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एएमयू विवाद: यूनिवर्सिटी को जमीन का ब्रेक

बिहार में यूनिवर्सिटियों की जमीन आवंटन पर विवाद फैशन बन गया है. अब एएमयू पर मचा है बवाल.

अपडेटेड 7 जनवरी , 2013

ज्ञान स्थली बिहार में शिह्ना से जुड़ी कोई भी पहल टेढ़ी खीर साबित हो रही है. सेंट्रल यूनिवर्सिटी के निर्माण स्थल के चयन पर बिहार और केंद्र के बीच जारी गतिरोध अभी थमा भी नहीं कि किशनगंज में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) की ब्रांच की जमीन पर नया बवाल खड़ा हो गया है. यह मुश्किल किशनगंज जिले के चकला मौजा और गोविंदपुरम में एएमयू के लिए हस्तांतरित 224.2 एकड़ जमीन पर आदिवासियों के दावे के बाद से पैदा हुई है.

9 दिसंबर को उन्होंने हस्तांतरित जमीन पर धनुष पूजा कार्यक्रम आयोजित किया. लिहाजा, आदिवासियों और एएमयू समर्थकों में तकरार की स्थिति बन गई. जिला प्रशासन ने तत्काल स्थिति को काबू में कर लिया. सांöदायिक सौहार्द को बिगाडऩे के आरोप में बिहार अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग के अध्यक्ष बाबूलाल टुडू के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है.AMU

पूजा स्थल से दो बोलेरो भी जब्त की गईं. जिनमें से एक टुडू की पत्नी मुनिया टुडू के नाम थी. पुलिस ने जनजातीय हितरक्षा के क्षेत्रीय संगठन मंत्री अजय सिंह और वनवासी कल्याण आश्रम के सचिव माधव त्रिपाठी समेत छह लोगों को गिरफ्तार कर लिया है. हस्तांतरित जमीन पर अस्थायी पुलिस चौकी भी स्थापित की गई है. समस्या का हल ढूंढा जाना अभी बाकी है. इसी वजह से एएमयू की हस्तांतरित जमीन को आदिवासी अपना मान रहे हैं.

दरअसल, विवाद की जड़ आदिवासियों की बंदोबस्त भूमि और एएमयू को हस्तांतरित भूमि का स्थान, खसरा और खाता संख्या का समान होना है. आदिवासियों का कहना है कि उन सब को 1960 से 2011 तक तीन किस्तों में जमीन मिली थी, जिसे एएमयू को सौंप दिया गया है. एएमयू को किशनगंज के चकला मौजा में 116.53 एकड़ और गोविंदपुर मौजा में 107.49 एकड़ जमीन हस्तांतरित की गई है. अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति भू-रक्षा संघर्ष समिति के संयोजक रहे बीजेपी के जिलाध्यक्ष अभिनव मोदी कहते हैं, ''आदिवासियों की बंदोबस्त जमीन के सीमांकन के लिए फरवरी 2012 में 141 लोगों के कागजात जिला öशासन को मुहैया कराए गए थे, लेकिन सिर्फ कागजी औपचारिकताएं ही पूरी की गई हैं.

जिलाधिकारी संदीप कुमार आर. पुडगलकट्टी ने बताया कि आदिवासियों की जमीन की पैमाइश कर उसे सौंपा जा चुका है. वे कहते हैं, ''आदिवासियों के बंदोबस्त भूमि के पुराने परचे में चौहद्दी अंकित नहीं रहने से उनमें भ्रम की स्थिति है. असलियत यह है कि आदिवासियों की बंदोबस्त भूमि की इंच भर जमीन भी एएमयू को नही सौंपी गई है क्योंकि इस जमीन के अलावा भी वहां जमीन उपलब्ध है.

बहादुरगंज से कांग्रेस विधायक मोहम्मद तौसीफ आलम कहते हैं कि कुछ लोग किशनगंज में एएमयू के पह्नधर नहीं हैं, जिससे विरोध हो रहा है. वहीं किशनगंज से कांग्रेस विधायक डॉ.जावेद का आरोप है, ''राज्य सरकार की मंशा साफ नहीं है, जिससे ऐसी स्थिति बनी है. लेकिन अखिल भारतीय विधार्थी परिषद के बिहार-झरखंड प्रांत के संगठन मंत्री गोपाल शर्मा ने यूनिवर्सिटी की स्थापना की बुनियाद पर सवाल उठाते Þए कहा, ''एएमयू ऐक्ट में प्रावधान है कि 25 किलोमीटर के दायरे में ही कोई ब्रांच खुल सकती है, पर वोट की राजनीति की वजह से ऐक्ट की अनदेखी हो रही है. परिषद कानूनी रूप से देश के पांच स्थानों पर एएमयू की ब्रांच का विरोध करती है. उधर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा, ''सरकार ने सोच-समझ्कर एएमयू को जमीन सौंपी है, लेकिन बदनीयती से कोई व्यवधान डालना चाहेगा, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.

एएमयू के कुलपति ले. जनरल (रिटायर्ड) जमीरूद्दीन शाह ने 2013-14 से अकादमिक सत्र शुरू करने का भरोसा दिलाया है. कम साक्षरता दर वाले किशनगंज इलाके में एएमयू की ब्रांच को वरदान माना जा रहा है, पर सियासी तिकड़म और öशासनिक खामियों को देखकर लगता है कि राह इतनी आसान नहीं है.

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