राजस्थान उच्च न्यायालय ने आदेश दिया है कि राजस्थान में जेलों, स्मारकों, अस्पतालों शैक्षणिक संस्थानों, खेल के मैदानों पर या उनके आसपास लगाए गए 450 मोबाइल फोन टावरों को हटाया जाए. टावरों की लंबाई से जुड़े मुद्दे को अभी नहीं उठाया गया है. प्रदेश में लगभग 5,000 टावर हैं.
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत) आइ.एस. इसरानी और अन्य लोगों की ओर से दायर जनहित याचिका की सुनवाई पर मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अरुण मिश्र और न्यायमूर्ति एन.के. जैन की खंडपीठ ने 27 नवंबर को यह आदेश दिया. याचिका में मोबाइल फोन टावरों से लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर मंडरा रहे खतरे का जिक्र है. उधर सेलफोन संचालकों की ओर से दाखिल रिपोर्ट में जोर दिया गया है कि स्वास्थ्य पर बुरा असर डालने की बात कहीं साबित नहीं हुई है, जबकि याचिकाकर्ताओं की पैरवी करने वाले वकील प्रतीक कासलीवाल ने कहा कि इनसे कई तरह के खतरे हैं. न्यायाधीशों ने एहतियात बरतते हुए यह आदेश दिया क्योंकि बाद में खतरे की बात सही साबित होने पर उससे हुए नुकसान को दूर नहीं किया जा सकेगा. लिहाजा, अदालत ने इस पर अभी ध्यान देना बेहतर समझा.
इस फैसले से टेलीकॉम इंडस्ट्री की शीर्ष संस्था सेल्यूलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के साथ विवाद गर्मा गया है. एसोसिएशन ने फैसले को 'निराशाजनक' करार दिया है. इसके महानिदेशक राजन मैथ्यू ने कहा, ''हमें फैसले से निराशा हुई है. आगे की कार्रवाई हम औपचारिक आदेश मिलने के बाद तय करेंगे. '' इंडस्ट्री का मानना है कि वह भारत सरकार के मानकों के अनुसार काम कर रही है. उसने अदालत के राज्य विशेष याचिका की सुनवाई करने के अधिकार के विरोध में दलील दी कि सेल टावर केंद्र सरकार के क्षेत्राधिकार का विषय है. लेकिन हाइकोर्ट का मानना था कि शिक्षा, खेल, स्वास्थ्य और स्मारक वगैरह राज्य के विषय हैं, इसलिए उसे हस्तक्षेप का अधिकार है.
सेलफोन टावरों ने राजस्थान के गली-कूचों की शक्ल को बिगाड़ दिया है. बेतरतीब लगे टावरों से जैसलमेर के किले की खूबसूरती खो गई है. कई रिहाइशी कॉलोनी, स्कूलों और अस्पतालों पर ये आस-पास लगा दिए गए हैं. अदालत ने सरकार से पूछा है कि मोबाइल टावर रेडिएशन के प्रति लोगों की आशंका को दूर करने के लिए वह क्या कदम उठा रही है. उसे यह भी बताने के लिए कहा गया है कि अभी तक कितने स्कूलों, अस्पतालों और सार्वजनिक स्थलों से टावर हटाए गए हैं. हाइकोर्ट के हस्तक्षेप से राज्य सरकार ने रिपोर्ट तैयार करने और समितियों का गठन करने में थोड़ी तत्परता तो दिखाई, लेकिन इस संबंध में सेल ऑपरेटर्स पर कोई नियम नहीं लागू किया.
प्रतिष्ठित जौहरी परिवार के प्रमोद कासलीवाल के कैंसर से मरने और उनके भाई को कैंसर होने की खबर से जयपुर शहर सकते में है. कासलीवाल के पड़ोस में कुछ टावर लगे हैं. वहां के काफी लोगों को कैंसर होने की बात सामने आई है. सरकार फिलहाल ऐसी कोई सर्वे रिपोर्ट पेश नहीं कर पाई है जो यह दिखा सके कि कैंसर और सेल टावरों में कोई संबंध है. इसलिए हाइकोर्ट ने कासलीवाल मामले पर भी ध्यान देने का आदेश देते हुए इस संदर्भ में उचित मुआवजा और सही कारण की पहचान करने के लिए उचित कार्रवाई के आदेश दिए हैं.
प्रतीक कासलीवाल ने हाल में इंडिया टुडे को बताया कि इटली के कोर्ट ने सेल टावरों से प्रभावित व्यक्ति के पक्ष में मुआवजा दिलवाया है. उनका कहना है कि शहरी विकास एवं आवास मंत्री शांतिलाल धारीवाल के पड़ोस से फौरन टावर हटा दिया गया लेकिन आम लोगों की चिंताएं दूर करने के लिए इतनी जल्दबाजी नहीं दिखाई जा रही है. उन्होंने कहा कि न सेल फोन के इस्तेमाल, न ही उनसे और टावरों से जुड़े जोखिम के बारे में सही तरीके से प्रचार किया जा रहा है. इसरानी ने इंडिया टुडे को बताया कि वे इस फैसले से बेहद संतुष्ट हैं और उन्हें उस दिन का इंतजार है जब सेल टावरों से आम आदमी के जीवन में पड़ते खतरनाक प्रभाव पर ध्यान दिया जाएगा.
सेल्यूलर ऑपरेटर्स अपनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने की तैयारी में हैं. एसोसिएशन के प्रवक्ता ने कहा, ''हमें नागरिकों और अपने उपभोक्ताओं का ख्याल है. भारत सरकार की ओर से निर्धारित सुरक्षा मानकों में बच्चों और रोगियों का ध्यान रखने की बात कही गई है. हम उन मानकों पर पूरी तरह से अमल कर रहे हैं और केंद्र सरकार के साथ काम करते हुए उचित नियमों और सुरक्षा मानकों का पालन करने का वादा करते हैं. '' उनकी दलील जो भी हो, हाइकोर्ट के आदेश ने सेलफोन टावरों से जुड़े सुरक्षा मानकों के संबंध में एक सार्थक बहस शुरू कर दी है, उम्मीद है, इस दिशा में सही नियम लागू हो सकेंगे.

