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डार्क मोड

मिसाल बेमिसाल: अंधेरे से लड़ता प्रोफेसर

सौर ऊर्जा की मदद से ग्रामीणों की जिंदगी से अंधेरा दूर करने के मिशन में जुटा आइआइटी-बंबई का एक शिक्षक.

अपडेटेड 2 दिसंबर , 2012

मध्यप्रदेश के खरगौन जिले में आजादी के 65 साल बाद भी रेलगाड़ी की पटरियां भले न बिछी हों लेकिन यह जिला अपने बल पर सौर ऊर्जा के क्षेत्र में देश को दिशा देने की कोशिश कर रहा है. जिले की झिरन्‍या तहसील के कई गांवों को बिजली के मामले में आत्मनिर्भर बनाने की उम्मीद जगाई है नेमित गांव के एक युवक 37 वर्षीय डॉ.चेतन सिंह सोलंकी ने. सौर ऊर्जा में डॉक्टरेट हासिल करने वाले सोलंकी आइआइटी-बंबई में एसोसिएट प्रोफेसर हैं और गंभीर बिजली संकट से जूझ रहे गांवों को सौर ऊर्जा से रौशन करने की मुहिम में जुटे हुए हैं.

सोलंकी जानते थे कि ग्रामीणों को नयी तकनीक अपनाने के लिए तैयार करना आसान नहीं होगा और कोई भी उनके कहने भर से सौर उर्जा के पंप नहीं लगाएगा, इसलिए उन्होंने इसके महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए 2010 में कोदला गांव में एजुकेशन पार्क नाम से एक स्कूल खोला. उन्होंने इस स्कूल की छत पर बड़े-बड़े सोलर पैनल लगाए और ग्रामीणों को बताया कि इससे किस तरह बिजली बनाई जाती है. यह स्कूल सौर ऊर्जा से बनने वाली बिजली से ही रौशन रहता है और यहां पर पानी का पंप भी उसी की मदद से ही चलता है.

अगला चरण था स्कूली बच्चों को इस प्राकृतिक ऊर्जा से जलने वाले लैंप मुहैया करवाना ताकि वे बिजली के अभाव में रात के वक्त भी पढ़ाई कर सकें. अब तक वे ऐसे 2,250 लैंप स्कूली बच्चों में निःशुल्क बांट चुके हैं. अपनी ‘वन चाइल्ड, वन लैंप’ योजना का विस्तार करते हुए सोलंकी ने पूरे खरगौन जिले में एक लाख स्कूली बच्चों को 15 अगस्त, 2013 तक लैंप देने का लक्ष्य तय किया है. वे कहते हैं, ‘‘सौर ऊर्जा केरोसिन और डीजल का बेहतर विकल्प है. यह न केवल सस्ता है बल्कि पर्यावरण के लिहाज से भी अच्छा है.’’

स्थानीय प्रशासन ने भी सोलंकी के प्रयास की तारीफ की है. खरगौन के कलेक्टर नवनीत कोठारी कहते हैं, ‘‘सौर ऊर्जा का विकल्प उन किसानों  के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकता है जिनके खेतों तक बिजली की पहुंच फिलहाल मुश्किल है. राज्य सरकार ने सोलंकी की योजना में मदद देने के लिए 20 लाख रु. स्वीकृत किए हैं.’’

एजुकेशन पार्क में किसान ऊर्जा केंद्र भी बनाया गया है जिसकी छत सोलर पैनल से तैयार की गई है. इस केंद्र का उद्देश्य किसानों को सौर ऊर्जा के प्रति जागरूक बनाना है. दरअसल बिजली संकट के चलते जिले के किसानों को खेत की सिंचाई करने में खासी दिक्कत होती है और डीजल के पंप महंगे पड़ते हैं. सोलंकी बताते हैं कि डीजल पंप से एक क्यूबिक मीटर पानी खींचने का खर्च जहां 1.57 रु. आता है वहीं सौर ऊर्जा से चलने वाले पंप में यह खर्र्चा घटकर महज 52 पैसा रह जाता है. आत्मनिर्भरता आएगी, सो अलग.

जिले के कई किसान सौर ऊर्जा के महत्व को बखूबी समझ चुके हैं. शिवना गांव के घनश्याम गौड़ कहते हैं, ‘‘खेतों की सिंचाई के लिए सोलर पंप लगाने के बारे में हम गंभीरता से सोच रहे हैं.’’ नेमित गांव के मनोज सोलंकी कहते हैं, ‘‘सरकार जितनी सब्सिडी डीजल पर दे रही है अगर उतनी ही सोलर पंप पर दे तो गांव के अधिकांश किसान डीजल जनरेटर की बजाए सोलर तकनीक को अपना लेंगे.’’ सोलंकी के इस नेक काम में सहयोग दे रहे चार्टर्ड एकाउंटेंट भारत झ्ंवर कहते हैं, ‘‘सरकार को वैकल्पिक ऊर्जा नीति को प्रभावी बनाना चाहिए.’’ योजना के परवान चढऩे के साथ-साथ मुरझाए चेहरों पर भी रौनक आने लगी है.

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