कर्नाटक की राजधानी बंगलुरू के पैलेस ग्राउंड में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के सफेद हेलिकॉप्टर से उड़ाई गई धूल अभी छंटी भी नहीं थी कि 3,50,000 लोगों की भीड़ ने मंच की ओर हाथ लहराते हुए नारा लगाना शुरू कर दिया. उनकी आवाज चारों दिशाओं में गूंजने लगी. वे अपने नेता को देखने और सुनने के लिए 10-10 रु. देकर वहां इकट्ठे हुए थे.
बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार अपने ज्यादातर युवा दर्शकों की नब्ज पहचानते हैं, ''सिलिकॉन वैली के बाद दुनिया में आइटी का कोई केंद्र है तो वह है बंगलुरू. हमारे युवाओं ने आइटी क्षेत्र की अपनी योग्यता का पूरी दुनिया में प्रदर्शन किया है.
वाजपेयी जी के कार्यकाल में एक नए मंत्रालय की नींव रखी गई और उससे संबंधित पूरा तंत्र स्थापित हुआ. उनकी सरकार के दौरान आइटी ने 30 फीसदी की दर से विकास किया. यूपीए1 के शासन के समय इसमें 9 फीसदी की गिरावट आई. ऐसा तभी होता है जब कोई व्यवस्था गलत हाथों में चली जाती है.”
तालियों की गडग़ड़ाहट के बीच अपनी बात जारी रखते हुए उन्होंने बताया कि किस तरह गुजरात ने अपने युवाओं के लिए कौशल विकास के अवसर मुहैया कराने में केंद्र सरकार को पीछे छोड़ दिया है; कैसे यूपीए सोशल मीडिया और जनमत सर्वेक्षणों को दबाने की कोशिश कर रही है, वगैरह-वगैरह.
यह कोई लापरवाही से बोले गए अल्फाज नहीं हैं. दक्षिण भारत के लोगों से जुडऩे के लिए मोदी ने बड़े जतन से शब्दों का जाल तैयार किया है. उन्होंने हैदराबाद और तिरुचिरापल्ली में भी इसी तरह जोशीली भीड़ को आकर्षित किया.
फिर भी, 2014 के चुनावों में दक्षिण भारत के ज्यादातर राज्य उनके लिए लोहे के चने साबित हो सकते हैं. तमिलनाडु की द्रविड़ राजनैतिक जमीन बीजेपी के लिए कभी आसान नहीं रही. वामपंथी धारा में नहाए केरल ने बीजेपी को किसी भी चुनाव में कभी चौखट पर भी नहीं पहुंचने दिया.
उधर, आंध्र प्रदेश में दशकों से दक्षिणपंथी राजनीति ने अपने पैर मजबूत करने के लिए गंभीर कोशिश नहीं की, लिहाजा 1983 तक निर्विवाद रूप से कांग्रेस का साम्राज्य रहा. फिलहाल तमिलनाडु में मोदी के लिए कोई गठजोड़ तैयार करना आसन नहीं नजर आ रहा, लिहाजा उनका जादू चलता है कि नहीं, कहना मुश्किल होगा.
आंध्र प्रदेश में बीजेपी की उम्मीदें तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के साथ संभावित गठबंधन और राज्य के विभाजन की योजना के साथ जुड़ी हैं. केरल में कभी बीजेपी का विधायक तक नहीं रहा.
दक्षिण में बीजेपी की सबसे बड़ी उम्मीद कर्नाटक से बंधी है. यहां भी खेल का रुख अगर बदला तो उसका सेहरा मोदी के सिर पर बंधेगा. लेकिन यहां बी.एस. येद्दियुरप्पा के कारण बीजेपी ने अपने हाथ बांध रखे हैं. येद्दियुरप्पा ने राज्य में संगठन खड़ा किया और उसे तोड़ भी दिया.
