथा तैयार हो गई.

दो साल पहले छतनाग से महमूदाबाद के पासी बाहुल्य गांव उस्तापुर की तीन बिस्वा जमीन पर छुट्टन ने अपने बाहुबल से कब्जा जमाया तो 9 फरवरी को वर्चस्व और जातीय संघर्ष की चिंगारी बड़े गैंगवार के रूप में फूट पड़ी. छुट्टन गिरी और ऋषि भारती गैंग आमने-सामने आ गए. दोनों तरफ से हुई फायरिंग में पासी बिरादरी के शंभू और हरिश्चंद्र भारती मारे गए. इसके बाद दलितों के गुस्से से झूंसी जल उठा. घरों में तोडफ़ोड़ हुई, और सरकारी गाडिय़ों और बसों को आग के हवाले कर दिया गया.

अचानक हुए इस गैंगवार और उसके बाद चारों ओर फैली हिंसा के दौर को काबू करने के लिए इलाहाबाद के पांच थानों की फोर्स लगानी पड़ी. आरोपियों पर मोटा इनाम घोषित किए जाने के बावजूद छुट्टïन गिरी और ऋषि भारती पुलिस की पहुंच से दूर हैं. इन दोनों के बीच दोबारा गैंगवार की आशंका से झूंसी में छतनाग रोड पर अघोषित कर्फ्यू के हालात पैदा हो गए हैं.
झूंझी मे मारे गए
(झूंसी में हरिश्चंद्र भारती के मारे जाने के बाद उनके परिवार में मातम का माहौल)

बालू, शराब और जमीन की जंग
झूंसी और गैंगवार का रिश्ता करीब चार दशक पुराना है. रेत और शराब के धंधे पर वर्चस्व के लिए 1973 में झूंसी के दो बड़े खनन माफिया नेपाली निषाद और तुलसी निषाद टकराए, जिसमें नेपाली की हत्या हो गई. एक साल बाद उसके  गुर्गों ने तुलसी निषाद को मारकर बदला ले लिया. इसके बाद ढाई दशक झूंसी रेत के कारोबार पर वर्चस्व की जंग का मैदान बना रहा. एक दर्जन से अधिक गैंगवार हुए, जिसमें डेढ़ दर्जन लोग मारे गए.

नई झूंसी में रहने वाले इलाहाबाद हाइकोर्ट  में सीनियर वकील एस.एस. पांडेय कहते हैं, ''बनारस के रास्ते में होने के कारण खनन माफिया गंगा-यमुना में बालू का अवैध खनन कर झूंसी के रास्ते ही पूर्वांचल के जिलों तक पहुंचाते थे, लेकिन जैसे-जैसे झूंसी में रिहाइशी कॉलोनियों का विकास शुरू हुआ, रेत के कारोबारी अपेक्षाकृत अधिक फायदे वाले जमीन के धंधे में उतर आए. ''
झूंसी में बस जला दी

सरकारी नीतियों ने बनाए हालात
झूंसी में भू-माफिया गैंग पनपने के पीछे उस सरकारी नीति का बड़ा योगदान रहा जो शहर में नुजूल की जमीन पर बढ़ रहे अवैध कब्जों को रोकने के लिए लाई गई थी. वर्ष 1998 में सरकार ने नुजूल नियमावली में संशोधन कर पट्टेदारों द्वारा नामित व्यक्ति के पक्ष में नुजूल की भूमि फ्रीहोल्ड करने का प्रावधान कर दिया और जमीन की कीमत 1991 के सर्किल रेट के अनुसार आंकी.

इलाहाबाद उत्तरी से विधायक अनुग्रह नारायण सिंह बताते हैं, ''नए कानून के बाद शहर के बीचोंबीच सस्ती नुजूल की जमीन हथियाने की होड़ मच गई. इसने शहर में नए भू-माफिया पैदा किए, जिन्होंने पैसे के बल पर गरीब पट्टेदारों से उनकी नुजूल की जमीन का अपने पक्ष में नामांकन कराया और उसके मालिक बन बैठे''  अगले दो-तीन वर्ष में जब शहर में जमीन ही नहीं बची तो इन्होंने बाहरी इलाकों का रुख किया.

झूंसी के कुख्यातबनारस हाइवे पर पडऩे वाले झूंसी में विकास की ज्यादा संभावनाओं के चलते यहां जमीन पर कब्जे के लिए भू-माफिया के बीच जोर-आजमाइश शुरू हुई जिन्होंने जमीन के दाम अचानक 20 से 25 गुना बढ़ा दिए. पासी, यादव, निषाद, कश्यप, मल्लाह, गोस्वामी जैसी जाति के लोगों को पट्टे पर खेती के लिए मिली जमीन पर भू-माफिया की गिद्घ दृष्टि लग गई. जमीन के इस चोखे धंधे पर वर्चस्व ही 2005 में झूंसी की सबसे संपन्न जाति यादव के दो गुटों में गैंगवार के रूप में सामने आया. यह जंग अब यादव, पासी और गोस्वामी जातियों के बीच केंद्रित हो गई है.

पुलिस की नाकामी
छुट्टन गिरी की अति सक्रियता के चलते एक साल पहले ही पुलिस को झूंसी में गैंगवार की भनक लगी थी. इसी वजह से गंगा के किनारे छतनाग में एक पुलिस चौकी खोली जानी थी. न तो चौकी खुली और न ही पुलिस ने झूंसी के तीन बड़े गैंग सरगनाओं पर गैंगस्टर एक्ट तामील होने के बाद भी उनकी संपत्ति पर कब्जा किया.

नतीजतन जेल जाने के बाद भी इन सरगनाओं का आर्थिक तंत्र बना रहा और वे बाहर निकलकर गैंगवार को अंजाम देते रहे. इलाहाबाद के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक उमेश चंद्र श्रीवास्तव गैंगवार रोकने में प्रशासन की नाकामी को स्वीकार करते हुए कहते हैं, ''पुलिस सभी जरूरी उपाय करेगी ताकि भविष्य में गैंगवार की दूसरी वारदात न हो सके. '' समुद्र कूप, गंगोत्री शिवाला जैसी ऐतिहासिक धरोहरों के लिए प्रसिद्घ झूंसी खूनी गैंगवार से लाल है.

पाल नरेशों और चंदेलों की राजधानी रही झूंसी पर उस बेवकूफ राजा ने भी राज किया, जिसके बारे में कहा जाता है, ''अंधेर नगरी चौपट राजा, टका सेर भाजी टका सेर खाजा. '' फिलहाल तो कानून के चौपट राज में भू-माफिया के गैंग ही इस 'अंधेर नगरी' में रौशन हैं. 
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