यह बीजेपी से 16 जून को नाता टूटने के बाद विधानसभा का पहला सत्र होगा. अचानक ही बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कमजोर पड़ते दिख रहे हैं. बीजेपी से गठबंधन के दम पर भारी बहुमत से शासन चलाने के बाद नीतीश की जेडी (यू) के पास 243 सदस्यों वाली विधानसभा में विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी समेत कुल 118 विधायक ही रह गए हैं.
यह संख्या बहुमत से चार कम है. लेकिन जेडी (यू) के लिए अच्छी खबर यह है कि बीजेपी के पांच विधायक उसकी ओर आने का संकेत दे रहे हैं या यह भी हो सकता है कि वे जेडी (यू) की मदद करने के लिए सदन में गैरहाजिर रहें. और बुरी खबर यह है कि उन्हें पार्टी बदलने के लिए इनाम के तौर पर फिलहाल विधान परिषद में सीट देनी पड़े और बाद में कैबिनेट में शामिल करना पड़े, जो शायद नीतीश की इमेज के लिए सही नहीं होगा.
समस्तीपुर जिले के मोहिउद्दीन नगर से बीजेपी विधायक राणा गंगेश्वर सिंह पहले ही नीतीश को समर्थन देने की बात कह चुके हैं, ''नीतीश कुमार प्रधानमंत्री बनने लायक नेता हैं. चाहे कुछ भी हो, मैं उनके साथ हूं. '' बीजेपी राणा और उनके जैसे दूसरे विधायकों के मामले पर चुप्पी साधे हुए है, जबकि पार्टी की खुलेआम आलोचना करने वाले दरभंगा जिले के हायाघाट से विधायक अमरनाथ गामी को 21 जुलाई को ''अनुशासन तोडऩे और पार्टी विरोधी गतिविधियों'' के लिए पार्टी से निलंबित कर दिया गया था.
पूर्व उप-मुख्यमंत्री और बीजेपी विधायक दल के नेता सुशील कुमार मोदी बहुत नाराज हैं. वे कहते हैं, ''नीतीश कुमार 26 जुलाई से 2 अगस्त तक चलने वाले मानसून सत्र से पहले हमारे विधायकों को तोडऩे की कोशिश में लगे हैं. उन्हें डर है कि वोटिंग के दौरान सरकार गिर सकती है, क्योंकि जिन निर्दलीय विधायकों ने मंत्री बनाने की शर्त पर समर्थन का वादा किया था वे कैबिनेट में अभी तक जगह न मिलने से नाराज हैं. ''
पटना में 1 अण्णे मार्ग के अपने निवास पर 24 जुलाई को मीडिया से बात करते हुए नीतीश ने ''जेडी (यू) के बीजेपी को तोडऩे की कोशिश करने की अटकलों'' को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा, ''मेरे अंदर यह गुण नहीं है. हमको तोड़-फोड़ करना नहीं आता है. '' पर उन्होंने यह भी कहा कि किसी विधायक की अपनी राय हो सकती है. बीजेपी के कुछ विधायक बिहार में अच्छे शासन की तारीफ करना चाहते हैं.
नीतीश कुमार की मौजूदा चिंता उन चार निर्दलीय विधायकों के समर्थन को बनाए रखना है, जिन्होंने 19 जून को विश्वास मत के दौरान कांग्रेस विधायकों के साथ मिलकर राज्य सरकार को बचाया था. लेकिन जेडी (यू) निर्दलीय विधायकों पर ही निर्भर नहीं रहना चाहती है. बताया जा रहा है कि ये निर्दलीय विधायक कैबिनेट में जगह न मिलने से नाराज हैं.
नीतीश के लिए नवंबर, 2015 तक 26 महीनों के लिए अपनी सरकार बचाए रखने की चुनौती है. लगता नहीं है कि निर्दलीय विधायकों की मांगों की वजह से वे लंबे समय तक उनका साथ निभा पाएंगे. केंद्र में यूपीए-2 की सरकार को समर्थन देना या बिहार में उनके समर्थन के एवज में कांग्रेस के साथ गठबंधन करना भी उन्हें असहज लग रहा है. इस गठबंधन के नफा-नुकसान का अंदाजा लगाया जाना बाकी है.
