अब इसे क्या कहेंगे आप? कोई पुरुष अगर अपनी 16 साल से ऊपर की वय की पत्नी के साथ जबरन सेक्स करे तो वह यौन दुव्र्यवहार नहीं होगा, लेकिन अगर कोई पत्नी अपने पति की रजामंदी के बगैर ऐसे संबंध बनाती है तो उसके खिलाफ मुकदमा चलाया जा सकता है. सरकार के नए बलात्कार विरोधी कानूनों को बारीकी से देखें तो इस तरह की अजीबोगरीब और हैरतनाक संभावनाएं बन सकती हैं. और यह अकेला प्रावधान नहीं है, जिसे देखकर आने वाले दिनों में अदालतें और वकील चकरा जाएंगे.
राष्ट्रपति ने 3 फरवरी को जिस आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश 2013 पर मुहर लगाई है, उसका आशय यह है कि महिला नागरिकों को सुरक्षा देने का देश का सपना पूरा हो सके. लेकिन इसकी जगह, इसकी कानूनी जटिलताओं को लेकर बहस शुरू हो गई है.
नेशनल रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, देश की तमाम अदालतों में 95,000 महिलाएं न्याय पाने का इंतजार कर रही हैं. बलात्कार भारत का सबसे तेजी से बढऩे वाला अपराध है. पिछले चार दशकों में इसमें 875 फीसदी (लगभग नौ गुना) की बढ़ोतरी हुई है. ऐसी औरतों की उम्मीदों पर पानी फेरते हुए इस अध्यादेश के जरिए ‘बलात्कार’ शब्द को हटाकर उसकी जगह किसी भी लिंग के लिए इस्तेमाल होने लायक ‘यौन हमला’ शब्द लाया गया है. लेकिन इस तथ्य की अनदेखी करते हुए कि भारत में महिलाओं को अक्सर ‘बलात्कार’ का सामना करना पड़ता है, इस अध्यादेश ने अपराध की नृशंसता को हल्का कर दिया है. विधिवेत्ता रेबेका जॉन कहती हैं, “यह उन सभी महिलाओं के मुंह पर तमाचा है जो विरोध प्रदर्शन के लिए सड़कों पर आई थीं.”
एक उदाहरण से इसे समझते हैं. अध्यादेश की धारा 375 कहती है कि ‘किसी व्यक्ति’ किसी दूसरे “व्यक्ति” पर यौन हमला कर सकता है. लेकिन इस कानून की शब्दावली लिंग (जेंडर) और तटस्थता (न्यूट्रलिटी) के बीच, ‘पीड़ित’ और ‘अपराधी’ के बीच फर्क की पेचीदगियों में गोल-गोल घूमती दिखती है. यहां तक कि इसमें जिस धारा में किसी ‘व्यक्ति’ द्वारा बलात्कार की संभावना पर बात की गई है, उसका अंत इस बात से होता है कि अगर कोई ‘व्यक्ति’ अपनी 16 वर्ष से ऊपर की पत्नी से शारीरिक संबंध बनाए तो वह कोई यौन हमला नहीं करता है. जॉन कहती हैं, “यह अपवाद सिर्फ पतियों के लिए है. इस परिभाषा के मुताबिक, कोई पत्नी अपने पति की रजामंदी के बगैर उससे सेक्स संबंध बनाती है तो उस पर मुकदमा चलाया जा सकता है. यह गलत ढंग से तैयार प्रारूप लग रहा है, लेकिन तकनीकी तौर पर देखें तो इससे एक पत्नी ही पति के साथ बलात्कार की दोषी मानी जा सकती है.”
दिल्ली में 23 वर्षीया लड़की के साथ हुए बलात्कार के बाद सड़कों पर विरोध करने वाले बहुत से लोगों में इस अध्यादेश को लेकर गुस्सा है. जेएनयू स्टुडेंट यूनियन की पूर्व अध्यक्ष सुचेता डे कहती हैं, “यह हर महिला का घोर अपमान है.” सुचेता वैवाहिक जीवन में किए जाने वाले बलात्कार के खिलाफ कड़े कानून बनाने की मांग को लेकर अपने साथी छात्र-छात्राओं के साथ आंदोलन की तैयारी कर रही हैं. एक और हैरतनाक बात रजामंदी से यौन संबंध बनाने की उम्र को लेकर है.
लंबित पड़े आपराधिक कानून संशोधन बिल, 2012 में 16 से 18 वर्ष के युवाओं की यौन गतिविधियों को अपराध माना गया है. वर्मा कमेटी ने सुझाव दिया है कि रजामंदी के लिए उम्र 16 वर्ष मानी जाए. लेकिन अध्यादेश ने इसे 18 वर्ष माना है. डे कहती हैं, “अब किशोर भी सेक्स को लेकर प्रयोग करने लगे हैं. अगर आप सचाई नहीं स्वीकारते और 18 वर्ष की उम्र से चिपके रहते हैं, तो आप जिज्ञासु युवाओं को अपराधी ठहरा देने के लिए भारी गुजाइंश छोड़ देंगे.”
यह अध्यादेश हड़बड़ी में तैयार किया गया लगता है, जिसमें सामग्री को बस अलग-अलग जगहों से उठाकर चिपका दिया गया है. इसके लिए सामग्री 19वीं सदी के अपराध कानून से लेकर हाल की वर्मा समिति की रिपोर्ट तक से ली गई है. मौजूदा संहिता की गलत और नकारात्मक शब्दावली जैसे ‘किसी महिला की मर्यादा पर हमला’ (भारतीय दंड संहिता की धारा 354) या ‘किसी महिला की मर्यादा का अपमान करना’ (आइपीसी की धारा 509) कुछ इस तरह से मौजूद हैं कि उनका अर्थ स्त्री या पुरुष किसी के भी रूप में निकाल लिया जाए. घिसी-पिटी शब्दावली से अंदेशा है कि यौन अपराधों के मामले में नैतिकता की अपने-अपने ढंग से व्याख्या की जाए.
