राजधानी दिल्ली में 16 दिसंबर को हुए गैंग रेप के छह आरोपियों का मुकदमा तमाशा बन गया है. मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट नम्रता अग्रवाल की अदालत में चल रहे इस मुकदमे की रिपोर्टिंग करने पर रोक है, लेकिन पांच आरोपियों के चार वकील सार्वजनिक खींचतान में लगे हैं. वे एक-दूसरे पर मुवक्किल चुराने का आरोप लगा रहे हैं और इस बहुचर्चित मामले में ज्यादा-से-ज्यादा फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं. छठे आरोपी का मामला जुवेनाइल जस्टिस कोर्ट में चल रहा है. बताया जा रहा है कि वह जून, 2013 में 18 साल का हो जाएगा. उसकी सही उम्र पता करने की प्रक्रिया अभी जारी है.
अभी यह निश्चित नहीं है कि इस मामले को यौन अपराधों के मुकदमों के लिए दिल्ली की साकेत जिला अदालत में बनाई गई फास्ट-ट्रैक अदालत में कब भेजा जाएगा. वैसे इस मामले को 10 जनवरी को स्थानांतरित होना था. वकीलों का दावा है कि 33 पन्नों का आरोप-पत्र और 1,000 पन्नों का संलग्नक अस्पष्ट हैं. देरी करने की एक और चाल है मुकदमे की सुनवाई खुली अदालत में कराने की ताजा मांग.
33 वर्षीय आरोपी राम सिंह के वकील 57 वर्षीय वी.के.आनंद का कहना है कि इस मामले को तब तक फास्ट-ट्रैक कोर्ट में नहीं भेजा जा सकता, जब तक कि उनकी बात ठीक से न सुन ली जाए. बंद कमरे में सुनवाई के खिलाफ हाइकोर्ट में याचिका देने जा रहे आनंद कहते हैं, “निष्पक्ष न्याय के लिए सुनवाई खुली अदालत में होनी चाहिए.”
अदालत के अंदर वकील एक-दूसरे से लड़ पड़े थे जिस वजह से आरोपियों को दो घंटे तक अदालत में पेश नहीं किया जा सका. यह देख मजिस्ट्रेट ने 7 जनवरी को बंद कमरे में सुनवाई का आदेश दिया था. मजिस्ट्रेट ने सीआरपीसी की धारा 327-3 का इस्तेमाल करते हुए उन लोगों को अदालत से बाहर जाने को कहा, जिनका संबंध इस मामले से नहीं है. आदेश में कोर्ट की अनुमति के बिना अदालती कार्रवाई को छापने या सार्वजनिक करने पर भी रोक लगा दी गई. लेकिन आरोपियों के वकील आजादी से मीडिया के लोगों से मिल रहे हैं, विदेशी पत्रकारों से बात करने में वे विशेष रुचि दिखाते हैं.
वकील आनंद कहते हैं, “वकील जिस तरह से बचकाना व्यवहार कर रहे हैं, उससे निश्चित ही मामले की गंभीरता कम होती है.” हालांकि वे खुद भी राम सिंह के भाई 26 वर्षीय मुकेश के वकील एम.एल. शर्मा के खिलाफ जुबानी जंग में शामिल हैं. शर्मा का आरोप है कि दोनों भाइयों ने उन्हें अपना वकील चुना था और आनंद ने तिहाड़ जेल के अधिकारियों और पुलिस की मिलीभगत वाले एक संगठित रैकेट का इस्तेमाल करके राम सिंह से वकालतनामे पर दस्तखत करा लिए.
56 वर्षीय शर्मा कहते हैं, “मुझे इसमें कोई गहरी साजिश दिखाई देती है.” आनंद और शर्मा दोनों ही 7 जनवरी को राम सिंह के दस्तखत वाला अपना-अपना वकालतनामा लहराते हुए अदालत में आ गए. आनंद कहते हैं, “राम सिंह ने अदालत को बताया कि उसने मुझे अपना वकील बनाया है. मुझे नहीं पता कि शर्मा ऐसा क्यों कर रहे हैं. जरूर यह उनकी कुंठा है.”
दूसरी तरफ शर्मा वकीलों पर “मीडिया का भूखा” होने का आरोप लगाते हैं. वे खुद ही 15 जनवरी को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के सामने जा पहुंचे और नाबालिग अपराधी की ओर से मुकदमा लडऩे की पेशकश की. लेकिन वकालतनामे या आरोपी के परिवार की अनुमति के अभाव में विशेष मजिस्ट्रेट गीतांजलि गोयल ने उन्हें चले जाने के लिए कहा. शर्मा कहते हैं, “मैं इसके लिए कोई फीस नहीं ले रहा बल्कि अपनी जेब से 50,000 रु. खर्च कर चुका” शर्मा को मुख्य रूप से जनहित याचिकाएं दाखिल करने के लिए जाना जाता है. मार्च, 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने उन पर ‘निर्थक’ याचिका दाखिल करने के लिए 50,000 रु. का जुर्माना भी लगाया है.
दो अन्य आरोपियों, 28 वर्षीय अक्षय ठाकुर (बस का क्लीनर) और 19 वर्षीय विनय शर्मा की ओर से मुकदमा लड़ रहे एडवोकेट अजय प्रकाश सिंह कहते हैं, “बस के ड्राइवरों को पता होता है कि कॉलगर्ल कहां मिलती हैं. वे उन्हें बुला सकते थे. उन्होंने ऐसी लड़की को क्यों चुना, जिसके साथ एक हट्टा-कट्टा बॉडीगार्ड था.” जबकि आरोपी पवन गुप्ता के वकील विवेक शर्मा कहते हैं कि उन्होंने यह मुकदमा इसलिए हाथ में लिया कि हर किसी को सही सुनवाई का मौका मिल सके.

