राजस्थान मंत्रिमंडल ने गुर्जरों के अलावा बंजारा, गड़रिया, गाडिय़ा लोहार और रैबारी जातियों के लिए विशेष पिछड़ा वर्ग की नई श्रेणी बनाकर पांच फीसदी अतिरिक्त कोटा देने का फैसला कर एक ऐसा सियासी दांव चला है जो इससे पहले तमाम राज्यों में मुंह की खा चुका है.
तमिलनाडु को छोड़ दें तो देश के किसी भी दूसरे राज्य में 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण की व्यवस्था नहीं है. राजस्थान ने जो दांव अब चला है, उसे 2001 में झारखंड और 2004 के बाद से कई बार आंध्र प्रदेश में चलाया जा चुका है. लेकिन दोनों ही राज्यों को बार-बार अदालत में मात खानी पड़ी. लेकिन अब 50 फीसदी आरक्षण वाले राज्यों की कतार में तमिलनाडु और छत्तीसगढ़ के साथ राजस्थान भी खड़ा हो गया है.
संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप इंडिया टुडे से कहते हैं, ‘‘50 फीसदी की सीमा पार करना कानून और संविधान सम्मत नहीं है. लेकिन तमिलनाडु ने संविधान संशोधन के जरिए आरक्षण की सीमा 50 के पार की है. उसने आरक्षण को नौंवी अनुसूची में डाला है, जबकि राजस्थान और छत्तीसगढ़ ने ऐसा नहीं किया है और इसका अध्ययन करके ही कुछ टिप्पणी की जा सकती है.’’
कश्यप की टिप्पणी उस अवसरवाद की राजनीति की ओर भी इशारा है क्योंकि राज्यों में वोट बैंक के हिसाब से सरकारें कैबिनेट की बैठक में फैसले कर लेती हैं, जो न्यायिक समीक्षा के आगे औंधे मुंह गिर जाता है. कश्यप की दलील है कि संविधान संशोधन के बिना तय सीमा को पार नहीं किया जा सकता, ‘‘अगर आरक्षण 50 फीसदी से ज्यादा होता है तो उसकी मूल भावना ही खत्म हो जाती है.’’
राजस्थान में आरक्षण की सीमा पार करने का यह कोई पहला मौका नहीं है. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 28 नवंबर को कैबिनेट के एक निर्णय के जरिए यह सिफारिश की है कि गुर्जरों और चार दूसरी जातियों को पांच फीसदी का विशेष आरक्षण दिया जाए. लेकिन ऐसा करने से कुल आरक्षण 54 फीसदी हो जाता है. इससे पहले बीजेपी की वसुंधरा सरकार ने गुर्जरों को 5 फीसदी के साथ आर्थिक रूप से पिछड़ों को भी 14 फीसदी आरक्षण तय किया था, जिससे आरक्षण की सीमा बढ़कर 68 फीसदी हो गई थी. लेकिन अब गहलोत सरकार ने राजे के निर्धारित गुर्जर वर्ग के साथ आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए 14 फीसदी आरक्षण और अन्य विशेष कोटे को अलग कर दिया है.
उन्होंने आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए एक अलग आयोग स्थापित करने की बात कही है. जबकि छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार ने तो केंद्र सरकार के पांच साल पुराने नोटिफिकेशन की आड़ में सियासी दांव खेलते हुए. आदिवासियों के आरक्षण को 20 से बढ़ाकर 32 फीसदी कर दिया. अपने इस कदम से मुख्यमंत्री रमन सिंह ने राज्य में बार-बार उठने वाली आदिवासी सीएम बनाने की मांग की धार को भोथरी करने की कोशिश की. लेकिन इसके साथ ही आरक्षण की सीमा 58 फीसदी हो गई. जिसे हाइकोर्ट में चुनौती दी गई और स्टे लगते ही रमन सरकार की सांसें फूल गईं, क्योंकि पुराना कानून खत्म हो चुका था.
इस तरह राज्य की नौकरियों में भर्ती में आरक्षण ही खत्म हो रहा था, जिसके बाद सरकार की अर्जी पर अदालत ने अंतरिम राहत भर दी. वैसे सिंह की दलील है, ‘‘जातियों की आबादी के मुताबिक आरक्षण तय किया गया है, जिसके लिए हमने विधानसभा में कानून बनाया. 50 फीसदी सीमा पार करने के बारे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला स्पष्ट नहीं है.’’
रमन सिंह ने जातीय आबादी को आधार बनाया, लेकिन सवाल उठता है कि अगर उन्होंने केंद्र के नोटिफकेशन पर अमल करने में पांच साल का इंतजार किया तो जातीय जनगणना की रिपोर्ट का इंतजार क्यों नहीं किया? आखिर जातीय गणना की रिपोर्ट से तस्वीर साफ होती और तब ज्यादा तार्किक तरीके से आरक्षण की नई सीमा तय की जा सकती थी. साफ है कि सरकारों की रुचि सामाजिक न्याय से ज्यादा वोट हासिल करने की सहूलियत से जुड़ गई है. गहलोत भी सिंह जैसी ही दलील दे रहे हैं. वे कहते हैं, ‘‘सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी केस में कहा है कि विशेष परिस्थितियों में आरक्षण 50 फीसदी की सीमा पार कर सकता है और इसराणी आयोग ने इसी संदर्भ में सिफारिश की है. जिसे हमने मान लिया है.’’
लेकिन सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण तो तमिलनाडु में भी आरक्षण की तय सीमा के पार होने को गलत बताते हैं. वे कहते हैं, ‘‘कोई राज्य ऐसा नहीं कर सकता. राजस्थान या बाकी राज्यों ने कैसे किया, इसका अध्ययन करना होगा.’’
सुप्रीम कोर्ट की ही एक अन्य वरिष्ठ वकील कमलेश जैन भी 50 फीसदी की सीमा पार करने को असंवैधानिक ठहराती हैं, लेकिन उनका मानना है, ‘‘विधायिका चाहे तो इस सीमा को बढ़ा सकती है, बशर्ते यह अनुचित, अन्यायपूर्ण और मनमाना नहीं होना चाहिए.’’ उनकी दलील है कि न्यायपालिका भी विधायिका के दायरे में आती है.
शाहबानो प्रकरण की नजीर देते हुए वे कहती हैं, ‘‘सुप्रीम कोर्ट ने महिला को न्याय दिया था, लेकिन संसद ने कानून बनाकर उस फैसले को पलट दिया और कोर्ट कुछ नहीं कर पाया. न्यायपालिका भी लाचार है और उसे भी विधायिका के बनाए कानून के दायरे में काम करना पड़ता है.’’
लेकिन सवाल उठता है कि विशेष परिस्थितियों को साबित कैसे किया जाएगा. देश में जातियों के आंकड़े आजादी से पहले 1931 के ही हैं. विशेष परिस्थितियों को परिभाषित करने के मामले में सबसे बड़ा झटका झारखंड को लग चुका है. नया राज्य बनते ही 2001 में मरांडी सरकार ने 73 फीसदी आरक्षण लागू करने की सिफारिश कर दी थी. राज्य सरकार का तर्क था कि झारखंड अत्यंत पिछड़ा राज्य है, ऐसे में वह 50 फीसदी आरक्षण की अधिकतम सीमा को पार न करने की बंदिश से आजाद है. लेकिन मामला जब सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा तो झारखंड जैसे पिछड़े राज्य को भी 50 फीसदी की आरक्षण सीमा मानने को मजबूर होना पड़ा था.
-साथ में पीयूष बबेले

