उन्नीस दिसंबर की शाम करीब 4 बजे जब सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव लोकसभा से निकलकर संसद भवन परिसर में मीडिया से मुखातिब होने पहुंचे, तो उनके चेहरे पर सदन में पार्टी के सांसद यशवीर सिंह की एक कांग्रेस सांसद के हाथ हुई हाथापाई का रोष नहीं बल्कि जीत और आत्मविश्वास का भाव था.
लंबे समय बाद तन कर चलते हुए खुद मीडिया के लिए बने स्टैंड तक पहुंचकर नेताजी बोले, ''कांग्रेस के हाथ में सरकार है. बहुमत है, जो मनमानी करना है, करें, लेकिन जनता के बीच जवाब देना होगा. कांग्रेस ने बहुमत के बल पर हमारे सांसद को अपमानित किया है.” लेकिन जब उन्हें याद दिलाया गया कि सरकार का बहुमत उनके ही बलबूते है तो उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा, ''जनता सब देख रही है.”
सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण का मामला अब लोकपाल और महिला आरक्षण बिल की कतार में खड़ा हो गया है, जहां चाह तो है लेकिन वोट बैंक की राजनीति में सहमति की कोई राह नहीं दिख रही. संसद के मानसून सत्र में 5 सितंबर को इसी बिल के विरोध को लेकर राज्यसभा में सपा-बसपा सांसदों में जैसी हाथापाई हुई, वैसा ही नजारा शीतकालीन सत्र में 19 दिसंबर को लोकसभा में दोहराया गया.
सपा ने पहले से तय स्क्रिप्ट के मुताबिक कार्मिक राज्यमंत्री वी. नारायणसामी से बिल छीनने के लिए यूपी की नगीना सुरक्षित सीट से दलित सांसद यशवीर सिंह को आगे बढ़ाया. लेकिन अचानक कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने लपककर यशवीर से बिल वापस लेने की कोशिश की और कुछ ही पल में कांग्रेस सांसद विलास मुत्तेमवार कांग्रेस अध्यक्ष के बचाव में यशवीर से भिड़ गए.
इस घटनाक्रम के बाद मुलायम ने यह आरोप लगाया, ''बिल छीनने की घटना संसद में कोई पहली बार नहीं हुई है. ऐसा पहले भी होता रहा है, लेकिन कांग्रेस के सदस्यों ने हमारे प्रतिष्ठित सदस्य को मारना शुरू कर दिया.” लेकिन दूसरे दिन ही यशवीर ने लोकसभा स्पीकर के सामने खेद जता दिया. इसके बावजूद पदोन्नति में आरक्षण से संबंधित 117वां संविधान संशोधन बिल लोकसभा में आकर अटक गया.
17 दिसंबर को राज्यसभा में सपा के विरोध के बावजूद 206 मतों से बिल के पारित होने के साथ ही मामला निर्णायक सियासी मोड़ पर पहुंच गया था, लेकिन सपा ने लोकसभा में मुलायम की घोषणा के मुताबिक ही विरोध जारी रखा. उन्होंने एक दिन पहले ही कह दिया था, ''यह बिल असंवैधानिक और समाज में भेदभाव पैदा करने वाला है, इसलिए हम इस बिल का विरोध करते रहेंगे और इसके लिए हम हर परिणाम भुगतने को तैयार हैं.” लेकिन लोकसभा में बिल के अटक जाने से बसपा सुप्रीमो मायावती के तेवर तीखे हो गए हैं.
लोकसभा में बिल पर बहस के दौरान मायावती अपने दल-बल के साथ विशेष गैलरी में मौजूद होकर पूरी कार्यवाही देख रही थीं, तो उधर मुश्किल में फंसी कांग्रेस बिल पर आगे बढऩे की हिम्मत नहीं जुटा पाई. लेकिन मायावती ने अब सीधे सरकार की नीयत पर संदेह जताया है. अपनी नाराजगी का इजहार करते हुए उन्होंने कहा, ''लोकसभा में जब सपा सांसदों ने बिल की प्रति फाड़ी थी और सदन में हंगामा कर रहे थे तो सरकार ने उन सदस्यों के खिलाफ कार्रवाई की पहल नहीं की.” उन्होंने कहा कि वे जल्द ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चिट्ठी लिखकर संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग करेंगी.
लेकिन माया के आरोपों पर गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा कि लोकसभा में इस बिल को पारित कराने के लिए खुद सोनिया गांधी ने जो आक्रामक तेवर दिखाए, उससे सरकार की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है. हालांकि आंकड़ों के खेल में कमजोर कांग्रेस की सबसे बड़ी मुश्किल फिलहाल सपा-बसपा दोनों को साथ लेकर चलने की है, इसलिए वह दोनों को पुचकार रही है.