19 जून को जब नीतीश सरकार ने कांग्रेस के चार विधायकों और चार निर्दलीय विधायकों तथा सीपीएम के एक विधायक के समर्थन से विश्वास मत जीता था, तभी संदेश स्पष्ट हो गया था. उस समय बीजेपी के कम-से-कम तीन विधायक अमरनाथ गामी, वीणा देवी सिंह और राणा गंगेश्वर सिंह ने वोटिंग का बहिष्कार करके उन्हें मदद पहुंचाई थी.
पहली बार विधायक बनीं बीजेपी विधायक वीणा देवी जेडी (यू) के एमएलसी दिनेश प्रसाद सिंह की पत्नी हैं. समस्तीपुर जिले में मोहिउद्दीन नगर से बीजेपी के विधायक राणा गंगेश्वर प्रसाद सिंह भी नीतीश कुमार के पुराने समर्थक रह चुके हैं.
निलंबित विधायक अमरनाथ गामी के समर्थन में खुलेआम बोल चुके बीजेपी विधायक विजय मिश्र का जेडी (यू) से पारिवारिक नाता रहा है. पूर्व रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र के पुत्र विजय मिश्र बड़े नेता हैं और नीतीश सरकार में कैबिनेट मंत्री नीतीश मिश्र से उनके करीबी संबंध हैं. विजय मिश्र 1975 से 1980 तक एमएलसी रहे हैं, लोकसभा सांसद रह चुके हैं और तीन बार विधायक चुने जा चुके हैं. हालांकि बीजेपी फिलहाल इन असंतुष्ट विधायकों के खिलाफ कोई भी कार्रवाई करने से बच रही है, ताकि भविष्य में उन्हें मनाया जा सके.
बिहार में 16 जून को बीजेपी और जेडी (यू) गठबंधन टूटने से पहले चंद्रमोहन राय को जेडी (यू) में आने का न्यौता दिया गया था. उस समय वे नीतीश सरकार में बीजेपी के मंत्री थे. पूर्व बीजेपी विधायक दिलीप वर्मा का भी कहना है कि नीतीश सरकार को समर्थन देने के बदले में उन्हें मंत्री बनाने की पेशकश की गई थी. अभी वे सिकटा से निर्दलीय विधायक हैं.
2010 के चुनाव में वर्मा ने सिकटा से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था. वजह: पश्चिमी चंपारण में सिकटा की सीट जेडी (यू) को दे दी गई थी. उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, ''मैंने पेशकश एक बार में ही ठुकरा दी. मैं नरेंद्र मोदी के साथ. ''
हालांकि दल-बदल विरोधी कानून की वजह से बीजेपी के कुछ विधायक नीतीश के खेमे में नहीं जा सकते लेकिन बीजेपी को चिंता है कि जब तक विधानसभा अध्यक्ष—जो जेडी (यू) से हैं—उन्हें अयोग्य घोषित नहीं करते, तब तक वे अपनी सीट पर बने रहेंगे. उन्हें अयोग्य घोषित कर भी दिया जाता है तो बहुमत के लिए जरूरी संख्या कम हो जाएगी.
बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और भागलपुर से सांसद शाहनवाज हुसैन का आरोप है कि जेडी (यू) उनके बागी विधायकों को लालच दे रहा है कि विधानसभा में अगर उनकी सदस्यता खत्म हो जाएगी तो उनके परिवार के सदस्यों को विधान परिषद में जगह दे दी जाएगी. बिहार विधान परिषद में 12 ऐसी सीटें खाली हैं, जिन्हें राज्यपाल के नामांकन कोटे से भरा जाना है. राज्यपाल राज्य सरकार की सिफारिश पर इन सदस्यों को नामांकित करते हैं.
नीतीश कुमार ने जब से बीजेपी से नाता तोड़ा है, तभी से वे एक के बाद एक मुसीबत से घिरते जा रहे हैं. पिछले एक महीने में कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिनसे निबटने में बिहार प्रशासन लाचार दिखाई दिया है. बगहा पुलिस फायरिंग में आठ लोग मारे गए, इसके बाद बोधगया में सीरियल बम विस्फोट की घटना हुई और फिर मिड डे मील हादसे में 23 बच्चों की मौत हो गई. उधर, राजनैतिक मोर्चे पर लालू प्रसाद को चारा घोटाले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिल गई है. जाहिर है नीतीश कुमार के सामने तमाम चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं.
