आंध्र प्रदेश का बंटवारा नक्शे पर उभरा एक नया आकार भर नहीं, बल्कि तेलुगु राजनीति में बवंडर पैदा करने वाली घटना है. दलबदल के इतने वाकये हुए कि गिनना मुश्किल है. यहां तक कि मुख्यमंत्री तक ने अपनी पार्टी का दामन छोड़ दिया. लेकिन चौंकने की जरूरत नहीं, सारी उठा-पटक की वजह नजदीक आते विधानसभा और लोकसभा चुनाव हैं.
आंध्र प्रदेश पुनर्गठन विधेयक 2013 ने कांग्रेस को दक्षिण के उस प्रदेश में अपना वजूद बनाए रखने में कामयाब तो कर ही दिया जो कभी उसका गढ़ था, साथ ही उसकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी तेलुगुदेशम के लिए अलग तरह की मुसीबत भी खड़ी कर दी है.
इंडिया टुडे ग्रुप- सी-वोटर पोलिटिकल स्टाक एक्सचेंज की ओर से 1,500 लोगों पर कराए गए स्नैप सर्वे के मुताबिक 43.8 फीसदी लोगों ने माना कि वाइएसआर कांग्रेस ही आंध्र के बंटवारे के खिलाफ अभियान की वास्तविक अगुआ रही है.
जगन को इस बात का अंदाजा है. इसी कारण उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ चारों ओर से जबरदस्त हमला बोल दिया है. ऐसे में जब बंटवारे से गुजरते आंध्र में कांग्रेस की साख मिट्टी में मिल चुकी है, अपनी स्थिति को और चमकाने के लिए जगन सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाने से लेकर खुद को भेदभाव भरी राजनीति का शिकार बताते फिर रहे हैं.
तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) भी चौन की बंसी बजा रही है क्योंकि उसने तो अपनी जंग जीत ली है. सर्वेक्षण दिखाता है कि 57.9 फीसदी लोग तेलंगाना राज्य के गठन का श्रेय टीआरएस को देते हैं. इस कारण टीआरएस प्रमुख के. चंद्रशेखर राव अपनी संभावित सहयोगी कांग्रेस के साथ सीटों के बंटवारे के मामले में सौदा करते समय फायदेमंद स्थिति में हैं.
आज के इस दौर में सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को उठाना पड़ेगा. अब इसके मुख्यमंत्री एन. किरण कुमार रेड्डी ने विरोध दिखाते हुए इस्तीफा दे दिया, उनके आठ मंत्रियों और कई केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों ने भी ऐसा ही किया.
बचाव का कोई रास्ता नजर न आने की सूरत में पार्टी चुनावी मैदान में उतरने के लिए पिछड़े समुदाय या प्रभावशाली कापू समुदाय से आने वाले केंद्रीय मंत्री के.एच. चिरंजीवी जैसे नेता की उंगली थामने का विचार कर रही है.
फिर भी, कहना मुश्किल होगा कि यह आंध्र की 25 लोकसभा सीटों में एक-तिहाई जीत भी हासिल कर पाएगी या नहीं. वहीं तेलंगाना में टीआरएस के साथ किया गया गठजोड़ 17 में से अधिकांश सीटों पर कब्जा कर सकता है. ऐसे में कांग्रेस भागते भूत की लंगोटी से ही संतुष्ट होगी.
29वें राज्य की चुनौतियां
आंध्र प्रदेश का बंटवारा करके अलग तेलंगाना राज्य बनाने वाले विधेयक के लोकसभा के बाद राज्यसभा में पारित होने के साथ ही देश में 29वां राज्य बनना तय हो गया. राष्ट्रपति से मंजूरी मिलते ही चार करोड़ लोगों का 58 साल पुराना सपना भी साकार हो जाएगा.
लेकिन इसके साथ समस्याएं भी जुड़ी हैं. सरकारी नौकरी, विकास की योजनाएं, शैक्षिक संस्थाओं का निर्माण और पानी के बंटवारे जैसे मुद्दों को सुलझाना होगा. दरअसल, इन्हीं मुद्दों पर तेलंगाना का आंदोलन परवान चढ़ा था.
टीएनजीएओ एसोसिएशन के अध्यक्ष देवीप्रसाद राव का कहना है, ‘‘हम दूसरों की नौकरियां नहीं छीनना चाहते. हम चाहते हैं कि इस क्षेत्र के युवाओं को सरकारी नौकरी में पर्याप्त हिस्सा मिले और तेलंगाना के सभी वर्गों के हितों की रक्षा हो.’’
इस तरह इस नए राज्य के सामने सरकारी नौकरी में अपने लोगों को पर्याप्त हिस्सा दिलाना बड़ी चुनौती होगी. राज्य की दो प्रमुख नदियां-कृष्णा और गोदावरी सैकड़ों किलोमीटर के बाद आंध्र में प्रवेश करती हैं. तेलंगाना को सिंचाई के लिए कई परियोजनाएं तैयार करनी होंगी और तब जल बंटवारे के मुद्दे को सुलझाना होगा.
शिक्षा और रोजगार की समस्याओं से भी जूझना होगा. हैदराबाद में समान अवसर की नीति तेलंगाना के युवाओं को शायद नहीं भाएगी और वे इसे मुद्दा बना सकते हैं. अलग राज्य का गठन समस्याओं का समाधान नहीं बल्कि समस्याओं के समाधान की दिशा में कदम है.