जब बंगलुरू में मोदी मंच पर कर्नाटक के अंतिम दो बीजेपी मुख्यमंत्रियों के साथ गरज रहे थे, तब कुछ ही दूरी पर दक्षिण में बीजेपी की पहली सरकार देने वाला शख्स बैठा था. भ्रष्टाचार के आरोपों की वजह से उन्हें मुख्यमंत्री पद और पार्टी छोडऩी पड़ी. बारिश में भीगे टेंट में आधी बाजू का स्वेटर पहने ठंडी हवा से अपना बचाव करते हुए येद्दियुरप्पा पिछले एक पखवाड़े से अधिक समय से राज्य की कांग्रेस सरकार के खिलाफ धरने पर बैठे थे.
अपने धरने को कोई खास तवज्जो न मिलने के कारण 16वें दिन अपने कर्नाटक जनता पक्ष (केजेपी) का बीजेपी के साथ विलय करने की उनकी अकुलाहट साफ नजर आने लगी थी. बीजेपी उन्हें अपने खेमे में वापस लेने के लिए अभी तैयार नहीं है, लेकिन येद्दियुरप्पा मोदी की लहर के साथ वापस होना चाहते हैं.
कुछ सप्ताह पहले उन्होंने बीजेपी नेतृत्व से अनुरोध किया कि केजेपी को एनडीए में शामिल कर लिया जाए जिसका उन्हें अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है.
राज्य बीजेपी के पास उनके जैसा लोकप्रिय कोई और नेता नहीं है, येद्दियुरप्पा की केजेपी ने विधानसभा चुनावों की अपनी पहली पारी में अकेले बूते पर 9.9 फीसदी वोट बटोरे (जबकि बीजेपी को 19 फीसदी मिले थे). मोदी की दुविधा है कि 25,000 करोड़ रु. के बेल्लारी खनन घोटाले में येद्दियुरप्पा के खिलाफ सीबीआइ की जांच अब भी चल रही है.
इसके अलावा लोकायुक्त की ओर से दोषी ठहराए जाने पर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद कर्नाटक की अदालतों में उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के और भी कई छोटे-मोटे मामले दर्ज हो चुके हैं. मोदी को बीजेपी की राष्ट्रीय छवि को सुधारते हुए राज्य में अपनी प्राथमिकताओं को संतुलित करने की जरूरत है.
जब तक बीजेपी तमिलनाडु की दो बड़ी द्रविड़ पार्टियों—डीएमके और एआइएडीएमके—में से किसी एक के साथ अपने रिश्ते नहीं जोड़ती तब तक 26 सितंबर को मोदी की तिरुचिरापल्ली रैली में इकट्ठी हुई भीड़ वोट में नहीं बदल सकती. बीजेपी ने 1998 में एआइएडीएमके के सहारे राज्य में अपनी पहली लोकसभा सीट जीती थी और उसके बाद डीएमके के साथ गठबंधन करके अगले साल के आम चुनाव में चार सीटें और हासिल कीं.
2014 के लिए एआइएडीएमके प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार के रूप में जयललिता को खड़ा करने की तैयारी में है. डीएमके के साथ जुड़ना मोदी की छवि को कोई फायदा नहीं पहुंचा सकता, क्योंकि इसके सुप्रीमो एम. करुणानिधि पर 2जी मामले सहित कई घोटालों का साया मंडरा रहा है.
सूत्रों का कहना है कि करुणानिधि ने हाल ही में मोदी के साथ फिर संवाद शुरू किया है. एक डीएमके नेता के मुताबिक, ''ये शुरुआती बातचीत है.” मोदी कथित तौर पर वाइको की एमडीएमके और डीएमडीके के विजयकांत को एनडीए के खेमे में लाने के लिए बीजेपी के नेताओं के साथ संपर्क में हैं. लेकिन अंतिम फैसला तभी लिया जाएगा जब 8 दिसंबर को राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे सामने आएंगे.
