लालू प्रसाद यादव की परिवर्तन रैली के 15 मई को खत्म होने के बाद गांधी मैदान धीरे-धीरे अपनी पुरानी रंगत में लौट रहा है. मैदान के चारों ओर लगे हुए बैरीकेड पहले ही हटा लिए गए हैं. अब मैदान में आरजेडी के चुनाव निशान नए लालटेन भी दिखाई नहीं दे रहे. लालू की सभा में आए बहुत से लोग इन लालटेनों को विदाई उपहार समझकर अपने साथ ले गए हैं. बिजली के बिना बिहार में इन लालटेनों की उपयोगिता रैली में दिए गए भाषणों से कम नहीं थी. रैली के खत्म होने के साथ ही धूल और मिट्टी मैदान पर बैठने और शांत होने लगी है, लेकिन रैली के बाद होने वाली चर्चाएं, विवाद और ध्रुवीकरण की बातें शांत नहीं हो रहीं.
लेकिन सबसे पहले रैली की बात. राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की यह रैली लालू की सत्ता से बाहर रहते हुए पहली सार्वजनिक सभा थी और लालू की मन ही मन यह प्रबल इच्छा रही होगी कि सत्ता से दूर रहते हुए यही उनकी आखिरी सभा भी हो. इस परिवर्तन रैली से पहले लालू यादव गांधी मैदान में अक्तूबर 2007 में चेतावनी रैली में नजर आए थे. उस वक्त आरजेडी प्रमुख यूपीए1 में रेल मंत्री थे. हालांकि साल 2009 के बाद वे रेल मंत्री नहीं रह सके. तब से लेकर आज तक मुश्किलों में घिरे लालू के लिए स्थितियां बद से बदतर होती चली गई हैं. 243 सदस्यों वाली बिहार विधानसभा में आरजेडी के केवल 22 विधायक हैं और महाराजगंज से पार्टी के सांसद रहे उमाशंकर सिंह की मौत के बाद लोकसभा में पार्टी के महज तीन सदस्य बचे हैं.
सभाओं में उमडऩे वाले लोगों की संख्या और प्रतिक्रिया, दोनों के लिहाज से 15 मई को खत्म हुई इस परिवर्तन रैली की तुलना चार नवंबर को हुई नीतीश की अधिकार यात्रा से नहीं की जा सकती. अगर नीतीश की अधिकार यात्रा से इसकी तुलना नहीं भी करें तो भी खुद लालू द्वारा मार्च 1996 में संबोधित की गई गरीब महारैला या नवंबर 1974 में इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ जय प्रकाश नारायण की रैली से इस परिवर्तन रैली की तुलना नहीं की जा सकती.
गांधी मैदान की क्षमता करीब तीन लाख लोगों की है. अगर मैदान में खाली पड़ी छोटी-छोटी पट्टियों को जोड़ दिया जाए तो भी मैदान आधा खाली दिखाई दे रहा था. साफ है कि परिवर्तन रैली ज्यादा लोगों को खींच पाने में सफल नहीं रही, लेकिन इसके साथ यह भी सही है कि बीते सात साल में यह लालू की ओर से किया गया सबसे बड़ा राजनीतिक आयोजन था.
उत्साही भीड़ और खासकर युवाओं ने लालू के एनडीए सरकार को उखाड़ फेंकने के ऐलान के जवाब में बड़ी संख्या में चिलचिलाती धूप का सामना करते हुए भागीदारी की. यह दिखाता है कि आरजेडी प्रमुख के प्रति अभी उनके मन का विश्वास डोला नहीं है. जैसा कि अनुमान था, लालू के भाषण का फोकस नीतीश सरकार को सत्ता से बेदखल करने पर था. लालू ने इसके लिए अपनी वजहें भी बताईं. नमाजी टोपी पहनकर 16.53 प्रतिशत मुसलामानों से खुद को सीधे जोडऩे का प्रयास करते हुए लालू ने कहा, ''नीतिश आरएसएस-भाजपा जैसी सांप्रदायिक ताकतों को फायदा पहुंचा रहे हैं. वे एक बेहद भ्रष्ट सरकार के मुखिया हैं.”
लालू ने कहा, ''पूरे बिहार से मुस्लिम नौजवानों की आतंकवाद में शामिल होने के बहाने गिरफ्तारियां Þईं और नीतीश ने पूरे मामले से मुंह मोड़ लिया.” निश्चित तौर पर लालू को यह उम्मीद है कि सरकार पर ऐसा आरोप लगाकर वह अभेद्य माने जाने वाले मुस्लिम-यादव (एसवाइ) समीकरण को फिर से गोलबंद कर सकते हैं.