यह संख्या बहुमत से चार कम है. लेकिन जेडी (यू) के लिए अच्छी खबर यह है कि बीजेपी के पांच विधायक उसकी ओर आने का संकेत दे रहे हैं या यह भी हो सकता है कि वे जेडी (यू) की मदद करने के लिए सदन में गैरहाजिर रहें. और बुरी खबर यह है कि उन्हें पार्टी बदलने के लिए इनाम के तौर पर फिलहाल विधान परिषद में सीट देनी पड़े और बाद में कैबिनेट में शामिल करना पड़े, जो शायद नीतीश की इमेज के लिए सही नहीं होगा.
समस्तीपुर जिले के मोहिउद्दीन नगर से बीजेपी विधायक राणा गंगेश्वर सिंह पहले ही नीतीश को समर्थन देने की बात कह चुके हैं, ''नीतीश कुमार प्रधानमंत्री बनने लायक नेता हैं. चाहे कुछ भी हो, मैं उनके साथ हूं. '' बीजेपी राणा और उनके जैसे दूसरे विधायकों के मामले पर चुप्पी साधे हुए है, जबकि पार्टी की खुलेआम आलोचना करने वाले दरभंगा जिले के हायाघाट से विधायक अमरनाथ गामी को 21 जुलाई को ''अनुशासन तोडऩे और पार्टी विरोधी गतिविधियों'' के लिए पार्टी से निलंबित कर दिया गया था.
पूर्व उप-मुख्यमंत्री और बीजेपी विधायक दल के नेता सुशील कुमार मोदी बहुत नाराज हैं. वे कहते हैं, ''नीतीश कुमार 26 जुलाई से 2 अगस्त तक चलने वाले मानसून सत्र से पहले हमारे विधायकों को तोडऩे की कोशिश में लगे हैं. उन्हें डर है कि वोटिंग के दौरान सरकार गिर सकती है, क्योंकि जिन निर्दलीय विधायकों ने मंत्री बनाने की शर्त पर समर्थन का वादा किया था वे कैबिनेट में अभी तक जगह न मिलने से नाराज हैं. ''
पटना में 1 अण्णे मार्ग के अपने निवास पर 24 जुलाई को मीडिया से बात करते हुए नीतीश ने ''जेडी (यू) के बीजेपी को तोडऩे की कोशिश करने की अटकलों'' को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा, ''मेरे अंदर यह गुण नहीं है. हमको तोड़-फोड़ करना नहीं आता है. '' पर उन्होंने यह भी कहा कि किसी विधायक की अपनी राय हो सकती है. बीजेपी के कुछ विधायक बिहार में अच्छे शासन की तारीफ करना चाहते हैं.
नीतीश कुमार की मौजूदा चिंता उन चार निर्दलीय विधायकों के समर्थन को बनाए रखना है, जिन्होंने 19 जून को विश्वास मत के दौरान कांग्रेस विधायकों के साथ मिलकर राज्य सरकार को बचाया था. लेकिन जेडी (यू) निर्दलीय विधायकों पर ही निर्भर नहीं रहना चाहती है. बताया जा रहा है कि ये निर्दलीय विधायक कैबिनेट में जगह न मिलने से नाराज हैं.
नीतीश के लिए नवंबर, 2015 तक 26 महीनों के लिए अपनी सरकार बचाए रखने की चुनौती है. लगता नहीं है कि निर्दलीय विधायकों की मांगों की वजह से वे लंबे समय तक उनका साथ निभा पाएंगे. केंद्र में यूपीए-2 की सरकार को समर्थन देना या बिहार में उनके समर्थन के एवज में कांग्रेस के साथ गठबंधन करना भी उन्हें असहज लग रहा है. इस गठबंधन के नफा-नुकसान का अंदाजा लगाया जाना बाकी है.