तमिलनाडु के बारे में जानकारी के लिए मोदी प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष पोन राधाकृष्णन पर निर्भर हैं. उनके अन्य सूत्र पत्रकार चो रामास्वामी और अकाउंटेंट एस. गुरुमूर्ति हैं. एस. गुरुमूर्ति पट्टली मक्कल काची (पीएमके) जैसी राज्य की जाति आधारित पार्टियों को पीएमके के दूसरे सबसे प्रभावशाली नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अंबुमणि रामादॉस के जरिए बीजेपी के खेमे में लाने के लिए काम कर रहे हैं.
आंध्र प्रदेश में मोदी की उम्मीद का पासा किस रुख बैठता है, यह राज्य के विभाजन पर निर्भर करेगा. राज्य में बीजेपी को कभी दो से ज्यादा लोकसभा सीटें नहीं मिलीं (1998 और 1999 को छोड़कर जब उसे क्रमश: चार और सात सीटें मिली थीं). बीजेपी दोनों ही स्थितियों को सामने रखकर अपनी योजना तैयार कर रही है: एक, विभाजन के बाद; दूसरी, अगर विभाजन पर संसद या अदालत ने फिलहाल रोक लगा दी.
मोदी ने चंद्रबाबू नायडु की टीडीपी के साथ संवाद शुरू कर दिया है. लेकिन नायडु की बड़ी चिंता राज्य के बंटवारे से संबंघित यूपीए-2 की योजनाओं से जुड़ी है. इसी के साथ बंटवारे के विरोध में खड़ी वाइएसआर कांग्रेस का उभरना भी परेशानी का सबब बन रहा है. यह सब टीडीपी प्रमुख की एक दशक के बाद सत्ता में लौटने की संभावनाओं पर पानी फेर सकता है.
विभाजन के बाद बीजेपी और टीडीपी के बीच अगर कोई गठबंधन हुआ तो दोनों को फायदा होगा. बीजेपी ने आंध्र प्रदेश के पुनर्गठन विधेयक को समर्थन का विकल्प खुला रखा है. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष जी. किशन रेड्डी कहते हैं, ''कांग्रेस ने अपने रुख को परदे में रखते हुए सभी पार्टियों को विभाजन पर अपनी प्रतिक्रियाएं पेश करने के लिए कहा है.
हम बिल पर तभी अपना पक्ष रखेंगे जब उसे संसद के समक्ष रखा जाएगा.” अगर बीजेपी बिल पर अड़ंगा लगाती है, तो आम चुनाव अविभाजित राज्य में होंगे. तब हो सकता है कि सीमांध्र में बीजेपी और टीडीपी जीत जाएं, लेकिन तब इसे दो तेलंगाना सीटों के खोने का जोखिम उठाना होगा, जहां इसके जीतने की पूरी उम्मीद है.
केरल में चुनावी मैदान में अब भी कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) और सीपीआइ (एम) के नेतृत्व वाले वामपंथी लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) का प्रभुत्व है. इसकी 3.32 करोड़ की आबादी में 44 फीसदी ईसाई या मुसलमान होने और हिंदुओं के बीच सीमित असर की वजह से बीजेपी 2004 को छोड़ कर कभी भी वोट प्रतिशत में दोहरे अंक पर नहीं पहुंची है.
मोदी के पहले चुनावी कदम केरल में तब पड़े जब उन्होंने आबादी और राजनैतिक नजरिए से राज्य के सबसे महत्वपूर्ण एझवा समुदाय के एक प्रतिष्ठित आध्यात्मिक केंद्र शिवगिरि मठ के एक समारोह का अप्रैल में उद्घाटन किया. पहले बीजेपी की हिंदुत्व विचारधारा के आलोचक रहे शिवगिरि मठ में उनके आगमन से सब हैरान रह गए.
फिर वे 26 सितंबर को आध्यात्मिक गुरु अमृतानंदमयी के 60वें जन्मदिन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में राज्य में गए. केरल में ''गले लगाने वाली संत” के काफी भक्त हैं. अमृतानंदमयी पिछड़ी मछुआरा जाति से हैं.
इस चुनाव पूर्व किस्से में हो सकता है कि मोदी ने खुद को मुख्य किरदार बना रखा हो, पर दक्षिण की 130 लोकसभा सीटों की सुखद पटकथा तैयार करना उनके लिए अब भी बड़ी चुनौती है.
