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डार्क मोड

बेहतरीन शहर: इलाहाबाद में परंपरा-आधुनिकता का संगम

महाकुंभ के दौरान करोड़ों रुपए के इन्वेस्टमेंट से शहर का नक्शा बदला. ट्रिपल आइटी के साथ मॉडर्न एजुकेशन और टेक्नोलॉजी में मेट्रो से टक्कर.

अपडेटेड 25 फ़रवरी , 2014

अगर कभी भी आपका वास्ता संगम नगरी इलाहाबाद से रहा हो तो आप यहां के ऐतिहासिक पैलेस थिएटर को जरूर जानते होंगे. शहर के बीचोबीच सिविल लाइंस इलाके में सफेद रंग की इमारत वाला यह थिएटर आजादी की लड़ाई का गवाह है. आठ दशक से भी अधिक समय के दौरान इस थिएटर ने तमाम उतार-चढ़ाव, सामाजिक और राजनैतिक परिवर्तन देखे, लेकिन हर दौर में इसका वास्ता सिर्फ सिनेमा से ही रहा. लेकिन अब बदलाव दिख रहा है. समय के अनुरूप मेट्रो संस्कृति के साथ कदमताल ही वह वजह है, जिसने पिछले एक साल के दौरान पैलेस थिएटर को सिनेप्लेक्स के रूप में ढाल दिया है. अब यहां आधुनिक सिनेमा हॉल के साथ शोरूम और रेस्तरां के मजे भी लिए जा सकते हैं.

राजनैतिक और सांस्कृतिक विरासतों को अपने दामन में समेटे यह शहर अब तेजी से बदल रहा है. लेकिन ये बदलाव अचानक क्यों दिखने लगे हैं? इलाहाबाद हाइकोर्ट में सीनियर एडवोकेट रहे 85 वर्षीय शिवमंगल शर्मा बताते हैं कि इस शहर के कायापलट में 2013 की शुरुआत में हुआ महाकुंभ मील का पत्थर साबित हुआ है. अरबों रुपए खर्च करके सरकार ने पहली बार बड़े पैमाने पर शहर का आधारभूत ढांचा दुरुस्त किया तो निजी कंपनियों में भी यहां के बाजार पर कब्जा जमाने की होड़ शुरू हो गई. शर्मा कहते हैं, ‘‘कुंभ शुरू होने के साथ ही ‘‘सुस्त शहर’’ की पहचान वाले इलाहाबाद शहर ने एक नई अंगड़ाई ली और अब यह प्रदेश के दूसरे मेट्रो शहरों से टक्कर लेने की तैयारी में है.’’

कुंभ आयोजन की वजह से जीटी रोड, लोहिया मार्ग, नवाब यूसुफ रोड, लीडर रोड जैसे कई सारे रास्तों को न सिर्फ चौड़ा किया गया, बल्कि बाहर से शहर के भीतर आने वाली सड़कों को भी नया रूप दिया गया. सड़कें बनने के साथ ही विकास की नई लहर भी दौड़ी. शहर के सिविल लाइंस इलाके में बस अड्डा चौराहा, सरदार पटेल मार्ग, लाल बहादुर शास्त्री मार्ग और महात्मा गांधी मार्ग समेत कई हिस्सों में पिछले एक साल के दौरान तेजी से नए शोरूम और मॉल खुले हैं. कौशांबी रोड, नैनी, फाफामऊ जैसे इलाकों में न सिर्फ नए बाजार ने अपनी आमद दर्ज कराई है, बल्कि नई मल्टीस्टोरी इमारतों ने इशारा कर दिया है कि इलाहाबाद में पैसे वालों की एक नई जमात पैदा हो चुकी है.

इलाहाबाद विकास प्राधिकरण के पूर्व सिविल इंजीनियर अनुपम मिश्र बताते हैं कि पिछले 10-15 साल में यहां इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (ट्रिपल आइटी) समेत दो दर्जन इंजीनियरिंग और पैरामेडिकल कॉलेज, इंडियन ऑयल का डिपो जैसे कई प्रोजेक्ट शुरू हुए हैं. इसके अलावा यहां पर यूपी लोक सेवा आयोग, एकाउंटेंट जनरल, राजस्व परिषद, माध्यमिक और बेसिक शिक्षा परिषद, उच्च शिक्षा निदेशालय समेत कई बड़े सरकारी कार्यालय और उच्च न्यायालय होने की वजह से सरकारी नौकरीपेशा लोगों की संख्या 6 लाख से ऊपर है. इनकी बदली आर्थिक स्थिति ने शहर को बदलने के लिए तैयार किया है.

विकास के नए आयाम गढ़ रहे इलाहाबाद के खाते में एक बड़ी उपलब्धि तब जुड़ी, जब पिछले साल 30 नवंबर को यूपी सरकार ने इस शहर को उन दो जिलों में शुमार किया, जो ई-गवर्नेंस में मिसाल बनकर उभरे हैं. इलाहाबाद प्रदेश का इकलौता जिला है, जहां जनता की शिकायतों का निस्तारण करने का ऐसा ढांचा खड़ा किया गया है, जिसमें शिकायतकर्ता को अधिकारी तक जाने की जरूरत नहीं, बल्कि उसे सिर्फ अपने मोबाइल से सूचना भर देनी होती है. आजादी की लड़ाई में अग्रणी रहा यह शहर अब आधुनिकता की दौड़ में भी पीछे नहीं है.

शहर एक नजर
ताकतः शिक्षा का बड़ा केंद्र, वकीलों, डॉक्टरों और सरकारी नौकरी पेशा लोगों के रूप में उपभोक्ता वर्ग की मौजूदगी. बाजार के विस्तार की संभावनाएं. 24 घंटे बिजली की आपूर्ति.
कमजोरीः तीन ओर नदियों से घिरे होने की वजह से शहर के भौगोलिक विस्तार में बाधा. पूरे प्रदेश में सबसे महंगी जमीन यहां पर. देश के बड़े शहरों से हवाई मार्ग से जुड़ा हुआ नहीं है.
संभावनाएं: बारा तहसील और करछना में नए पॉवर प्रोजेक्ट बन रहे हैं. शहर के सीमावर्ती इलाकों में विकास की योजनाओं की शुरुआत. सॉफ्टवेयर कंपनियों की प्राथमिकता सूची में.

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