राजस्थान विधानसभा चुनाव से पहले सूबे के विपक्षी नेताओं पर कसे सीबीआइ के शिकंजे ने ठीक उसी तरह की सियासी हलचल पैदा कर दी है, जैसी गुजरात चुनाव के वक्त अमित शाह मामले को लेकर हुई थी. इस बार घेरे में हैं वसुंधरा राजे सरकार में गृह मंत्री रहे और मौजूदा नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया. यह इत्तेफाक है या साजिश, अदालत तय करेगी, लेकिन विधानसभा चुनाव की सरगर्मी शुरू होते ही गुजरात और राजस्थान में पूर्व गृह मंत्री पर सीबीआइ का शिकंजा कसना, एक तथ्य है.
सीबीआइ की यह कोशिश तब है, जब राजस्थान से जुड़े पांच अहम मामलों की जांच में जांच एजेंसी की साख को धक्का लगा है. हालिया मामला कटारिया से जुड़ा है, जिन पर सीबीआइ ने सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में षड्यंत्रकारी होने का आरोप लगाया है. एजेंसी ने पूरक चार्जशीट में उन्हें आरोपी बनाया है. कटारिया बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं में से हैं, जिन पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का वरदहस्त है. बीजेपी में वसुंधरा राजे के धुर विरोधी माने जाने वाले कटारिया को हाल ही में अंदरूनी समझौते के तहत नेता प्रतिपक्ष की कमान सौंपी गई है और राजे को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है. एकजुटता के साथ चुनावी समर में कूदी बीजेपी के लिए कटारिया का ताजा मामला गहरा झटका देने वाला है. यही वजह है कि राजे समेत बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व कटारिया के बचाव में उतर आया है और कांग्रेस पर सीबीआइ के बेजा इस्तेमाल का आरोप लगाया है.
कटारिया पर आरोप है कि 2005 में राज्य का गृह मंत्री रहते हुए उन्होंने आर.के. मार्बल्स प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक और गुजरात के तत्कालीन गृह मंत्री अमित शाह से जुड़े विमल पाटनी के कहने पर कार्रवाई की थी. शाह को इस मामले में ही पहले गिरफ्तार किया गया और फिलहाल वे जमानत पर हैं. सीबीआइ का कहना है कि सोहराबुद्दीन की 2005 में हुई हत्या से पहले उसने पाटनी से 24 करोड़ रु. मांगे थे, जिसके बाद पाटनी ने कटारिया से मदद मांगी. पाटनी ने इंडिया टुडे को बताया, ''किसी ने कभी भी मुझे कोई धमकी नहीं दी, किसी ने कभी फिरौती नहीं मांगी. मैंने कभी किसी से इसकी कोई शिकायत नहीं की. मैं तो वाकई इस बारे में मीडिया में आई खबरों से पूरी तरह से सदमे में हूं. ''
वसुंधरा राजे इसमें बड़ी साजिश देख रही हैं. 16 मई को पत्रकारों से उन्होंने कहा, ''सीबीआइ को इस साल मार्च तक अंतिम चार्जशीट दाखिल कर देनी थी लेकिन पूरक चार्जशीट का अभी दाखिल किया जाना दरअसल बीकानेर और जयपुर में राहुल गांधी के दौरे से जुड़ा है. पार्टी कार्यकर्ताओं ने उनकी मीटिंगों में भी गहलोत के कुशासन और फर्जी योजनाओं का खुलासा कर ही दिया है. '' बीजेपी ने 18 मई को सीबीआइ के इस दुरुपयोग के खिलाफ राज्यव्यापी बंद किया. पार्टी इस मुद्दे को सहानुभूति के तौर पर भुनाने में जुट गई है. एक पुलिस अधिकारी कहते हैं, ''चलिए मान भी लें कि वह फर्जी मुठभेड़ थी, तब चाहे सरकारी ठेके में भ्रष्टाचार का कोई मामला हो, हिरासत में मौत का, पुलिस फायरिंग का या लापरवाही का, सब में डीजीपी, गृह मंत्री और मुख्यमंत्री को भी आरोपी बनाया जाना चाहिए. ''
कटारिया मामले में अभी कोर्ट का रुख आना बाकी है, लेकिन सीबीआइ ने इस बार भी बिलकुल वही सब किया जो उसने जयपुर वाले दारा मुठभेड़ मामले में किया था. वहां भी सारे अहम साक्ष्य इस आखिरी तथ्य को पुष्ट करते हैं कि दारा की मौत पुलिस हिरासत में हुई. सीबीआइ सिर्फ एक फोन कॉल का हवाला देती है जो बीजेपी नेता राजेंद्र राठौड़ और तत्कालीन एडीजी ए.के. जैन के बीच है, और निष्कर्ष निकाल लेती है कि राठौड़ ने जैन को दारा की हत्या का आदेश दिया था. जैन फिलहाल इस मामले में जेल में हैं.
