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डार्क मोड

बलात्‍कार: छुट्टा घूम रहे हैं भेड़िए

एक लड़की मौत से जूझ रही है और शर्मिंदगी से सिर झुकाए खड़ा राष्ट्र उसके सवालों के जवाब तलाशने में लगा है. क्या बलात्कार की बर्बरता को बिना सजा के ही जाने दिया जाए?

अपडेटेड 9 जनवरी , 2013

सफदरजंग अस्पताल के आइसीयू में वह मॉर्फीन के असर से नीम बेहोशी में पड़ी है, लेकिन उसके आंसू हैं कि थमने का नाम नहीं ले रहे. इस 23 वर्षीया पैरामेडिकल छात्रा को जब 16 दिसंबर को यहां लाया गया था, तो डॉक्टरों ने सोचा भी नहीं था कि वह कुछ घंटे से ज्यादा बच पाएगी.

उसी रात दिल्ली के व्यस्त आउटर रिंग रोड पर चलती बस में छह लोगों ने लगातार 40 मिनट से ज्यादा समय तक उसके साथ बलात्कार किया था. फिर उसे और उसके सॉफ्टवेयर इंजीनियर दोस्त को निर्वस्त्र कर व्यस्त राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-8 पर फेंक दिया गया. दोनों घंटे भर से ज्यादा समय तक वहीं पड़े रहे, चीखते रहे, ताकि कोई तो उनकी मदद को आए. 

उसका इलाज कर रहे एक डॉक्टर जख्मों को देखकर सदमे में हैं. अपने 25 साल के डॉक्टरी कॅरियर में उन्होंने ऐसी बर्बरता नहीं देखी. वे कहते हैं, ‘‘उसके सारे शरीर पर काटने के निशान थे. चेहरा बुरी तरह जख्मी था. उसके गुप्तांगों में सबसे ज्यादा खतरनाक ढंग से चोटें पहुंचाई गई थीं. बलात्कारियों ने लोहे की छड़ और बियर की बोतल से उसे चोट पहुंचाई थी. चोटें गहरी थीं जिससे आंतें और पेट जख्मी हो गए थे.’’

वे अकेले नहीं हैं, पूरा देश इस घटना पर भयंकर गुस्से में है. भारत में हर 22 मिनट पर एक औरत से बलात्कार होता है लेकिन पहली बार ऐसा हुआ कि 18 दिसंबर को संसद सिर्फ इसलिए स्थगित नहीं हुई क्योंकि गुस्साए सांसद छह बलात्कारियों को मौत की सजा देने की मांग कर रहे थे.Rape truth

उस वक्त आम लोग दिल्ली की सड़कों पर थे और दिल्ली पुलिस के मुखिया तथा मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से जवाब मांग रहे थे. कई जगहों पर लोग जुटे, उन्होंने मोमबत्तियां जला कर उस लड़की की सलामती की दुआ मांगी. अचानक सोशल मीडिया पर इंसाफ की मांग करने वाली पिटीशन का ढेर लग गया. जल्द ही इंसाफ की गुहार पूरे देश में फैल गई.

अमूमन कड़े दिल वाले पुलिस अफसर और भीड़भाड़ वाले सरकारी अस्पतालों के अभ्यस्त चिड़चिड़े डॉक्टर, जो अपनी जिंदगी में इंसानियत के खिलाफ जाने कितने बर्बर अपराधों के गवाह होंगे, वे सब इस घटना में लड़की के साथ हुई दरिंदगी को देखकर हिले हुए हैं. आखिर इससे बुरा क्या हो सकता है कि जब सड़क किनारे वह लड़की अपने मित्र के साथ, सहारे की एक उंगली थामने के लिए चीत्कार कर रही थी, जाने कितने लोग वहां से गुजरे लेकिन कोई ठिठका तक नहीं.

बाद में किसी राहगीर ने आधी रात के करीब पुलिस को फोन किया, तब जाकर एक पीसीआर वैन दोनों को उठाकर ले गई. शुरू में उन्हें एम्स के ट्रॉमा सेंटर ले जाया गया, बाद में पुलिस ने पाया कि जहां से उन्हें उठाया गया था वह जगह सफदरजंग अस्पताल के अधिकार क्षेत्र में आती है.