19 जून को जब नीतीश सरकार ने कांग्रेस के चार विधायकों और चार निर्दलीय विधायकों तथा सीपीएम के एक विधायक के समर्थन से विश्वास मत जीता था, तभी संदेश स्पष्ट हो गया था. उस समय बीजेपी के कम-से-कम तीन विधायक अमरनाथ गामी, वीणा देवी सिंह और राणा गंगेश्वर सिंह ने वोटिंग का बहिष्कार करके उन्हें मदद पहुंचाई थी.
पहली बार विधायक बनीं बीजेपी विधायक वीणा देवी जेडी (यू) के एमएलसी दिनेश प्रसाद सिंह की पत्नी हैं. समस्तीपुर जिले में मोहिउद्दीन नगर से बीजेपी के विधायक राणा गंगेश्वर प्रसाद सिंह भी नीतीश कुमार के पुराने समर्थक रह चुके हैं.
निलंबित विधायक अमरनाथ गामी के समर्थन में खुलेआम बोल चुके बीजेपी विधायक विजय मिश्र का जेडी (यू) से पारिवारिक नाता रहा है. पूर्व रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र के पुत्र विजय मिश्र बड़े नेता हैं और नीतीश सरकार में कैबिनेट मंत्री नीतीश मिश्र से उनके करीबी संबंध हैं. विजय मिश्र 1975 से 1980 तक एमएलसी रहे हैं, लोकसभा सांसद रह चुके हैं और तीन बार विधायक चुने जा चुके हैं. हालांकि बीजेपी फिलहाल इन असंतुष्ट विधायकों के खिलाफ कोई भी कार्रवाई करने से बच रही है, ताकि भविष्य में उन्हें मनाया जा सके.
बिहार में 16 जून को बीजेपी और जेडी (यू) गठबंधन टूटने से पहले चंद्रमोहन राय को जेडी (यू) में आने का न्यौता दिया गया था. उस समय वे नीतीश सरकार में बीजेपी के मंत्री थे. पूर्व बीजेपी विधायक दिलीप वर्मा का भी कहना है कि नीतीश सरकार को समर्थन देने के बदले में उन्हें मंत्री बनाने की पेशकश की गई थी. अभी वे सिकटा से निर्दलीय विधायक हैं.
2010 के चुनाव में वर्मा ने सिकटा से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था. वजह: पश्चिमी चंपारण में सिकटा की सीट जेडी (यू) को दे दी गई थी. उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, ''मैंने पेशकश एक बार में ही ठुकरा दी. मैं नरेंद्र मोदी के साथ. ''
हालांकि दल-बदल विरोधी कानून की वजह से बीजेपी के कुछ विधायक नीतीश के खेमे में नहीं जा सकते लेकिन बीजेपी को चिंता है कि जब तक विधानसभा अध्यक्ष—जो जेडी (यू) से हैं—उन्हें अयोग्य घोषित नहीं करते, तब तक वे अपनी सीट पर बने रहेंगे. उन्हें अयोग्य घोषित कर भी दिया जाता है तो बहुमत के लिए जरूरी संख्या कम हो जाएगी.
बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और भागलपुर से सांसद शाहनवाज हुसैन का आरोप है कि जेडी (यू) उनके बागी विधायकों को लालच दे रहा है कि विधानसभा में अगर उनकी सदस्यता खत्म हो जाएगी तो उनके परिवार के सदस्यों को विधान परिषद में जगह दे दी जाएगी. बिहार विधान परिषद में 12 ऐसी सीटें खाली हैं, जिन्हें राज्यपाल के नामांकन कोटे से भरा जाना है. राज्यपाल राज्य सरकार की सिफारिश पर इन सदस्यों को नामांकित करते हैं.
नीतीश कुमार ने जब से बीजेपी से नाता तोड़ा है, तभी से वे एक के बाद एक मुसीबत से घिरते जा रहे हैं. पिछले एक महीने में कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिनसे निबटने में बिहार प्रशासन लाचार दिखाई दिया है. बगहा पुलिस फायरिंग में आठ लोग मारे गए, इसके बाद बोधगया में सीरियल बम विस्फोट की घटना हुई और फिर मिड डे मील हादसे में 23 बच्चों की मौत हो गई. उधर, राजनैतिक मोर्चे पर लालू प्रसाद को चारा घोटाले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिल गई है. जाहिर है नीतीश कुमार के सामने तमाम चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं.

