पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में वीरभद्र सिंह के आवास होली लॉज के बाहर 20 दिसंबर को लगातार फूट रही पटाखों की झड़ी कांग्रेस के फिर से उभार को साफ दिखा रही है. इस कायापलट की पटकथा अकेले लिखने वाले व्यक्ति वहां खड़े थे, जहां उन्हें सबसे ज्यादा सहज लगता है: पटाखों के बीच.
बुशहर के अदम्य राजा और हिमाचल प्रदेश के पांच बार मुख्यमंत्री रह चुके 78 वर्षीय वीरभद्र सिंह ने निवर्तमान मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल पर अद्भुत जीत दर्ज की. बीजेपी इस भरोसे दोबारा सत्ता में आने की आस लगाए बैठी थी कि यूपीए पर भ्रष्टाचार का दाग लगने की वजह से देश की जनता का उससे मोहभंग हो गया है.
यह फैक्टर उत्तर प्रदेश, पंजाब और यहां तक कि उत्तराखंड में भी कांग्रेस के खिलाफ गया था, जहां उसे 2012 की शुरुआत में हुए चुनाव में मामूली बहुमत से विजय मिली थी. हिमाचल ने इस साल कांग्रेस को पहली निर्णायक जीत दी है.
धूमल को उम्मीद थी कि केंद्रीय इस्पात मंत्री रहने के दौरान वीरभद्र पर लगा घूस लेने का आरोप उनके खिलाफ जाएगा. वीरभद्र ने कहा, ''यहां के लोग जानते हैं कि मेरे खिलाफ लगाए गए आरोप काल्पनिक हैं.” 'मैंने तो आपको पहले ही बता दिया था’ जैसी भंगिमा दिखाते हुए उन्होंने कहा, ''मैं माद्दा रखने वाला ईमानदार आदमी हूं.”
वीरभद्र और उनके 22 वर्षीय पुत्र विक्रमादित्य, दोनों ने हरी पट्टी वाली हिमाचली टोपी पहन रखी थी. यह टोपी उनकी पहचान बन चुकी है. अपने एक जैसे हैरिस ट्वीड कोट के नीचे उन्होंने गले में पश्मीना मफलर बांध रखा था. इस अनुभवी नेता ने कहा, ''प्रशासन में गहरे तक जम गई सड़ांध को साफ करने के लिए मुझे एक बड़ी झाड़ू लेनी पड़ेगी.” उन्होंने कहा कि उनकी सरकार 'आम आदमी की सरकार’ होगी.
क्या इसका मतलब यह है कि वे एक बार फिर मुख्यमंत्री बनेंगे? वीरभद्र ऐसे दिन कोई नया विवाद नहीं खड़ा करना चाहते जब खुद उनके मुताबिक अब तक के सबसे कठिन चुनाव में उन्हें विजय मिली है. अपनी आंखों में चमक के साथ उन्होंने कहा, ''इसके लिए कतार लगी है और मैं उसमें कूदना नहीं चाहता.” एक चतुर मुस्कान के साथ उन्होंने पार्टी हाइकमान पर पूरा विश्वास जताते हुए कहा, ''कौन मुख्यमंत्री बनेगा इसका निर्णय पूरी तरह से हाइकमान को करना है और मैं तो पार्टी का एक विश्वस्त सिपाही हूं.”
कांग्रेस के भीतर उनके प्रतिद्वंद्वी इस बात पर जोर देते हैं कि मुख्यमंत्री कार्यालय तक का वीरभद्र का इस बार का रास्ता पहले जैसा आसान नहीं होगा. हिमाचल प्रदेश कांग्रेस के पूर्व प्रमुख कौल सिंह ठाकुर कहते हैं, ''कैसे बन जाएंगे सीएम? उनके कह देने से क्या होता है. फैसला तो हाइकमान को करना है.”
ठाकुर को उम्मीद है कि केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा से उनकी नजदीकी उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाएगी. सूत्रों ने संकेत दिया है कि वीरभद्र की संभावनाओं को पलीता लगाने का काम नतीजे आने से पहले ही शुरू हो चुका है. आनंद शर्मा के एक और वफादार, एआइसीसी के हिमाचल प्रदेश के प्रभारी महासचिव बीरेंद्र सिंह ने वीरभद्र के प्रति अपनी असहजता को छुपाया नहीं है. उन्होंने दिल्ली में 16 दिसंबर को पार्टी प्रत्याशियों की एक बैठक बुलाई थी.
