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छत्तीसगढ़: समानता मांगते मास्टर साहब

भारत के भविष्य की नींव को मजबूत करने का जिम्मा जिन कंधों पर है, क्या उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने का भी अधिकार नहीं है? छत्तीसगढ़ में 12 दिसंबर से जारी शिक्षाकर्मियों की हड़ताल के दौरान उनके साथ जैसा व्यवहार हो रहा है, उससे तो यही लगता है.

अपडेटेड 8 जनवरी , 2013

भारत के भविष्य की नींव को मजबूत करने का जिम्मा जिन कंधों पर है, क्या उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने का भी अधिकार नहीं है? छत्तीसगढ़ में 12 दिसंबर से जारी शिक्षाकर्मियों की हड़ताल के दौरान उनके साथ जैसा व्यवहार हो रहा है, उससे तो यही लगता है.

यहां, समान काम-समान वेतन की मांग कर रहे गुरुजनों को खदेड़ा जा रहा है. सम्मानजनक वेतन पाने के लिए आमरण अनशन पर बैठे और कम वेतन में जैसे-तैसे गुजारा कर रहे शिक्षाकर्मियों को निलंबित कर डराया जा रहा है. राज्य शिक्षाकर्मी संघ के संचालक सदस्य संजय शर्मा बताते हैं, ''एक शिक्षाकर्मी की पत्नी ने जान दे दी क्योंकि उसके पति को बर्खास्तगी का नोटिस मिला था. हड़ताल में शामिल पांच शिक्षकों की तो मौत हो गई. ''

आंदोलनकारियों की मानें तो सरकार इन्हें बीमारी के कारण हुई मौत बताकर बचना चाहती है. इधर, स्कूली शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल अब भी अपनी सरकार का बचाव करते हुए कहते हैं, ''सरकार ने पहले भी शिक्षाकर्मियों के हित में कई निर्णय किए हैं. उसे असंवेदनशील मानना गलत है. ''Teacher status Chhatishgarh

इस आंदोलन की नींव अविभाजित मध्य प्रदेश के दौरान बने शिक्षक भर्ती नियम के साथ ही तैयार हो गई थी, जिसके चलते शिक्षक दो वर्गों में बंट गए थे-नियमित या सरकारी शिक्षक और पंचायत या नगर निगमों जैसी स्थानीय संस्थाओं के तहत आने वाले शिक्षक, जिन्हें पंचायत शिक्षक या शिक्षाकर्मी कहा जाता है.

नियमित शिक्षकों के समान वेतन और पंचायत से सरकार में अपने संविलयन की मांग को लेकर प्रदेश के हजारों शिक्षाकर्मी रायपुर में परिवार सहित बेमियादी हड़ताल पर बैठे हैं. इससे 40,000 से ज्यादा स्कूलों में पढ़ाई ठप हो गई है. प्राइमरी और मिडल स्कूलों की हालत तो और खराब है क्योंकि वहां 80 फीसदी से ज्यादा शिक्षाकर्मी हैं.

शिक्षाकर्मियों का दर्द यह है कि उनसे काम तो नियमित शिक्षकों जितना लिया जाता है जबकि वेतन उनसे आधा भी नहीं मिलता. धरना स्थल पर बैठे शिक्षक प्रीतम साहू कहते हैं, ''अब तो कोई और काम भी नहीं कर सकते. '' शिक्षाकर्मियों का समान पद-समान वेतन आंदोलन लंबे समय से चला आ रहा है. वे हर साल दो बार हड़ताल करते हैं और सरकार वेतन में थोड़ी वृद्धि कर देती है. इसी के चलते 2001 में शिक्षाकर्मी वर्ग-3 का वेतन 2,250 रु. प्रति माह था जो अब 7,650 रु. हो गया है.

इस बार आंदोलन में तल्खी अधिक होने की खास वजह है. प्रदेश में अगले साल चुनाव होने हैं, ऐसे में शिक्षाकर्मियों को लगता है कि उनकी दाल गल सकती है. विपक्ष भी इस मुद्दे को भुना रहा है. पंचायत शिक्षकों की मांगों को लेकर कांग्रेस ने विधानसभा में दो दिन जोरदार हंगामा किया.

विपक्ष के नेता रवींद्र चौबे कहते हैं, ''रमन सरकार ने पंचायत शिक्षकों के साथ वादाखिलाफी की है. बीजेपी ने अपने घोषणा-पत्र में कहा था कि सरकार बनते ही शिक्षाकर्मियों की मांगें पूरी कर दी जाएंगी लेकिन अब निलंबन और बरखास्तगी की कार्रवाई कर उनमें डर पैदा किया जा रहा है. '' शिक्षाकर्मियों को समर्थन देने पहुंचे पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने कांग्रेस की सरकार आते ही सबसे पहले उनके संविलयन का भरोसा दिया. यह बात और है कि खुद उनके कार्यकाल के दौरान भी शिक्षाकर्मियों को लाठियां ही मिली थीं.

शिक्षाकर्मी संविलयन की मांग जरूर कर रहे हैं लेकिन पंचायत विभाग में सचिव रहे एक आला आइएएस अधिकारी की मानें तो यह आसान नहीं है. उनके मुताबिक शिक्षाकर्मियों की नियोक्ता पंचायत है और नियोक्ता को बदला नहीं जा सकता. वैसे भी प्रदेश में नियमित शिक्षकों के कैडर को खत्म कर दिया गया है, ऐसे में सवाल यह भी है कि संविलयन किसमें किया जाएगा. नियमित शिक्षक रिटायर होते जा रहे हैं और उनकी जगह पर शिक्षाकर्मियों की ही नियुक्ति हो रही है.

सार्वजनिक रूप से शिक्षाकर्मियों का समर्थन कर रही कांग्रेस के ही एक वरिष्ठ नेता दबी जुबान से कहते हैं, ''वेतन में विसंगती तो है लेकिन उनकी मांग इसलिए जायज नहीं है क्योंकि सरकारी शिक्षकों का कैडर खत्म हो गया है. '' मगर शिक्षाकर्मी निर्णायक मूड में हैं इसीलिए अब तक पांच शिक्षाकर्मियों की मौत हो जाने के बावजूद आंदोलन बदस्तूर जारी है. संजय शर्मा कहते हैं, ''जब तक सारी मांगें पूरी नहीं होंगी, आंदोलन खत्म नहीं होगा. यह आखिरी और निर्णायक लड़ाई होगी. '' लेकिन सरकार भी नरम पड़ती नहीं दिख रही. पंचायत मंत्री हेमचंद यादव कहते हैं, ''छत्तीसगढ़ सरकार शिक्षाकर्मियों को अन्य राज्यों से अधिक वेतन दे रही है.''

बहरहाल, सरकार ने शिक्षाकर्मियों से बातचीत करने के लिए मंत्रिमंडल की उपसमिति का गठन किया है. इस समिति में स्कूली शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल, पंचायत मंत्री हेमचंद यादव, उच्च शिक्षा मंत्री रामविचार नेताम और आदिवासी मंत्री केदार कश्यप शामिल हैं. लेकिन आंदोलनकारी शिक्षक इससे संतुष्ट नहीं हैं और इसे खानापूर्ति भर करार देते हैं. शिक्षाकर्मियों के मुद्दे को लेकर पिछले 12 साल में अलग-अलग सरकारों ने 15 कमेटियां बनाई थीं लेकिन नतीजा सिफर रहा. देखें, एक और कमेटी क्या रंग लाती है?

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