इन दिनों बिहार में नेताओं के बीच यात्राओं की भागमभाग मची है. एक पार्टी के नेता की यात्रा पूरी भी नहीं होती कि दूसरी पार्टी के दिग्गज की यात्रा शुरू हो जाती है. पिछले हफ्ते लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) प्रमुख रामविलास पासवान की बिहार बचाओ यात्रा इसी कड़ी की ताजा मिसाल है.
राज्य के 36 जिलों के दौरे के बाद 14 अप्रैल को बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती पर उनकी यात्रा पूरी होंगी. इस यात्रा के दौरान निशाने पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं. उनका नारा है 'नीतीश हटाओ और बिहार बचाओ.’ पासवान का कहना है, ''अगले तीन साल तक बिहार में नीतीश कुमार का शासन रहा तो बच्चों के हाथों में स्लेट, कॉपी और किताबों की जगह शराब की बोतलें होगीं क्योंकि सरकार गांव-गांव में शराब की दुकानें खोल रही है. विकास के नाम पर एक सुई का कारखाना भी नहीं लगाया गया. मनरेगा में 6,000 करोड़ रु. का घपला सरकार के काम करने के ढंग को ही दर्शाता है.”
पासवान खामियों को गिनाने के साथ ही एलजेपी गठबंधन की सरकार बनने पर सभी को इंदिरा आवास, कॉन्ट्रेक्ट पर बहाल शिक्षकों को स्थायी करने और बेटी के जन्म लेने पर 25,000 रु. जमा कराने का वादा भी कर रहे हैं. लोकसभा चुनाव 2014 और बिहार विधानसभा चुनाव 2015 में होने हैं. साल भर में पासवान की यह दूसरी यात्रा है. 2012 में उन्होंने संकल्प यात्रा से बिहार सरकार की खामियों को गिनाया था.
पासवान अकेले शख्स नहीं हैं जो ठंड के इस मौसम में राजनैतिक गर्माहट पैदा कर रहे हैं. बिहार के प्रमुख विपक्षी दल आरजेडी के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव भी परिवर्तन यात्रा पर हैं. सत्ता में वापसी की आस लगाए लालू प्रसाद जनता को अपने पक्ष में गोलबंद करने की कोशिश में जुटे हैं.
पूर्णिया यात्रा के क्रम में लालू ने लोगों से अपील में कहा, ''माना मेरे शासनकाल में कुछ गलतियां हुईं, लेकिन उसे माफ कर एक और मौका दें. ऐसी गलती दोहराई नहीं जाएगी.” लालू के निशाने पर भी नीतीश हैं. वे कहते हैं, ''मेरी यात्रा का मकसद सुशासन की डींग हांकने वाले नीतीश कुमार के कुशासन पर चोट करना है.” आरजेडी का मजबूत जनाधार रहे अल्पसंख्यकों का भरोसा हासिल करने के लिए लालू कहते हैं, ''लालू सड़-गल जाना पसंद करेगा लेकिन सांप्रदायिक ताकतों से कभी हाथ नहीं मिलाएगा. मैंने ही आडवाणी के रथ को रोक कर जेल भेजने का काम किया था.”
एलजेपी और आरजेडी ही नहीं, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष चौधरी महबूब अली कैसर भी विकास योजनाओं में गड़बड़ी और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर राज्य सरकार के खिलाफ पिछले साल पोल खोल यात्रा पर निकले थे. अब तक यात्रा पूरी नही हुई है. 17 जनवरी से भ्रष्टाचार और कुशासन के मुद्दे को लेकर जेडी (यू) से अलग और राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर नवनिर्माण मोर्चा बनाने वाले उपेंद्र कुशवाहा भी जिलों की यात्रा पर निकल पड़े हैं. पिछले साल 9 नवंबर को सीपीआइ-एमएल के राष्ट्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने परिवर्तन रैली का आयोजन किया.
अपने विरोधियों की यात्राओं की तुलना में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार यात्राओं के मामले में सबसे आगे हैं. पिछले सात साल के अंतराल में उन्होंने पंच यात्राएं पूरी की, जबकि नवंबर 2011 से सेवा यात्रा पर हैं, जिसका पहला चरण जनवरी 2013 में 11 जिलों के दौरों से पूरा होगा. वे मानते हैं कि उनकी सेवा यात्रा उपयोगी और कारगर साबित हो रही है.