हालांकि यह आधा सच ही है. केंद्रीय खुफिया एजेंसियों ने कथित आतंकी घटनाओं में शामिल होने के चलते बिहार और देश के अलग-अलग हिस्सों से मुस्लिम नौजवानों को गिरफ्तार किया है. उन्होंने यह कदम यूपीए-2 की देख-रेख में उठाया है जिसे अभी तक लालू यादव का समर्थन हासिल है. राज्य के सरकारी महकमों में व्याप्त भ्रष्टाचार और उसके खिलाफ लोगों के मन में बढ़ रहे असंतोष और कम वेतन के चलते संविदा पर काम करने वाले शिक्षकों में बढ़ रही नाराजगी को भुनाने की उम्मीद में लालू ने उनकी नौकरियों को नियमित करने का वादा किया.
लालू ने जहां अपनी बातों पर शक करने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी तो वहीं नीतीश कुमार को सत्ता से बेदखल करने और प्रदेश के राजनीतिक पटल पर अपनी वापसी करने की योजना के बारे में कोई भी खुलासा और संकेत उन्होंने जान-बूझकर नहीं दिया. यह बात सभी जानते थे कि लालू की परिवर्तन रैली का दूसरा सबसे बड़ा पक्ष उनके दोनों बेटों-तेजस्वी और तेजप्रताप के राजनीति में प्रवेश की औपचारिक घोषणा था.
लालू अपने दोनों बेटों के राजनीति में उतरने को जायज ठहराने की कोशिश भी करते नजर आए. उन्होंने बेहद तथ्यात्मक होकर सवाल किया, ''ये मेरे लड़के हैं. इसलिए ये लालटेन उठा रहे हैं. इन्हें और क्या करना चाहिए? क्या ये सांप्रदायिक भाजपा का कमल थाम लें या फिर नीतीश कुमार का तीर?” भाई-भतीजावाद के आरोपों पर रक्षात्मक होते हुए लालू ने आरजेडी के नेताओं को आरजेडी परिवार का हिस्सा बताया. लेकिन लालू का यह जवाब राजनीतिक गलियारों में चल रही फुसफुसाहट को शांत नहीं कर सकता. पटना का गांधी मैदान दरअसल लालू पुत्रों का लांचिंग पैड बना है और वंशवाद की राजनीति में एक और अध्याय जुड़ गया है.
लालू ने मंच से विधानसभा चुनाव में पचास फीसदी टिकट युवाओं और महिलाओं को देने का वादा भी किया. इस घोषणा पर पर उनकी जय-जयकार हुई लेकिन शायद यही वह वक्त है जब आरजेडी प्रमुख को इसी जगह से छह साल पहले किए गए अपने वादे की याद दिलाने की जरूरत है. साल 2007 में एक चेतावनी सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने वादा किया था कि बिहार में आरजेडी सत्ता में आई तो वे ऊंची जाति के गरीब तबकों के लिए 10 फीसदी आरक्षण लागू करेंगे. हालांकि बिहार की जनता ने 2009 के लोक सभा चुनाव और 2010 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी को खारिज कर दिया और इस बीच लालू अपने पुराने वादे भूल गए. इन वादों के बारे में अब वे चर्चा तक नहीं करते. आखिर अब वक्त नए वादे करने का जो है.
लालू ने दिखाया कि न सिर्फ उनमें अभी दम-ख़म बाकी है, बल्कि वे उसी भदेस अंदाज से भरपूर हाजिरजवाब भी हैं. लेकिन सच यह भी है कि उनके इस बेजोड़ अंदाज और हाव-भाव की चमक लगातार फीकी पड़ रही है और यह मतदान के दिन उन्हें वोट दिलवा पाने में सफल नहीं हो पा रहा है. उनकी चुटीली बातें आज भी पसंद की जाती हैं लेकिन यह निश्चित है कि ठहाके मारकर उन्हें सुनने वाले लोग उन्हें वोट नहीं दे रहे हैं.
वैसे लालू के इस शक्ति प्रदर्शन को नीतीश सरकार से बिहार की जनता के मोहभंग का नतीजा माना जा रहा है. जाहिर है, इसे लालू के लोकप्रियता में एकाएक आई किसी उछाल का नतीजा नहीं माना जा सकता. इतना जरूर है कि यादव मतों का उनका ठोस जनाधार मजबूत हुआ है. लेकिन क्या यह काफी होगा? क्या लालू लोगों के इस मोहभंग को वोटों में बदल पाएंगे? बिहार के मुख्य विपक्षी दल के नेता की हैसियत से लालू के पास भीड़ जुटाने की ह्नमता तो है लेकिन वह साख नहीं है जिसकी इस वक्त जरूरत है.
लालू ने सोच-समझकर अपनी सभा को परिवर्तन रैली का नाम दिया. उनके लिए बदलाव का मतलब सरकार बदलना है, लेकिन शायद वे यह भूल रहे हैं कि बीते सालों में बिहार भी काफी बदल गया है और इस बदलाव के साथ उन्हें भी बदलना जरूरी है.

