अभी कांग्रेस में नंबर 2 के तौर पर आधिकारिक रूप से उनकी ताजपोशी होना बाकी है, मगर राहुल गांधी किसी घोषणा का इंतजार नहीं कर रहे हैं. पहली बार मंच संभालने के आठ साल बाद पार्टी का नेतृत्व करने के लिए राहुल तैयार लग रहे हैं, या शायद तैयार कर लिए गए हैं. 4 नवंबर को दिल्ली में हुई कांग्रेस की रैली में राहुल को सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के साथ प्रमुख वक्ता के तौर पर पेश किया गया.
उन्होंने मनमोहन के आर्थिक सुधारों और खाद्य सुरक्षा बिल जैसी सोनिया की लोकलुभावन योजनाओं, दोनों का ही समर्थन किया. हालांकि 2011 में उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रचार में राहुल रिटेल में एफडीआइ के पक्ष में बोल चुके थे लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर सरकार की नीतियों के समर्थन में जोर-शोर से उतरने का यह उनका पहला मौका था.
राहुल की बड़ी भूमिका कैमरे के सामने तक ही सीमित नहीं है. एक माह से ज्यादा वक्त हो गया, वे प्रति दिन अपनी मां के साथ या उनके बगैर, 10 जनपथ पर पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं से मिलने में डेढ़ घंटा व्यतीत करते हैं. 15 गुरुद्वारा रकाबगंज रोड स्थित पार्टी के वार रूम में भी वे नियमित रूप से जाते हैं.
पार्टी के एक महासचिव के मुताबिक, राहुल ने कुछ चुनिंदा नेताओं के साथ, जिनमें सोनिया के वफादार और टीम राहुल के लोग शामिल हैं, अगले आम चुनावों के लिए रणनीति बनाना शुरू कर दिया है. इन चुनिंदा नेताओं में सोनिया के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल, केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश, महासचिव दिग्विजय सिंह, जनार्दन द्विवेदी और मधुसूदन मिस्त्री शामिल हैं.
यह टीम राहुल के पहले के थिंक टैंक के बिल्कुल उलट है. तब उनकी दिलचस्पी महज पार्टी की युवा शाखाओं तक सीमित हुआ करती थी और उनकी बातचीत भी जितेंद्र सिंह, मीनाक्षी नटराजन, दीपेंद्र हुड्डा और हरीश चौधरी जैसे नई पीढ़ी के सांसदों तक सीमित थी. ये सभी युवक कांग्रेस कार्यकारी समिति के सदस्य हैं चंद ऐसे पार्टी सदस्य ही हैं जो हर पखवाड़े राहुल गांधी से बातचीत करते हैं. लेकिन इधर उन्होंने मुख्य पार्टी पर ध्यान देना शुरू किया है. आजकल वे संगठनात्मक फेरबदल की रूपरेखा बनाने में व्यस्त बताए जाते हैं. दिग्विजय कहते हैं, ‘‘टीम बनाने में उनका पूरा विश्वास है,’’ लेकिन वे यह भी दावा करते हैं कि उनके पास नई टीम का
कोई ब्योरा नहीं है. यह काम सोनिया और राहुल कर रहे हैं और यही कारण है कि शेष पार्टी को इसके बारे में कुछ भी पता नहीं है. दिग्विजय हंसते हुए कहते हैं, ‘‘कप्तान टीम को चुनता है, न कि टीम कप्तान को चुनती है. यह राहुलजी को ही तय करना है.’’
दिग्विजय मजाक कर सकते हैं. उत्तर प्रदेश में फिसड्डी साबित होने के बाद भी वे टीम राहुल के अहम सदस्य बने हुए हैं. मगर अन्य लोग इतने निश्चिंत नहीं हैं. पुराने लोग फिक्रमंद हैं कि उन्हें राहुल की कांग्रेस में जगह मिलेगी या नहीं, जबकि मुकुल वासनिक और अंबिका सोनी सरीखे दूसरी पीढ़ी के नेता पदोन्नति की उम्मीद पाले बैठे हैं. एनजीओ कार्यकर्ताओं को नेताओं से ज्यादा तरजीह देने की राहुल की प्रवृत्ति ने भी तपे-तपाए कांग्रेसी नेताओं को हलकान कर रखा है.
एक कैबिनेट मंत्री कहते हैं, ‘‘मीनाक्षी नटराजन, मोहन प्रकाश और मधुसूदन मिस्त्री जैसे लोगों ने अपनी झेलावाला पृष्ठभूमि के चलते तरक्की पाई है. लेकिन राहुल को समझना होगा कि जो वांछनीय होता है, वह हमेशा संभव नहीं होता.’’ गैर-करिश्माई नटराजन को पार्टी की युवा शाखा का जिम्मा सौंपा गया है.
