समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख मुलायम सिंह यादव कलाबाजी के उस्ताद हैं. 19 दिसंबर को उत्तर प्रदेश के नगीना से सपा सांसद यशवीर सिंह ने संसदीय कार्य राज्यमंत्री वी. नारायणसामी के हाथ से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों को प्रमोशन में आरक्षण प्रदान करने वाले 117वें संविधान संशोधन विधेयक 2012 की प्रति उस वक्त छीन ली, जब वे लोकसभा में विधेयक प्रस्तुत करने जा रहे थे. इससे हंगामा शुरू हो गया और सदन की कार्यवाही ठप हो गई.
हालांकि लोकसभा में बैंकिंग कानून (संशोधन) विधेयक, 2012 का रास्ता साफ करने के लिए मुलायम ने एक दिन पहले ही सरकार और वामपंथी पार्टियों के बीच एक समझौते की मध्यस्थता की थी. जबकि उसके तीन दिन पहले सपा के कुछ सांसदों ने सरकार को खूब खरी-खोटी सुनाई थी कि वह रिटेल में एफडीआइ और संविधान संशोधन विधेयक जैसे मुद्दों पर समर्थन पाने के लिए मुलायम पर दबाव बनाने हेतु केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) का इस्तेमाल कर रही है.
सच तो यह है कि सरकार और सपा सुप्रीमो के बीच रिश्तों की शक्ल अब बदल जाएगी, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 13 दिसंबर को सीबीआइ को यह निर्देश दे दिया है कि वह मुलायम और उनके दो पुत्रों अखिलेश तथा प्रतीक के 1993-2005 के बीच जमा की गई संपत्ति के मामलों की जांच जारी रखे. हालांकि अदालत ने अखिलेश की पत्नी डिंपल के खिलाफ जांच करने से सीबीआइ को रोक दिया क्योंकि उस अवधि में वे किसी लोक पद पर नहीं थीं.
इससे हताश मुलायम ने पूर्व सीबीआइ निदेशक यू.एस. मिश्र के कथन का हवाला दिया कि सीबीआइ अक्सर सरकार के दबाव में कार्य करती है. 14 दिसंबर को मिश्र ने एक टीवी समाचार चैनल से कहा था, ''बड़े राजनेताओं के खिलाफ जांच करते समय प्रोग्रेस रिपोर्ट को लटकाए रखने या किसी खास तरीके से पेश करने के लिए (कुछ लोगों द्वारा) दबाव बनाया जाता है.”
उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त महाधिवक्ता गौरव भाटिया कहते हैं, ''सीबीआइ को स्वायत्त होना चाहिए. यह केंद्र से पीड़ित सभी पार्टियों की मांग है. एक स्वायत्त एजेंसी के रूप में वह न्यायसंगत और निष्पक्ष जांच करने में सक्षम हो सकेगी.”
तथ्य यह है कि महत्वपूर्ण मामलों का निपटारा करने में सीबीआइ का पिछला रिकॉर्ड कुछ खास उम्मीद नहीं जगाता. तब तो और भी ज्यादा, जब वह विपक्षी नेताओं से जुड़ा हो. अक्सर ऐसी जांच लंबे समय तक रेंगती रही है और संकट के समय सत्तारूढ़ दलों को संकट से निजात दिलाने के लिए एजेंसी पर जांच परिणामों के साथ छेड़छाड़ करने के आरोप भी लगे हैं. कई मामलों में उसके निष्कर्षों को अदालतों ने खारिज कर दिया है.
पूर्व सीबीआइ निदेशक जोगिंदर सिंह कहते हैं, ''सीबीआइ के पास कोई स्वायत्तता नहीं है. उसे संसद के प्रति जवाबदेह बनाया जाना चाहिए. संयुक्त सचिव या उससे ऊपर के ओहदे के अधिकारियों से संबंधित मामलों में अभियोजन हेतु मंजूरी प्राप्त करने से लेकर आरोप पत्र दाखिल करने तक के हर स्तर पर सबकुछ राज्य की दया पर निर्भर हो जाता है.”
लोकपाल विधेयक पर विचार करने वाली संसद की प्रवर समिति ने सिफारिश की थी कि सीबीआइ निदेशक को एक ऐसे कोलेजियम द्वारा नियुक्त किया जाना चाहिए, जिसमें प्रधानमंत्री, नेता विपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों. बीजेपी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद कहते हैं, ''सीबीआइ का भविष्य स्वायत्तता और प्रोफेशनल रवैए पर निर्भर करता है. सीबीआइ निदेशक और निदेशक, अभियोजन को अलग-अलग होना चाहिए.”
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक विनोद राय भी सीबीआइ को सरकार के चंगुल से मुक्त कराने के अभियान में शामिल हो गए हैं. 7 नवंबर, 2012 को गुडग़ांव में विश्व आर्थिक मंच के एक सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, ''सीबीआइ कार्यपालिका से स्वतंत्र नहीं है. यदि आप चाहते हैं कि वह बढिय़ा काम करे तो जोखिम उठाना होगा और उसे संवैधानिक निकाय में बदलने की हिम्मत दिखानी होगी.” देश की प्रमुख जांच एजेंसी को पूर्ण स्वायत्तता प्रदान करने की मांग का शोर तो फिलहाल बढ़ता ही दिख रहा है.