जैसा कि टीआरएस के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद बी. विनोद कुमार कहते हैं, ‘‘अलग राज्य महज नींव है, नए तेलंगाना का महल खड़ा करना अगला कदम है. हम सबको इस जिम्मेदारी को साथ मिलकर निभाना चाहिए.’’
आंध्र प्रदेश पुनर्गठन विधेयक 2013 ने कांग्रेस को दक्षिण के उस प्रदेश में अपना वजूद बनाए रखने में कामयाब तो कर ही दिया जो कभी उसका गढ़ था, साथ ही उसकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी तेलुगुदेशम के लिए अलग तरह की मुसीबत भी खड़ी कर दी है.
इंडिया टुडे ग्रुप- सी-वोटर पोलिटिकल स्टाक एक्सचेंज की ओर से 1,500 लोगों पर कराए गए स्नैप सर्वे के मुताबिक 43.8 फीसदी लोगों ने माना कि वाइएसआर कांग्रेस ही आंध्र के बंटवारे के खिलाफ अभियान की वास्तविक अगुआ रही है.
जगन को इस बात का अंदाजा है. इसी कारण उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ चारों ओर से जबरदस्त हमला बोल दिया है. ऐसे में जब बंटवारे से गुजरते आंध्र में कांग्रेस की साख मिट्टी में मिल चुकी है, अपनी स्थिति को और चमकाने के लिए जगन सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाने से लेकर खुद को भेदभाव भरी राजनीति का शिकार बताते फिर रहे हैं.
तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) भी चौन की बंसी बजा रही है क्योंकि उसने तो अपनी जंग जीत ली है. सर्वेक्षण दिखाता है कि 57.9 फीसदी लोग तेलंगाना राज्य के गठन का श्रेय टीआरएस को देते हैं. इस कारण टीआरएस प्रमुख के. चंद्रशेखर राव अपनी संभावित सहयोगी कांग्रेस के साथ सीटों के बंटवारे के मामले में सौदा करते समय फायदेमंद स्थिति में हैं.
आज के इस दौर में सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को उठाना पड़ेगा. अब इसके मुख्यमंत्री एन. किरण कुमार रेड्डी ने विरोध दिखाते हुए इस्तीफा दे दिया, उनके आठ मंत्रियों और कई केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों ने भी ऐसा ही किया.
बचाव का कोई रास्ता नजर न आने की सूरत में पार्टी चुनावी मैदान में उतरने के लिए पिछड़े समुदाय या प्रभावशाली कापू समुदाय से आने वाले केंद्रीय मंत्री के.एच. चिरंजीवी जैसे नेता की उंगली थामने का विचार कर रही है.
फिर भी, कहना मुश्किल होगा कि यह आंध्र की 25 लोकसभा सीटों में एक-तिहाई जीत भी हासिल कर पाएगी या नहीं. वहीं तेलंगाना में टीआरएस के साथ किया गया गठजोड़ 17 में से अधिकांश सीटों पर कब्जा कर सकता है. ऐसे में कांग्रेस भागते भूत की लंगोटी से ही संतुष्ट होगी.
29वें राज्य की चुनौतियां
आंध्र प्रदेश का बंटवारा करके अलग तेलंगाना राज्य बनाने वाले विधेयक के लोकसभा के बाद राज्यसभा में पारित होने के साथ ही देश में 29वां राज्य बनना तय हो गया. राष्ट्रपति से मंजूरी मिलते ही चार करोड़ लोगों का 58 साल पुराना सपना भी साकार हो जाएगा.
लेकिन इसके साथ समस्याएं भी जुड़ी हैं. सरकारी नौकरी, विकास की योजनाएं, शैक्षिक संस्थाओं का निर्माण और पानी के बंटवारे जैसे मुद्दों को सुलझाना होगा. दरअसल, इन्हीं मुद्दों पर तेलंगाना का आंदोलन परवान चढ़ा था.
टीएनजीएओ एसोसिएशन के अध्यक्ष देवीप्रसाद राव का कहना है, ‘‘हम दूसरों की नौकरियां नहीं छीनना चाहते. हम चाहते हैं कि इस क्षेत्र के युवाओं को सरकारी नौकरी में पर्याप्त हिस्सा मिले और तेलंगाना के सभी वर्गों के हितों की रक्षा हो.’’
इस तरह इस नए राज्य के सामने सरकारी नौकरी में अपने लोगों को पर्याप्त हिस्सा दिलाना बड़ी चुनौती होगी. राज्य की दो प्रमुख नदियां-कृष्णा और गोदावरी सैकड़ों किलोमीटर के बाद आंध्र में प्रवेश करती हैं. तेलंगाना को सिंचाई के लिए कई परियोजनाएं तैयार करनी होंगी और तब जल बंटवारे के मुद्दे को सुलझाना होगा.
शिक्षा और रोजगार की समस्याओं से भी जूझना होगा. हैदराबाद में समान अवसर की नीति तेलंगाना के युवाओं को शायद नहीं भाएगी और वे इसे मुद्दा बना सकते हैं. अलग राज्य का गठन समस्याओं का समाधान नहीं बल्कि समस्याओं के समाधान की दिशा में कदम है.
जैसा कि टीआरएस के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद बी. विनोद कुमार कहते हैं, ‘‘अलग राज्य महज नींव है, नए तेलंगाना का महल खड़ा करना अगला कदम है. हम सबको इस जिम्मेदारी को साथ मिलकर निभाना चाहिए.’’

