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सुखदेव सिंह नामधारी: आखिर ले डूबी महत्वाकांक्षा

सियासतदानों का बाहुबल बनकर अकूत संपत्ति बनाने वाले सुखदेव सिंह नामधारी की हाल तक पहाड़ की राजनीति में तूती बोलती थी, लेकिन पोंटी चड्ढा हत्याकांड में फंसने के बाद न कुर्सी रही, न रसूख.

अपडेटेड 10 दिसंबर , 2012

उसने पहले सियासत को अपना मोहताज बनाया, फिर उसे ही सीढ़ी बनाकर उत्तराखंड की सियासत में अलग रसूख बनाया. लेकिन वक्त ने करवट ली तो सियासतदानों ने भी बेरुखी दिखाकर मुंह मोड़ लिया, वरना शुचिता की बात करने वाला संघ परिवार हो या ‘पार्टी विद डिफरेंस’ का नारा देने वाली बीजेपी या फिर कांग्रेस, सभी की मेहरबानी उत्तराखंड अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष सुखदेव सिंह नामधारी पर बराबर रही है.

पोंटी-हरदीप चड्ढा बंधु हत्याकांड मामले में गिरफ्तार 45 वर्षीय नामधारी के फर्श से अर्श तक पहुंचने की कहानी भले ही फिल्मी लगती हो, लेकिन यह राजनीति के अपराधीकरण और अपराध के राजनीतिकरण का एक और ताजा उदाहरण है. ट्रक ड्राइवर से लालबत्ती तक का रुतबा हासिल करने वाला नामधारी 15 साल पहले तक उत्तराखंड के काशीपुर सीट से मौजूदा बीजेपी विधायक हरभजन सिंह चीमा का निजी सुरक्षा गार्ड रहा. चीमा खुद खनन के कारोबार से जुड़े थे और उनका बाजपुर के वन माफिया और पेट्रोल पंप कारोबार से जुड़े गुरुबचन लाल शर्मा उर्फ पंडित शर्मा से जमीन को लेकर विवाद चलता था. इन्हीं दिनों तराई क्षेत्र में पंजाब के आतंकवाद का असर चरम पर था और इसी दौरान चीमा के बेटे की हत्या हो गई. चीमा को शक था कि बेटे की हत्या के पीछे पंडित शर्मा का हाथ है.

इसी बीच 7 फरवरी, 1995 को शर्मा की गोली मारकर हत्या कर दी गई तो इस हत्या में नामधारी समेत सात लोग नामजद हुए थे. आरोप लगा कि चीमा का भरोसेमंद बनने के लिए नामधारी ने ही गुंडों की फौज बनाकर शर्मा की हत्या की है. जल्द ही नामधारी तराई में माफिया के रूप में स्थापित हो गया और कथित तौर पर चीमा की मदद से काफी संपत्ति बनाई. इस सफर में नामधारी के ऊपर मुकदमों की लिस्ट भी लंबी होती चली गई.

बाजपुर थाने में हत्या, डकैती समेत 12, काशीपुर में दो और यूपी के रामपुर में उस पर एक मुकदमा दर्ज है. लेकिन जब शर्मा परिवार और चीमा के बीच सुलह हो गई तो नामधारी ने बीजेपी नेता अरविंद पांडे का दामन थाम लिया जो पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी के बेहद करीबी रहे हैं.

कहा जाता है कि नामधारी जल्द ही कोश्यारी का खास बन गया और सियासत पर उसकी पकड़ मजबूत होती चली गई. इसी दौरान पोंटी चड्ढा से भी नामधारी की मुलाकात हुई और पोंटी ने उसे हरिद्वार में खनन के ठेके की देखरेख का जिम्मा सौंप दिया.

लेकिन उसकी सियासी हनक ही थी कि तमाम आरोपों के बावजूद 2006 में उसे न सिर्फ संघ के आनुषांगिक संगठन राष्ट्रीय सिख संगत का अध्यक्ष बना दिया गया, बल्कि चार साल के भीतर ही निशंक सरकार ने प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष की कुर्सी के साथ लालबत्ती का रुतबा थमा दिया, जबकि तराई में गदरपुर के बीजेपी विधायक अरविंद पांडे को छोड़कर पार्टी के सभी विधायक नामधारी का विरोध कर रहे थे. इतना ही नहीं,  इस दौरान राज्य में दो मुख्यमंत्री बदल गए, लेकिन नामधारी अपनी कुर्सी बचाने में कामयाब रहा.

हालांकि इंडिया टुडे से पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ कहते हैं, ‘‘सरकार किसी एक व्यक्ति की नहीं होती. नामधारी का नाम संगठन की ओर से सुझाया गया था. नामधारी के आपराधिक रिकॉर्ड के बारे में जितनी बातें अब सामने आ रही हैं, तब ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली थी.” विधायक पांडे तो नामधारी से व्यक्तिगत संबंधों को सिरे से ही खारिज कर रहे हैं.