—साथ में अमरनाथ के. मेनन, एम.जी. राधाकृष्णन और आर. रामसुब्रह्मण्यम
बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार अपने ज्यादातर युवा दर्शकों की नब्ज पहचानते हैं, ''सिलिकॉन वैली के बाद दुनिया में आइटी का कोई केंद्र है तो वह है बंगलुरू. हमारे युवाओं ने आइटी क्षेत्र की अपनी योग्यता का पूरी दुनिया में प्रदर्शन किया है.
वाजपेयी जी के कार्यकाल में एक नए मंत्रालय की नींव रखी गई और उससे संबंधित पूरा तंत्र स्थापित हुआ. उनकी सरकार के दौरान आइटी ने 30 फीसदी की दर से विकास किया. यूपीए1 के शासन के समय इसमें 9 फीसदी की गिरावट आई. ऐसा तभी होता है जब कोई व्यवस्था गलत हाथों में चली जाती है.”
तालियों की गडग़ड़ाहट के बीच अपनी बात जारी रखते हुए उन्होंने बताया कि किस तरह गुजरात ने अपने युवाओं के लिए कौशल विकास के अवसर मुहैया कराने में केंद्र सरकार को पीछे छोड़ दिया है; कैसे यूपीए सोशल मीडिया और जनमत सर्वेक्षणों को दबाने की कोशिश कर रही है, वगैरह-वगैरह.
यह कोई लापरवाही से बोले गए अल्फाज नहीं हैं. दक्षिण भारत के लोगों से जुडऩे के लिए मोदी ने बड़े जतन से शब्दों का जाल तैयार किया है. उन्होंने हैदराबाद और तिरुचिरापल्ली में भी इसी तरह जोशीली भीड़ को आकर्षित किया.
फिर भी, 2014 के चुनावों में दक्षिण भारत के ज्यादातर राज्य उनके लिए लोहे के चने साबित हो सकते हैं. तमिलनाडु की द्रविड़ राजनैतिक जमीन बीजेपी के लिए कभी आसान नहीं रही. वामपंथी धारा में नहाए केरल ने बीजेपी को किसी भी चुनाव में कभी चौखट पर भी नहीं पहुंचने दिया.
उधर, आंध्र प्रदेश में दशकों से दक्षिणपंथी राजनीति ने अपने पैर मजबूत करने के लिए गंभीर कोशिश नहीं की, लिहाजा 1983 तक निर्विवाद रूप से कांग्रेस का साम्राज्य रहा. फिलहाल तमिलनाडु में मोदी के लिए कोई गठजोड़ तैयार करना आसन नहीं नजर आ रहा, लिहाजा उनका जादू चलता है कि नहीं, कहना मुश्किल होगा.
आंध्र प्रदेश में बीजेपी की उम्मीदें तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के साथ संभावित गठबंधन और राज्य के विभाजन की योजना के साथ जुड़ी हैं. केरल में कभी बीजेपी का विधायक तक नहीं रहा.
दक्षिण में बीजेपी की सबसे बड़ी उम्मीद कर्नाटक से बंधी है. यहां भी खेल का रुख अगर बदला तो उसका सेहरा मोदी के सिर पर बंधेगा. लेकिन यहां बी.एस. येद्दियुरप्पा के कारण बीजेपी ने अपने हाथ बांध रखे हैं. येद्दियुरप्पा ने राज्य में संगठन खड़ा किया और उसे तोड़ भी दिया.
जब बंगलुरू में मोदी मंच पर कर्नाटक के अंतिम दो बीजेपी मुख्यमंत्रियों के साथ गरज रहे थे, तब कुछ ही दूरी पर दक्षिण में बीजेपी की पहली सरकार देने वाला शख्स बैठा था. भ्रष्टाचार के आरोपों की वजह से उन्हें मुख्यमंत्री पद और पार्टी छोडऩी पड़ी. बारिश में भीगे टेंट में आधी बाजू का स्वेटर पहने ठंडी हवा से अपना बचाव करते हुए येद्दियुरप्पा पिछले एक पखवाड़े से अधिक समय से राज्य की कांग्रेस सरकार के खिलाफ धरने पर बैठे थे.
