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अबकी किसे रुलाएगा प्याज

बढ़ती कीमत से सरकार मुश्किल में लेकिन दो साल से संकट में किसानों को राहत. अब सरकार की उम्मीद मार्च में प्याज की नई फसल पर टिकी.

प्याज की फसल
प्याज की फसल
अपडेटेड 18 फ़रवरी , 2013

सरकार और प्याज का जैसा रिश्ता है, कुछ वैसा ही रिश्ता इसके उत्पादकों और उपभोक्ताओं का भी है. यही इकलौती सब्जी है जो गृहणियों के साथ सत्ताधारियों के आंखों में आंसू ला देती है. किसानों को इस बढ़ी कीमत से राहत मिल जाती है. कुछ दिन पहले तक पांच रु. किलो बिकने वाला प्याज 35-40 रु. किलो बिक रहा है, इससे किसानों के चेहरे पर जरूर मुस्कान आई है. हालांकि ज्यादा खुशी मंडी के आढ़तियों को होगी.

इंदौर की सब्जी मंडी में प्याज के ढेर से साफ-सुथरी प्याज छांटती सुभद्राबाई कैमरा देखते ही भड़क जाती हैं, मुंह फेरकर कहती हैं, “इतनी चीजों के दाम बढ़ गए तो तकलीफ नहीं होती, प्याज के दाम थोड़े से क्या बढ़े अखबार भर दोगे. पिछले साल जब 2-3 रु. किलो में किसान मंडी में प्याज फेंककर जा रहा था तब क्यों नहीं आए उसकी फोटो निकालने?” सुभद्राबाई की झिड़की यों ही नहीं है, पिछले साल एक किसान 52 कट्टे (40 किलो का एक कट्टा) प्याज मंडी में बेचने लाया था जो मात्र 22 रु. प्रति कट्टे के भाव से बिका और कुल 1,144 रु. उसे मिले जबकि उस ट्रक का भाड़ा ही 1,600 रु. देना पड़ा.

इस बार वही प्याज मंडी में थोक में जहां पिछले साल महज 55 पैसे किलो बिका था, इस बार 30 रु. किलो तक बिका है. साफ है कि थोक मंडी से रसोई तक पहुंचते-पहुंचते प्याज अगर गृहणियों को रुला रहा है तो किसानों को इस बात की राहत है कि अबके उसे प्याज ने घाटा नहीं दिया.

आखिर प्याज के भाव में इस उछाल की वजह क्या है? महाराष्ट्र में प्याज के बड़े व्यापारी मनोहरलाल पारख कहते हैं, “इस बार महाराष्ट्र में बारिश औसत से आधी हुई जिससे प्याज पर सबसे ज्यादा असर हुआ, इसका उत्पादन भी आधा ही रह गया.” डायरेक्टोरेट ऑफ इकोनोमिक्स ऐंड स्टैटिस्टिक्स के आंकड़ों के मुताबिक देश में कुल 5.5 लाख हेक्टेयर में प्याज लगाई जाती है जिसमें 1.1 लाख हेक्टेयर अकेले महाराष्ट्र की हिस्सेदारी है.

उत्पादन के लिहाज से 30 फीसदी प्याज महाराष्ट्र से आता है. महाराष्ट्र में फसल प्रभावित होती है तो उसका असर पूरे देश पर पड़ता है. मौसम की मार मध्य प्रदेश में भी प्याज की फसल पर पड़ी है. इंदौर के बड़े प्याज व्यापारी विजय खत्री बताते हैं, “इस बार इंदौर मंडी में आवक पिछले वर्ष की तुलना में करीब 40 प्रतिशत कम रही है. प्याज के भाव में बढ़ोतरी की सीधी वजह यह है कि मांग की तुलना में आपूर्ति कम है, क्योंकि पिछले साल जिन किसानों को प्याज में घाटा हुआ, उन्होंने इस बार उससे तौबा कर ली है. इससे प्याज का रकबा भी घटा और मौसम की मार से उत्पादन भी आधा रह गया.” वैसे पारख कहते हैं, “मीडिया फोकट में प्याज के पीछे पड़ा है, थोड़े दिन में जहां अगली फसल बाजार में आई, भाव फिर वहीं आ जाएंगे.”

गृहणियों को इससे कोई मतलब नहीं की प्याज महंगा होने की वजह क्या है? उन्हें चिंता यह है कि प्याज उनके किचन का बजट बिगाड़ रहा है. इस बिगड़े बजट ने राजनैतिक भूचाल पैदा किया है क्योंकि इसी साल दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, कर्नाटक जैसे प्रमुख राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. प्याज की आवक में कमी की भनक सरकार को जरूर रही होगी.

दिल्ली कृषि विपणन समित के चेयरमैन राजिंदर कुमार शर्मा कहते हैं, “इसकी आशंका पहले से ही थी. नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च ने पहले ही आगाह किया था कि वित्त वर्ष 2012-13 में प्याज के उत्पादन में 20 फीसदी की गिरावट देखने को मिलेगी. प्याज उत्पादक किसान पिछले दो साल से कम कीमत मिलने से नाराज थे, ऐसे में फसल कम बोई गई. ऊपर से दिसंबर-जनवरी में सर्दी की बारिश न के बराबर हुई. इससे गुजरात-महाराष्ट्र की फसल सबसे ज्यादा खराब हुई. अमूमन जनवरी-फरवरी में प्याज का उत्पादन भी सबसे कम होता है. इन सारी वजहों ने प्याज की कीमतों में उछाल पैदा किया.”

प्याज की बढ़ी कीमत कैसे किसी राजनैतिक दल को खून के आंसू रुला सकती है, 1998 का दिल्ली विधानसभा चुनाव इसकी सबसे बड़ी नजीर है. तब प्याज पर चुनाव हारने वाली बीजेपी ने इस बार मौका लपकने की कोशिश की. राष्ट्रीय महासचिव और दिल्ली के वरिष्ठ बीजेपी नेता विजय गोयल ने बढ़ी हुई कीमतों के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए लाल किले के बाहर ही प्याज की दुकान खोल ली.

मौके की नजाकत भांपकर दिल्ली की कांग्रेसी मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को चिट्टी लिख प्याज निर्यात पर रोक लगाने की मांग की. लेकिन कृषि मंत्रालय ने शीला के सुझाव को ठुकरा दिया. केंद्र सरकार को उम्मीद मार्च के महीने में आने वाली प्याज की नई फसल से है, जब राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र से प्याज की आपूर्ति शुरू होगी. दिल्ली कृषि विपणन समिति का मानना है कि फरवरी महीने में कीमतें मौजूदा स्तर पर ही रहेंगी और मार्च से इसमें गिरावट की उम्मीद है.

लेकिन प्याज की कीमतों में उम्मीद के मुताबिक गिरावट नहीं हुई और कीमतों पर काबू नहीं पाया गया तो विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के सियासी आंसू जरूर निकल सकते हैं.

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