वे कहते हैं, ‘‘संगठन में और स्थानीय होने की वजह से मेरे संबंध जरूर थे, लेकिन व्यक्तिगत संबंध नहीं थे. उनकी सोच और क्रियाकलाप हमेशा से संदिग्ध थे, इसलिए मैं उनसे अलग हो गया. नामधारी ने चुनाव में मेरा विरोध भी किया था. जिसकी शिकायत मैंने हाईकमान से की थी, लेकिन कुछ बड़े नेताओं का संरक्षण नामधारी को मिला हुआ था. मेरा नामधारी के साथ कोई कारोबार नहीं था, बेवजह मेरा नाम उससे जोड़ा जा रहा है.”

लेकिन कांग्रेस की सरकार आने पर भी फौरन नामधारी को नहीं हटाने के सवाल पर विजय बहुगुणा सरकार में मंत्री यशपाल आर्य कहते हैं, ‘‘सरकार ने नामधारी को हटाने के लिए पूरी प्रक्रिया अपनाई है. पहले हटाने की मांग हुई थी, लेकिन संवैधानिक पद होने की वजह से एक प्रक्रिया के तहत ही कार्रवाई होती है.”

भले नामधारी के साथ अपना नाम जोडऩा अब नेताओं को रास नहीं आ रहा, लेकिन बीजेपी तब तक उसके साथ खड़ी रही, जब तक पुलिस ने उसे गिरफ्तार नहीं कर लिया. कांग्रेस की विजय बहुगुणा सरकार ने 20 नवंबर को नामधारी को अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष पद से बर्खास्त करने में तेजी दिखाई तो राज्य बीजेपी के अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल और विपक्ष के नेता अजय भट्ट ने नामधारी का बचाव किया.

भट्ट ने यहां तक कह दिया, ‘‘राजनैतिक व्यक्ति पर आरोप लगते रहते हैं, सरकार ने बर्खास्तगी का फैसला जल्दबाजी में लिया है, यह न्यायपूर्ण नहीं है.” जबकि चुफाल की टिप्पणी थी, ‘‘जब तक नामधारी के खिलाफ कुछ साबित नहीं होता तब तक वह पार्टी में हैं और पार्टी उनके साथ है.” हालांकि हायतौबा मचने के बाद बीजेपी ने 26 नवंबर को नामधारी को पार्टी से निकाल दिया. लेकिन पूरा घटनाक्रम नामधारी की राजनैतिक पैठ को ही जाहिर करता है.

सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं,  उसकी पहुंच देश के सात राज्यों में बताई जाती है. नामधारी ने बंदूक का लाइसेंस पंजाब से 1985 में बनवाया था. पोंटी हत्याकांड में नाम आने के बाद नामधारी से जुड़े तमाम पहलुओं की जांच हो रही है, लेकिन उत्तराखंड में उसकी धमक का ही असर था कि बाजपुर पुलिस की ओर से 6 मार्च, 2009 को डीएम कार्यालय भेजी गई रिपोर्ट में हथियारों का लाइसेंस रद्द करने की सिफारिश की थी, लेकिन इस मामले में तीन साल बाद पहला नोटिस मार्च, 2012 में जारी किया गया.

नामधारी के खिलाफ शुरू हुई लगभग हर मुहिम आधे रास्ते में ही दम तोड़ती आई है. 2011 में नामधारी के क्रेशर पर छापा मारने के बाद निकाली गई करोड़ों रु. की रिकवरी आज तक राजस्व विभाग नहीं कर पाया है. अब तो यहां तक बताया जा रहा है कि जिस पासपोर्ट के जरिए नामधारी कई बार विदेश घूम चुका है, वह भी गलत जानकारियों के आधार पर बना है. नामधारी की अकूत संपत्ति की जांच के लिए दिल्ली पुलिस यूपी, उत्तराखंड, हरियाणा और पंजाब की पुलिस से भी संपर्क साध रही है.

पोंटी चड्ढा से नामधारी की मुलाकात 1996-97 में हुई थी और वह जल्द ही करीबी बन गया. लेकिन उसकी प्रवृत्ति की वजह से एक बार पोंटी ने नामधारी को अपने कारोबार से हटा दिया था. इसके बाद वह जालंधर के एक सांसद के संपर्क में आया. बाजपुर में उसे दगाबाज के नाम से भी जाना जाता है.

कहा जाता है कि चो वह चीमा बंधुओं के बीच मनमुटाव का मामला हो या फिर अब पोंटी चड्ढा और हरदीप चड्ढा के बीच चल रहे संपत्ति विवाद का, नामधारी ने ऐसे मामलों में खासी रुचि ली और फायदा उठाया. लेकिन चड्ढा बंधुओं के बीच हुई गोलीबारी के दौरान नामधारी मौके पर मौजूद था. इस मामले में अब उस पर हरदीप की हत्या का मुकदमा दर्ज हो चुका है.

जाहिर है कि नामधारी को वक्त के साथ कदमताल करने की तकनीक बखूबी मालूम थी, इसलिए सियासत में जब जो ऊंचाई पर रहा उसके साथ हो लिए. लेकिन राजनैतिक महत्वाकांक्षा पूरी करने की जल्दबाजी ने उसे पहाड़ से जमीन पर ला पटका है.

—साथ में प्रवीण कुमार भट्ट देहरादून में और रूपेश कुमार सिंह बाजपुर में

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