अपने धरने को कोई खास तवज्जो न मिलने के कारण 16वें दिन अपने कर्नाटक जनता पक्ष (केजेपी) का बीजेपी के साथ विलय करने की उनकी अकुलाहट साफ नजर आने लगी थी. बीजेपी उन्हें अपने खेमे में वापस लेने के लिए अभी तैयार नहीं है, लेकिन येद्दियुरप्पा मोदी की लहर के साथ वापस होना चाहते हैं.
कुछ सप्ताह पहले उन्होंने बीजेपी नेतृत्व से अनुरोध किया कि केजेपी को एनडीए में शामिल कर लिया जाए जिसका उन्हें अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है.
राज्य बीजेपी के पास उनके जैसा लोकप्रिय कोई और नेता नहीं है, येद्दियुरप्पा की केजेपी ने विधानसभा चुनावों की अपनी पहली पारी में अकेले बूते पर 9.9 फीसदी वोट बटोरे (जबकि बीजेपी को 19 फीसदी मिले थे). मोदी की दुविधा है कि 25,000 करोड़ रु. के बेल्लारी खनन घोटाले में येद्दियुरप्पा के खिलाफ सीबीआइ की जांच अब भी चल रही है.
इसके अलावा लोकायुक्त की ओर से दोषी ठहराए जाने पर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद कर्नाटक की अदालतों में उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के और भी कई छोटे-मोटे मामले दर्ज हो चुके हैं. मोदी को बीजेपी की राष्ट्रीय छवि को सुधारते हुए राज्य में अपनी प्राथमिकताओं को संतुलित करने की जरूरत है.
जब तक बीजेपी तमिलनाडु की दो बड़ी द्रविड़ पार्टियों—डीएमके और एआइएडीएमके—में से किसी एक के साथ अपने रिश्ते नहीं जोड़ती तब तक 26 सितंबर को मोदी की तिरुचिरापल्ली रैली में इकट्ठी हुई भीड़ वोट में नहीं बदल सकती. बीजेपी ने 1998 में एआइएडीएमके के सहारे राज्य में अपनी पहली लोकसभा सीट जीती थी और उसके बाद डीएमके के साथ गठबंधन करके अगले साल के आम चुनाव में चार सीटें और हासिल कीं.
2014 के लिए एआइएडीएमके प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार के रूप में जयललिता को खड़ा करने की तैयारी में है. डीएमके के साथ जुड़ना मोदी की छवि को कोई फायदा नहीं पहुंचा सकता, क्योंकि इसके सुप्रीमो एम. करुणानिधि पर 2जी मामले सहित कई घोटालों का साया मंडरा रहा है.
सूत्रों का कहना है कि करुणानिधि ने हाल ही में मोदी के साथ फिर संवाद शुरू किया है. एक डीएमके नेता के मुताबिक, ''ये शुरुआती बातचीत है.” मोदी कथित तौर पर वाइको की एमडीएमके और डीएमडीके के विजयकांत को एनडीए के खेमे में लाने के लिए बीजेपी के नेताओं के साथ संपर्क में हैं. लेकिन अंतिम फैसला तभी लिया जाएगा जब 8 दिसंबर को राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे सामने आएंगे.
तमिलनाडु के बारे में जानकारी के लिए मोदी प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष पोन राधाकृष्णन पर निर्भर हैं. उनके अन्य सूत्र पत्रकार चो रामास्वामी और अकाउंटेंट एस. गुरुमूर्ति हैं. एस. गुरुमूर्ति पट्टली मक्कल काची (पीएमके) जैसी राज्य की जाति आधारित पार्टियों को पीएमके के दूसरे सबसे प्रभावशाली नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अंबुमणि रामादॉस के जरिए बीजेपी के खेमे में लाने के लिए काम कर रहे हैं.