सफदरजंग अस्पताल, एक ऐसा जर्जर सरकारी संस्थान, जो लगता है बस फूट पडऩे को हो. एक अदद बिस्तर पाने के लिए मरीजों की कतार जैसे-जैसे बढ़ती जाती है, वे कॉरिडोर से लेकर हर उपलब्ध जगह में एडजस्ट किए जाते हैं. कई तो बिना कंबल के हैं. वार्डों से निकलती बीमार गंध और ओवरफ्लो शौचालयों से उठता पेशाब का भभका अस्पताल के गलियारे में पसरा है. इस सबसे बेसुध वह लड़की अस्पताल के आइसीयू में अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष कर रही है. उसका हाल सुनाते हुए एक नर्स फूट पड़ती है.

अस्पताल के चिकित्साधिकारी बी.डी. अथानी किसी तरह खुद को थामे हुए हैं. वे बताते हैं कि डॉक्टरों की एक टीम उसकी हालत पर नजर रखे हुए है और सारे आपात उपाय किए जा रहे हैं. उसकी आंतें जख्मी हो गई थीं और उनमें जहर फैलने का खतरा था, इसलिए डॉक्टरों ने उसे 19 दिसंबर को ऑपरेशन से निकाल दिया है. उसका शरीर किसी और ऑपरेशन की गवाही नहीं दे रहा जबकि दो-तीन और नाजुक ऑपरेशन जरूरी हैं. उसका ब्लड प्रेशर और दिल की धड़कन तेज है. ब्लड प्लेटलेट खतरनाक तरीके से गिरते जा रहे हैं.

देहरादून से फिजियोथेरपी का कोर्स करने के बाद यह लड़की दिल्ली के किसी अस्पताल में इंटर्न बनने आई थी. उसके मां-बाप को दिल्ली पर ज्यादा भरोसा नहीं था, सो वे भी साथ रहने चले आए. उसकी मां अब लगातार अस्पताल में बेटी के सिरहाने बैठी रहती हैं. वे इतना सहम गई हैं कि उन्होंने 18 दिसंबर को सोनिया गांधी तक को अपनी बेटी से नहीं मिलने दिया. सोनिया के वहां पहुंचने के कुछ ही घंटे पहले बेटी ने जीने की इच्छा मां से जाहिर की थी.

डॉक्टर बताते हैं कि उसने अपनी मां के लिए एक पर्ची पर लिखा था, ‘‘मैं जीना चाहती हूं.’’ तब से लेकर आज तक, उसकी हालत बिगड़ती गई है. जख्मों की वजह से शरीर में खतरनाक इन्फेक्शन हो गया है. डॉक्टरों को नहीं पता कि ये इन्फेक्शन ज्यादा खतरनाक है या उसकी जिजीविषा! उसे देखने वाली नर्स नम आंखों से बताती हैं, ‘‘इसे नहीं पता कि उसके हाल ने देश में क्या कर डाला है. उम्मीद कर सकते हैं कि व्यवस्था कुछ बदल सके और उसे देखने के लिए यह जिंदा रह सके.’’ उसे अपने मानसिक जख्म से भी जूझना होगा.rape

बलात्कार की शिकार महिलाओं के साथ और उनके पुनर्वास के लिए काम करने वाले क्राइम साइकोलॉजिस्ट डॉ. रजत मित्रा इस बात पर नाराज हैं कि देश में ऐसी औरतों के लिए कोई संस्थागत सहयोग तंत्र मौजूद नहीं है. वे कहते हैं, ‘‘सामान्य जीवन बिताने के लिए इस लड़की को लगातार लंबे समय तक मदद चाहिए.’’