सीबीआइ के मुताबिक, दारा अपराधी था और उसने राठौड़ को मारने की धमकी दी थी, जिसके बाद उसकी हत्या कर दी गई. मगर सोहराबुद्दीन मामले की ही तरह यहां ऐसी कोई धमकी से जुड़ी शिकायत नहीं मिलती जो राठौड़ ने पुलिस में दर्ज करवाई हो. और कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे साबित हो सके कि दारा ने वास्तव में धमकी दी थी. दारा सिंह के गैंगस्टर मालिक को संयोग से पुलिस हिरासत में तो लिया गया लेकिन उसकी हत्या नहीं हुई. राठौड़ के पक्ष में कानूनी दलीलें होने के बावजूद सीबीआइ की उनके खिलाफ कार्रवाई से सूबे में राजपूत वोट का समीकरण गड़बड़ाता दिख रहा है और माना जा रहा है कि इससे कांग्रेस को ठीक उसी तरह नुकसान हो सकता है, जैसा सोहराबुद्दीन मामले में व्यापारियों के साथ हुआ है.
लेकिन कांग्रेस को शायद लगता था कि राठौड़ के खिलाफ सीबीआइ की कार्रवाई से जाट वोट उनके पक्ष में आ जाएंगे, चूंकि दारा सिंह जाट था. पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भंवरी देवी हत्याकांड में सब गुडग़ोबर कर डाला. इस मामले में मंत्री पद से हटाए गए और फिलहाल जेल में दिन काट रहे जाट नेता महिपाल मदेरणा के खिलाफ सीबीआइ अभी तक कोई सबूत नहीं जुटा पाई है कि उन्होंने भंवरी की हत्या का आदेश दिया था.
गौरतलब है कि इस मामले में मुख्य अभियुक्त इंदिरा देवी से पूछताछ करने के बाद भी सीबीआइ ने उसे भाग जाने दिया था. इंदिरा विधायक मलखान सिंह बिश्नोई की बहन है. विश्नोई इस मामले में जेल में है. सीबीआइ ने बस इतना कहा है कि महिपाल की ही तरह बिश्नोई को भी इंदिरा के बुलाए एक गिरोह ने सूचना दी थी कि भंवरी को मार दिया जाएगा. विश्नोई समुदाय को यह बात पचाना मुश्किल है. इसके अलावा गहलोत के करीबी नेताओं और नौकरशाहों के भंवरी और दूसरी महिलाओं के साथ संबंधों वाली तमाम कथित सीडी का भी अता-पता नहीं है. भंवरी अनुसूचित जाति से आती थी. यह समुदाय भी गहलोत से नाराज है.
सीबीआइ की जांच पर राजनीति की छाया मुसलमानों से जुड़े दो मामलों में भी साफ दिखती है. गोपालगढ़ गोलीबारी कांड और उसके बाद हुई हिंसा में सीबीआइ ने सिर्फ मेव और गुर्जरों को ही गिरफ्तार किया है. सितंबर 2011 में हुई पुलिस गोलीबारी के बाद पुलिस की आंखों के सामने भीड़ ने मेवों पर हमला करके दस लोगों की जान ले ली थी. यह गोलीबारी जायज थी या नहीं अथवा गोलीबारी के बाद मेवों की हत्या और उन्हें जलाए जाने की घटना को सीबीआइ ने छुआ तक नहीं है. इसी तरह सवाई माधोपुर के सूरवाल मामले में भी सीबीआइ किसी साजिश को सामने ला पाने में नाकाम रही है. यहां एक माली महिला की हत्या पर कार्रवाई न किए जाने के खिलाफ एक आक्रोशित मीणा युवक ने कूद कर जान दे दी थी, जिसके बाद गुस्साई भीड़ ने एक पुलिस इंस्पेक्टर को जला कर मार डाला था. इन घटनाओं के चलते मुसलमान भी गहलोत से नाराज हैं.
लेकिन ताजा प्रकरण से फिलहाल बीजेपी का फोकस गहलोत सरकार की नाकामियों से हट कर कटारिया पर केंद्रित हो गया है. पार्टी अब सीबाआइ को उसी तरह मुद्दा बनाएगी, जैसा गुजरात में नरेंद्र मोदी ने बनाया था.