पार्टी सूत्रों के अनुसार यह कवायद राज्य में वैकल्पिक नेतृत्व पर नेताओं की प्रतिक्रिया भांपने के लिए की गई थी. सोनिया गांधी की पसंदीदा विद्या स्टोक्स भी कुर्सी की आस लगाए हुए बैठी हैं हालांकि वे बीमार हैं. 84 वर्षीया स्टोक्स आठवीं बार चुनाव जीतने वाली सबसे बुजुर्ग नेता हैं. पार्टी में वीरभद्र विरोधी खेमे की योजना है कि उनके खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोपों का हवाला देकर उन्हें मुख्यमंत्री बनने से रोका जाए.
यहां तक कि जीत के दिन भी दिल्ली की प्रतिक्रिया साफ तौर से सुस्त ही दिख रही थी. वीरभद्र सिंह ने इंडिया टुडे से कहा, ''नहीं, अभी उन्होंने (सोनिया) फोन नहीं किया है. वे फोन करेंगी. आखिरकार पूरा चुनावी अभियान उनके ही निर्देशन में चलाया गया है.”
पूर्व मंत्री हर्ष महाजन कहते हैं, ''हाइकमान को यह पता है कि चुनाव के एक माह से भी कम समय पहले यदि वीरभद्र सिंह को प्रदेश कांग्रेस का मुखिया नहीं बनाया गया होता तो पार्टी इसकी आधी सीटें भी नहीं जीत पाती.” उन्होंने दावा किया कि राहुल गांधी ने बार-बार यह संकेत दिया है कि कांग्रेस की जीत पर वीरभद्र सिंह को ही मुख्यमंत्री बनाया जाएगा.
उधर आत्मविश्वास से लबरेज लेकिन सचेत वीरभद्र ने संकेत दिया कि यदि उन्हें शीर्ष पद देने से इनकार किया गया तो वे बिना लड़े आसानी से हार नहीं मानेंगे. उन्होंने कहा, ''लोग मुझे बहुत अच्छी तरह से जानते हैं. यह मेरा मुख्यमंत्री के रूप में छठा कार्यकाल होगा. यह सिर्फ इसलिए हो सका है कि लोग, यहां तक कि बीजेपी को वोट देने वाले लोग भी मुझ्में और मेरी सरकार में भरोसा करते हैं.”
दूसरी ओर, बीजेपी के प्रेम कुमार धूमल ने अपनी हार मान ली. उन्होंने काफी दूर गुजरात के जादू का अंश हासिल करने के लिए दिन की शुरुआत अपने 'अच्छे दोस्त’ नरेंद्र मोदी को फोन करके की. इसके तीन घंटे बाद वे अपने धुर विरोधी वीरभद्र को बधाई दे रहे थे. आखिरकार बीजेपी के लिए कुछ भी काम न आया—उनके सभी अभियानों में एलपीजी सिलिंडरों की घरेलू आपूर्ति पर केंद्र सरकार के अंकुश का विरोध शामिल था. चुनाव से पहले केंद्र सरकार ने हर परिवार को मिलने वाले रसोई गैस सिलिंडरों की संख्या सीमित करने का ऐलान किया था. केंद्र के इस उपाय को लोगों ने पार्टी के लिए आत्मघाती करार दिया था और उन्हें लग रहा था कि चुनाव में मतदाता अपनी नाराजगी दिखा सकते हैं.
लेकिन बीजेपी नेताओं ने रसोई में आग लगाने वाले इस उपाय के खिलाफ जनभावना को भुनाने के लिए ज्यादा मेहनत नहीं की. शायद धूमल ने वीरभद्र की सलाह मान ली थी. वीरभद्र ने राजीव भवन पर अपने समर्थकों के समक्ष कहा था, ''आप अपनी जनता की हर समस्या के लिए केंद्र सरकार पर दोष मढऩा कब तक जारी रखेंगे? आखिरकार आपको ही कुछ करके दिखाना होगा.” इसके बाद बगल में खड़े एक सहयोगी से उन्होंने धीरे से कहा, ''क्या उन्हें पता नहीं है कि हमारे ग्रामीणों के पास लकड़ी के रूप में ईंधन की असीमित आपूर्ति है, इसलिए वे अपना खाना पकाने के लिए गैस सिलिंडर का इंतजार नहीं करते?”
इस तरह की व्यावहारिक सलाह ऐसा व्यक्ति ही दे सकता है जिसकी जनता की नब्ज पर पकड़ हो. वीरभद्र सिंह ने हिमाचल प्रदेश को बीजेपी से छीनकर कांग्रेस की झेली में डाल दिया है. ऐसे में उनके समर्थकों की यह उम्मीद बेजा नहीं है कि पार्टी इसका एहसान जरूर चुकाएगी.