आंध्र प्रदेश में मोदी की उम्मीद का पासा किस रुख बैठता है, यह राज्य के विभाजन पर निर्भर करेगा. राज्य में बीजेपी को कभी दो से ज्यादा लोकसभा सीटें नहीं मिलीं (1998 और 1999 को छोड़कर जब उसे क्रमश: चार और सात सीटें मिली थीं). बीजेपी दोनों ही स्थितियों को सामने रखकर अपनी योजना तैयार कर रही है: एक, विभाजन के बाद; दूसरी, अगर विभाजन पर संसद या अदालत ने फिलहाल रोक लगा दी.
मोदी ने चंद्रबाबू नायडु की टीडीपी के साथ संवाद शुरू कर दिया है. लेकिन नायडु की बड़ी चिंता राज्य के बंटवारे से संबंघित यूपीए-2 की योजनाओं से जुड़ी है. इसी के साथ बंटवारे के विरोध में खड़ी वाइएसआर कांग्रेस का उभरना भी परेशानी का सबब बन रहा है. यह सब टीडीपी प्रमुख की एक दशक के बाद सत्ता में लौटने की संभावनाओं पर पानी फेर सकता है.
विभाजन के बाद बीजेपी और टीडीपी के बीच अगर कोई गठबंधन हुआ तो दोनों को फायदा होगा. बीजेपी ने आंध्र प्रदेश के पुनर्गठन विधेयक को समर्थन का विकल्प खुला रखा है. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष जी. किशन रेड्डी कहते हैं, ''कांग्रेस ने अपने रुख को परदे में रखते हुए सभी पार्टियों को विभाजन पर अपनी प्रतिक्रियाएं पेश करने के लिए कहा है.
हम बिल पर तभी अपना पक्ष रखेंगे जब उसे संसद के समक्ष रखा जाएगा.” अगर बीजेपी बिल पर अड़ंगा लगाती है, तो आम चुनाव अविभाजित राज्य में होंगे. तब हो सकता है कि सीमांध्र में बीजेपी और टीडीपी जीत जाएं, लेकिन तब इसे दो तेलंगाना सीटों के खोने का जोखिम उठाना होगा, जहां इसके जीतने की पूरी उम्मीद है.
केरल में चुनावी मैदान में अब भी कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) और सीपीआइ (एम) के नेतृत्व वाले वामपंथी लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) का प्रभुत्व है. इसकी 3.32 करोड़ की आबादी में 44 फीसदी ईसाई या मुसलमान होने और हिंदुओं के बीच सीमित असर की वजह से बीजेपी 2004 को छोड़ कर कभी भी वोट प्रतिशत में दोहरे अंक पर नहीं पहुंची है.
मोदी के पहले चुनावी कदम केरल में तब पड़े जब उन्होंने आबादी और राजनैतिक नजरिए से राज्य के सबसे महत्वपूर्ण एझवा समुदाय के एक प्रतिष्ठित आध्यात्मिक केंद्र शिवगिरि मठ के एक समारोह का अप्रैल में उद्घाटन किया. पहले बीजेपी की हिंदुत्व विचारधारा के आलोचक रहे शिवगिरि मठ में उनके आगमन से सब हैरान रह गए.
फिर वे 26 सितंबर को आध्यात्मिक गुरु अमृतानंदमयी के 60वें जन्मदिन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में राज्य में गए. केरल में ''गले लगाने वाली संत” के काफी भक्त हैं. अमृतानंदमयी पिछड़ी मछुआरा जाति से हैं.
इस चुनाव पूर्व किस्से में हो सकता है कि मोदी ने खुद को मुख्य किरदार बना रखा हो, पर दक्षिण की 130 लोकसभा सीटों की सुखद पटकथा तैयार करना उनके लिए अब भी बड़ी चुनौती है.
—साथ में अमरनाथ के. मेनन, एम.जी. राधाकृष्णन और आर. रामसुब्रह्मण्यम

