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नए आइआइटी: मूल संस्थानों की परछाई भी नहीं

सरकार ने नए आइआइटी तो खोल दिए हैं लेकिन वहां के बुनियादी ढांचे और शिक्षकों को लेकर कुछ खास नहीं हो सका है. कहीं पढ़ाने वालों की कमी है तो कहीं इमारतें अधूरी पड़ी हैं.

आइआइटी
आइआइटी
अपडेटेड 8 जनवरी , 2013

आइआइटी के आठ नए केंद्र खोलने के चार साल बाद ऐसा लग रहा है कि यह कवायद सिर्फ इन संस्थानों की संख्या बढ़ाने के लिए की गई थी. तब आठ नए इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आइआइटी) बनाए गए थे जिनमें से सात में अब भी शिक्षकों की संख्या निर्धारित पदों से आधी है.

आइआइटी जिस शैक्षणिक श्रेष्ठता के लिए पहचाने जाते हैं, ये आठों नए संस्थान उससे कितने दूर हैं, इसका खुलासा मानव संसाधन मंत्रालय की नई रिपोर्ट से होता है. रिपोर्ट के मुताबिक, आइआइटी-हैदराबाद को छोड़कर बाकी सातों संस्थानों में स्थायी फैकल्टी पदों के मामले में 40 से 50 फीसदी की कमी है.

आइआइटी-रोपड़ (पंजाब) और सबसे नए आइआइटी-मंडी (हि.प्र.) में 49 और 53 फीसदी स्थायी फैकल्टी पद अब तक खाली हैं. इससे भले ही शैक्षणिक कार्य में कोई बड़ी बाधा न आती हो क्योंकि इनकी भरपाई अस्थायी नियुक्तियों या गेस्ट लेक्चरर से की जा रही है, लेकिन इस कमी की वजह से शैक्षणिक कार्यक्रमों की संख्या पर असर पड़ा है और जाहिर तौर पर इससे एडमिशन लेने वाले छात्रों की संख्या भी प्रभावित हुई है.IIT

इस नाकामी की कई वजहें गिनाई जा रही हैं. सबसे बड़ी समस्या इनका सुदूर इलाकों में स्थित होना है. एक आइआइटी प्रमुख ने बताया, ‘‘कोई नया आइआइटी ऐसी जगह पर नहीं खुलना चाहिए जो पर्याप्त विकसित न हो. कोई भी अच्छा शिक्षक वहां क्यों जाना चाहेगा जहां कनेक्टिविटी ठीक न हो और उसके बच्चों के पढऩे के लिए शहर में अच्छे संस्थान न मौजूद हों या जहां उसके साथी के लिए रोजगार की संभावनाएं न हों?’’

ऐसा नहीं है कि यह समस्या संस्थान के डायरेक्टर या सरकार के सामने अचानक आ गई हो. यूपीए सरकार के 2008 में मंडी, जोधपुर, गांधीनगर, रोपड़, हैदराबाद, इंदौर, भुवनेश्वर और पटना में आठ नए आइआइटी की स्थापना के फैसले की कड़ी आलोचना हुई थी. नए संस्थानों में फैकल्टी की कमी के अलावा कई संस्थानों की स्थापना के चार साल बाद भी उनके डायरेक्टर अस्थायी कैंपस में काम कर रहे हैं. आइआइटी-मंडी और भुवनेश्वर को छोड़ दें, तो बाकी संस्थानों में स्थायी परिसर का निर्माण कार्य अभी तक शुरू नहीं हो सका है.

मानव संसाधन मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, हाल ही में हुई एक समीक्षा बैठक में मंत्रालय के नए मुखिया पल्लम राजू को इन समस्याओं से रू-ब-रू कराया गया है. मंत्रालय इस मसले से निबटने में आपात रणनीति अपना रहा है. सभी केंद्रीय संस्थानों को शिक्षकों के खाली पड़े पदों पर भर्तियां करने के लिए पत्र लिखने के अलावा मंत्रालय ने हर महीने नए आइआइटी और आइआइएम के संदर्भ में समीक्षा बैठकें शुरू कर दी हैं ताकि काम की प्रगति का जायजा लिया जा सके. 

कैंपस की भौगोलिक स्थिति से उपजी दिक्कतों को संतुलित करने के लिए नए संस्थानों ने माहौल के हिसाब से अनुकूल क्षेत्रों में विशेषज्ञता की शुरुआत की है. मसलन, आइआइटी-मंडी सस्टेनेबल डेवलपमेंट में विशेषज्ञता पर काम कर रहा है तो आइआइटी-रोपड़ में नियुक्त किए गए शिक्षकों के परिजनों को शोध या शिक्षण के मौके भी मुहैया कराए गए हैं. लगता यही है कि इन संस्थानों की हालत सुधरने में अभी समय लगेगा.

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