नारी अधिकार कार्यकर्ता इस नए कानून को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं हैं. माकपा सांसद और आल इंडिया डेमोक्रेटिक वुमेंस एसोसिएशन की सदस्य वृंदा करात कहती हैं, “हम जानना चाहते हैं कि इस अध्यादेश में मनमाने ढंग से, बिना किसी व्यापक चर्चा के जस्टिस वर्मा समिति की सिफारिशों को आखिर क्यों खारिज कर दिया गया?” सरकार का बचाव यह है, जैसा कि केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने 4 फरवरी को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, इससे “त्वरित न्याय और सख्त सजा” मिलेगी. केंद्रीय कानून मंत्री अश्विनी कुमार इस अध्यादेश को “एक ऐतिहासिक कदम” बताते हैं, जिससे महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर अंकुश लगेगा. वे कहते हैं, “मुझे गर्व है कि यह बिल मेरे कानून मंत्री रहने के दौरान पारित हुआ है.” कुमार यह भी जोड़ते हैं कि गलत व्याख्या के साथ इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए इसमें कुछ बदलाव किए जा सकते हैं.
लेकिन इससे हर कोई सहमत नहीं. दिल्ली स्थित सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक और राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण अभियान की सदस्य रंजना कुमारी कहती हैं, “यह देश के गुस्से को शांत करने के लिए बस एक लोकलुभावन छल है.” वे बलात्कार पीड़ित की मौत होने पर मौत की सजा के नए प्रावधान का उल्लेख करती हैं. आइपीसी की धारा 302 में पहले से ही कत्ल के ‘रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’ (दुर्लभतम) मामलों में मौत की सजा का प्रावधान है. वे बताती हैं, “पिछले 65 साल में भारत में सिर्फ 46 लोगों को फांसी की सजा दी गई है. सरकार को इस मामले में लोकप्रियतावादी नजरिया नहीं अपनाना चाहिए.”
इसी तरह वरिष्ठ अधिवक्ता केटीएस तुलसी की राय में, नए कानून की मांग महिलाओं के ‘संसद के जाल में फंसने’ के लिए बढऩे जैसी है. हर सामाजिक संकट के वक्त सांसद सजा बढ़ाने और जमानत को ज्यादा कठिन बनाने की मांग करने को मजबूर होते हैं. लेकिन जब भारतीय न्यायिक प्रणाली में 6 फीसदी से कम आरोपी दोषी साबित किए जा रहे हों और न्याय देने में दस-दस साल की देरी हो रही हो, लागू न हुए नए कानून, प्रशासन और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल निरर्थक ही साबित होते हैं. तुलसी कहते हैं, “इसकी जगह महिलाओं को त्वरित न्याय की मांग करनी चाहिए. पुलिस थानों में किए जाने वाले सभी टेलीफोन कॉल की ऑटोमेटिक रिकॉर्डिंग होनी चाहिए ताकि बलात्कार के खिलाफ एफआइआर दर्ज करने से इनकार न किया जा सके. सभी पीड़ितों और गवाहों की छेड़छाड़ रहित वीडियो रिकॉर्डिंग की मांग करें, यह तय हो कि क्राइम ब्रांच की टीम घटनास्थल पर मोबाइल फॉरेंसिक वैन लेकर जाए, इस बात पर जोर दें कि पुलिस की सभी जांच दो दिनों में पूरी हो, 90 दिन में नहीं.”
सच तो यह है कि लैंगिक हिंसा पर जस्टिस वर्मा कमेटी की सिफारिशों की बुनियाद पर तैयार किए गए अध्यादेश में वे मसले तो सुलझाए ही नहीं गए हैं, जो पैनल ने उठाए थे. पुलिस, सेना के वरिष्ठ अधिकारी और दूसरे अफसरशाह इसके तहत अपने जूनियरों के सेक्स अपराध के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराए जा सकेंगे.
इसी तरह, यौन अपराध करने वाले नेताओं को चुनाव लडऩे से रोकने, वैवाहिक जीवन में पति के बलात्कार करने को अपराध मानने, महिलाओं के खिलाफ अपराध करने वाले सैन्यकर्मियों पर नागरिक कानून के तहत मामला चलाने और बलात्कार पीड़िता के बयान की वीडियो रिकॉर्डिंग जैसे मसलों पर भी कुछ नहीं किया गया है. इसके अलावा लापरवाही से तैयार यह कानून इसकी सबसे बड़ी जरूरत ‘लैंगिक तटस्थता’ के मामले में कई खामियां छोड़ देता है.
गौरतलब है कि 1972 में मथुरा नाम की एक जनजातीय लड़की के बर्बर बलात्कार ने सरकार को जगने और बलात्कार कानूनों में 1983 में बदलाव करने को मजबूर किया था. बलात्कार के लिए, नाबालिगों और गर्भवती महिलाओं के बलात्कार, गैंग रेप और कस्टडी में बलात्कार के मामले में न्यूनतम सजा को पहली बार परिभाषित किया गया था. इसके 30 साल बाद एक और क्रूर बलात्कार ने सरकार को कुछ और कानूनी बदलावों के लिए मजबूर किया है. पर एक सरल, सुस्पष्ट और लागू करने में आसान कानून देश को अब भी नहीं मिल पाया है.