राज्यसभा में मायावती के तीखे तेवर और सीधे सभापति हामिद अंसारी पर निशाना साधने के बाद कांग्रेस ने बीजेपी के समर्थन से बिल को पास करवा लिया, लेकिन लोकसभा में हालात विपरीत हो गए तो सरकार ने भी इच्छाशक्ति नहीं दिखाई.
सपा के विरोध को राज्यसभा में भले कोई साथी नहीं मिला, लेकिन लोकसभा में उसे उस वक्त संजीवनी मिल गई, जब बीजेपी खुद में ही उलझ गई. बीजेपी के मुरली मनोहर जोशी, योगी आदित्यनाथ, मेनका गांधी सरीखे सांसदों ने इस बिल का समर्थन करने पर पिछड़ों-सवर्णों का वोट खिसकने की दलील दी.
हालांकि बीजेपी संसदीय दल की बैठक में भी यह मामला मुखर रूप से उठा था. लेकिन दोनों सदनों में अलग-अलग रुख अपनाने पर होने वाली फजीहत से बचने के लिए बीजेपी ने स्पीकर के साथ हुई बैठक में इस बिल पर सुप्रीम कोर्ट की राय लेने का पैंतरा चल दिया. बीजेपी नेताओं ने दलील दी कि संसद जाति के आधार पर बंटी दिख रही है, जिसका समाज पर गलत असर पड़ सकता है.
हालांकि इस बिल को लेकर कार्मिक राज्यमंत्री नारायणसामी ने राज्यसभा में स्पष्ट किया कि आरक्षण की सीमा 22.5 फीसदी बनी रहेगी. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि 1995 से पहले प्रमोशन पा चुके अधिकारियों पर इस बिल का असर नहीं पड़ेगा और इसके लिए वे राज्यों को चिट्ठी लिखेंगे.
कार्मिक मंत्रालय के एक बयान के मुताबिक, ''प्रमोशन में आरक्षण से कुशलता प्रभावित नहीं हो, इस बारे में अनुच्छेद 335 को बनाए रखने की मांग उठी थी. जिसके बाद विधेयक में संशोधन करके ''या अनुच्छेद 335 में’’ शब्दों को हटा दिया गया था, ताकि अनुच्छेद 335 में उल्लिखित कुशलता की शर्त संविधान का हिस्सा बनी रहे और इसे हटाया न जाए. इसके अलावा इससे यह भी सुनिश्चित हो जाता है कि अनुच्छेद 335 के प्रावधान के प्रभाव कायम रहें, जिसमें आरक्षित रिक्तियों पर प्रमोशन के मामले में एससी-एसटी से संबंधित उम्मीदवारों के लिए मानदंडों में ढील देने की अनुमति है.”
यूपी में सामान्य और पिछड़े वर्ग के कर्मचारी-अधिकारियों ने 'सर्वजन हिताय संरक्षण समिति’ के बैनर तले कांग्रेस-बीजेपी, बीएसपी नेताओं के घरों का घेराव किया. और नेताओं का प्रतीकात्मक दाह-संस्कार और दफ्तरों पर ताले लटकाने का आंदोलन छिड़ गया. जबकि दूसरी ओर 'आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति’ ने सरकारी दफ्तरों में चार घंटे ज्यादा काम करने का एलान कर दिया.
सर्वजन हिताय संरक्षण समिति के अध्यक्ष शैलेंद्र दुबे कहते हैं, ''संविधान संशोधन के बाद एससी-एसटी वर्ग को पदोन्नति में कोटे के साथ-साथ परिणामी ज्येष्ठता का लाभ भी मिलेगा. इसके प्रभाव में राज्य के 18 लाख कर्मचारी आएंगे. सरकारी विभागों में एससी-एसटी का जूनियर कर्मचारी अपने से कहीं ज्यादा सीनियर सामान्य वर्ग के कर्मचारी का बॉस बन जाएगा. इससे प्रशासनिक मशीनरी ध्वस्त हो जाएगी.”
हालांकि आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति के अध्यक्ष अवधेश वर्मा की दलील है, ''प्रमोशन में आरक्षण लागू नहीं होने से उच्च पदों पर एससी-एसटी अधिकारी तैनात नहीं हो पाएंगे.”
स्पष्ट है कि प्रमोशन में आरक्षण का मामला अधर में लटक गया है और राजनैतिक दल अब सुप्रीम कोर्ट से राय लेने पर जोर दे रहे हैं.