यह संभव है कि जिस किस्म का दबाव इस घटना के बाद लोगों ने बनाया है, उसके चलते यह लड़की उस अपमान से मुक्त हो सके जो दूसरी बलात्कार पीड़िताओं को अपराधी के पकड़े जाने के बावजूद जिंदगी भर झेलना पड़ता है. एडीशनल सॉलिसिटर जनरल इंदिरा जयसिंह कहती हैं, ‘‘अव्वल तो पुलिस ही ऐसे मामलों से निपटने के लिए संवेदनशील नहीं होती. दूसरे, बलात्कार की शिकार से अदालतों में संवेदनहीन सवाल पूछे जाते हैं.’’ यहां तक कि बलात्कार के मामलों में गवाहों को प्रताड़ित भी किया जाता है. तकरीबन ऐसे ही दिल दहला देने वाले एक मामले में जनवरी 2009 में नोएडा की 24 वर्षीया एमबीए छात्रा और उसके मित्र को 11 लोगों ने ग्रेट इंडिया प्लेस मॉल के पास से उठाया था. वे जबरन उनकी कार में घुस गए और उसे गढ़ी चौखंडी गांव में एक सुनसान जगह पर ले गए जहां सब ने बारी-बारी से बलात्कार किया.

इस मामले में लड़की के मां-बाप ने उसे लंदन भेज दिया जबकि घटना के इकलौते गवाह उसके मित्र को पुलिस धमकाती रही. मामले से परिचित वकील बताते हैं, ‘‘लिस ने उसे प्रताड़ित किया. वह दिल्ली में रहता था लेकिन हर तारीख पर सुनवाई के लिए उसे गौतमबुद्ध नगर जिला अदालत जाना होता था. हमारी न्याय प्रणाली जिस तरीके से काम करती है, कभी एक पक्ष नदारद रहता है तो कभी दूसरा, लेकिन लड़के को हर तारीख पर जाना होता था.’’

दोषियों ने लड़के को धमकाया और मामला वापस लेने को कहा. वकील बताते हैं, ‘‘उसने धमकियों के बारे में पुलिस को तीन बार लिखा. फरवरी 2012 में उसने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई और मामले को दिल्ली के कोर्ट में स्थानांतरित करने का आवेदन दिया. मुकदमा दिल्ली आ गया. सुनवाई जारी है. लड़की अक्तूबर में वापस आ गई है. उसने दोषियों की शिनाख्त कर ली है, हालांकि अब भी यह नहीं पता कि फैसला कब तक आएगा.’’

भारत के पूर्व अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी कहते हैं कि पूरी व्यवस्था ही बदलनी चाहिए. संदेश साफ  होना चाहिए: अपराधी को दंड मिलेगा. यही नहीं, पीड़ित के साथ संवेदना से पेश आना चाहिए. हो सकता है कि मौजूदा घटना इस मामले में निर्णायक साबित हो कि लोगों के सोचने का तरीका बदल सके. जो लोग दिल्ली की सड़कों पर विरोध में उतरे, उनकी प्रतिक्रिया से यह बात झलकती है.

कानपुर से दिल्ली घूमने आए छात्र आतिफ कहते हैं, ‘‘ऐसी मानसिकता किसी स्वस्थ इंसान की नहीं हो सकती. हमें युवाओं को शिक्षित करना होगा कि महिलाओं से कैसे पेश आया जाता है.’’ इस घटना पर इतना जबरदस्त गुस्सा फूटा कि अखिल भारतीय जनवादी महिला संघ की 200 प्रदर्शनकारियों के साथ भारी संख्या में छात्र और प्रोफेशनल लोग पुलिस मुख्यालय के सामने जुटे. ऐसे ही प्रदर्शन बनारस, कानपुर, मुंबई में भी हुए.

मौजूदा बलात्कार कानून को बदलने को लेकर कानूनविद और वकील संशय में हैं. उनका कहना है कि हत्या के लिए मृत्युदंड का प्रावधान है ही, पर उससे हत्या नहीं रुकी हैं, न ही हत्या  कम हुई हैं. सामूहिक बलात्कार के मामले में 10 साल कैद से लेकर उम्रकैद पर्याप्त सजा है, बशर्ते इंसाफ समय रहते हो.

जो भी हो, एक बड़े शहर में नया जीवन शुरू करने आई लेकिन आज अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी मौत से जूझ रही एक लड़की की जिंदगी क्या उससे बदल पाएगी? क्या उसे इस हालत में लाने वाले वे छह लोग अपने बर्बर अपराध की कीमत चुकाएंगे? हम दोनों ही सवालों का जवाब हां में नहीं दे सकते, और यह अपने आप में बताने के लिए काफी है कि हमारी आधुनिकता कितनी छिछली है, हमारी आजादी कितनी खोखली है!

-राहुल जयराम और जयंत श्रीराम के साथ

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