बिहार को विशेष राज्य के दर्जे की मांग को लेकर 19 सितंबर, 2012 से शुरू हुई अधिकार यात्रा की अगली कड़ी इस साल 17 मार्च को दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली के साथ पूरी होगी. हालांकि अधिकार यात्रा के दौरान नीतीश की सभाओं में अच्छी-खासी भीड़ जुटी है.
नीतीश कहते हैं, ''जेडी (यू) की इस मुहिम का मकसद बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के लिए जन समर्थन जुटाना है. हालांकि सुशासन और विकास देख कुछ लोगों की छाती फटती रहती है.” मगर अधिकार रैली में विरोध प्रदर्शन की घटनाओं ने नीतीश को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है.
वहीं बीजेपी ने अप्रैल में हुंकार रैली आयोजित करने की घोषणा की है. पिछले साल अक्तूबर में बीजेपी नेता उमा भारती ने गंगा समग्र यात्रा के दौरान भागलपुर के मिरजापुर चौकी से बक्सर तक 470 किलोमीटर की यात्रा की, जिस दौरान उन्होंने केंद्र सरकार की आलोचना की.
यात्राओं का अतीत नेताओं को अपनी ओर खींच रहा है. पहली दफा फरवरी-मार्च 2005 में नीतीश ने तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह के विधानसभा भंग करने और राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा करने के फैसले के खिलाफ न्याय यात्रा आयोजित की थी. नवंबर 2005 में एनडीए की जीत ने नीतीश के हाथ मूलमंत्र दे दिया. उन्होंने 2009 लोकसभा चुनाव के पहले विकास यात्रा और 40 में से 32 सीटों पर जीत के बाद धन्यवाद यात्रा की. दिसंबर 2009 से प्रवास यात्रा के जरिए ग्रामीणों से संवाद कायम किया. 2010 विधानसभा चुनाव के पहले विश्वास यात्रा की जबकि 243 में से 206 सीटों पर एनडीए की जीत के बाद वे सेवा यात्रा पर हैं. यही नहीं, वे अमन रथ, निर्भय रथ, जननायक कर्पूरी रथ, किसान रथ, स्वावलंबन रथ को भी रवाना कर चुके हैं.
वैसे तो रैलियों को लेकर लालू चर्चित रहे हैं, जिन्होंने 15 साल के शासनकाल में 13 महारैलियां की हैं. लेकिन यात्राओं का सिलसिला नीतीश ने शुरू किया, जो अब विरोधियों के लिए भी अनुकरणीय बन गया है. पहली बार 1990 में जब लालू मुख्यमंत्री बने थे तब उन्होंने गरीब महारैला का आयोजन किया था. 1997 में चारा घोटाले के मामले में समर्पण के लिए रांची जाने के समय गरीब चेतना रथ यात्रा की. उन्होंने 2004 लोकसभा चुनाव के पहले 30 अप्रैल, 2003 को लाठी में तेल पिलावन रैली आयोजित की. इस चुनाव में आरजेडी ने 24 सीटें जीती थी.
ऐसा नहीं है कि रैलियां और यात्राएं नेताओं की हर मुश्किलें आसान करती रही हैं. लालू ने सितंबर 2005 में गरीब चेतना रथ के जरिए संकल्प यात्रा और अक्तूबर 2007 में चेतावनी रैली की, लेकिन उनकी मुश्किलें कम नहीं हुईं. फरवरी 2005 के चुनाव के पहले पासवान की रैली में लोगों का अपार समर्थन मिला, लेकिन सरकार बनाने के मुद्दे पर खराब प्रदर्शन के कारण आठ माह बाद के चुनाव में वे हाशिए पर आ गए जबकि उन्होंने भाईचारा यात्रा निकाली थी.
सामाजिक कार्यकर्ता अण्णा हजारे ने भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए 30 जनवरी को पटना के गांधी मैदान से आंदोलन शुरू करने का फैसला लिया है. बहरहाल, यात्राएं जनता से जोड़ती हैं और परिवर्तन का माध्यम बनती हैं, ऐसा लोग मानते हैं. लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि यात्राओं की रणभूमि बन चुके बिहार राज्य में नेताओं की जारी यात्राएं इस मनोरथ में कहां तक सफल हो पाती हैं.