इस बीच खबर है कि मिस्त्री को उत्तर प्रदेश का प्रभारी महासचिव बनाया जा सकता है बावजूद इसके कि फिलहाल जिन दो राज्यों केरल और कर्नाटक का जिम्मा उनके पास है, वहां वे गुटबाजी रोकने में नाकाम रहे हैं. समाजवादी से कांग्रेसी बने मोहन प्रकाश उत्तर प्रदेश में राहुल की टीम का हिस्सा थे और अब भी राहुल के विश्वासपात्र बने हुए हैं.
राहुल की नई भूमिका के बारे में किसी को बहुत स्पष्ट जानकारी नहीं है. 19 अक्तूबर को पंजाब के एक दौरे पर राहुल ने जालंधर में पार्टी कार्यकर्ताओं से मुलाकात की. जब उन लोगों ने प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन की मांग की तो उन्होंने बस इतना कहा कि उनका काम पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को रिपोर्ट सौंपना भर है. नेतृत्व परिवर्तन पर फैसला वे ही लेंगी. कांग्रेस महासचिव, कर्नाटक के बी.के. हरिप्रसाद कहते हैं, ‘‘राहुल की उपस्थिति मौजूदा पीढ़ी को भाने वाली नई पीढ़ी और नई सोच लेकर आई है.’’
राहुल पर विपक्ष के हमले के बारे में उनका कहना है, ‘‘चूंकि विपक्ष के पास अगली पीढ़ी का कोई युवा नेता नहीं है, इसीलिए वे राहुल को अपरिपक्व कहते हैं.’’
ऐसे आशाजनक बयानों के बावजूद यह युवा नेता अब भी एक पहेली ही है. इसका एक कारण यह है कि वे पार्टी कार्यालय की बजाए 12 तुगलक लेन स्थित अपने आवास के बंद दरवाजों के पीछे काम करते हैं. दलित विचारक चंद्रभान प्रसाद ने जब ‘‘असमानता पर पुनर्विचार’’ 2010 के बाजार सुधार युग में उत्तर प्रदेश में दलित्य नामक शोधपत्र का सहलेखन किया तो उन्हें राहुल से मिलने के लिए उनके आवास पर आमंत्रित किया गया.
वे कहते हैं, ‘‘राहुल के पास एक भविष्यलक्षी (फ्यूचरिस्टिक) आधुनिक एजेंडा है और वे सिर्फ विज्ञप्तियों पर विश्वास नहीं करते. यह राहुल ने ही सुझाया था कि सरकार को अपनी 4 प्रतिशत खरीद छोटे और मध्यम दर्जे के दलित उद्यमियों से करना अनिवार्य बनाया जाना चाहिए. इससे उन्हें काम मिलता है.’’ मनमोहन सरकार ने फरवरी में इसे अनिवार्य कर दिया. दिग्विजय दोहराते हैं, ‘‘उन्होंने हमेशा आर्थिक सुधारों का समर्थन किया है. याद करिए, उन्होंने परमाणु सौदे का भी समर्थन किया था. अर्थशास्त्र एवं राजनीति के मुद्दों पर उन्हें कोई भ्रम नहीं है.
वे सुधारों तथा आरक्षण दोनों का ही समर्थन करते हैं क्योंकि वे वंचितों को समान अवसर उपलब्ध करवाना चाहते हैं.’’ लेकिन चूंकि राहुल कभी-कभार ही अपने विचार प्रकट करते हैं, इसलिए यह बात कुछ चुनिंदा लोगों तक ही सीमित है. वास्तव में इस युवा नेता और उसकी टीम से मीडिया को उसके सवालों के जवाब में चढ़ी हुई त्यौरियां ही मिलती हैं.
1985 से 1989 के बीच राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते पीएमओ में संयुक्त सचिव रहे मणिशंकर अय्यर राहुल का बचाव करते हुए कहते हैं, ‘‘इंदिरा गांधी या राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने से पहले हम उनके बारे में क्या जानते थे? प्रथम परिवार के सदस्य के रूप में उनकी स्थिति उन्हें अपनी राय अपने पास ही रखने के लिए मजबूर करती थी. यदि राहुल सरकार से सहमत हों तो आप कहेंगे कि वे प्रधानमंत्री का अंधानुकरण कर रहे हैं. यदि वे तनिक भी असहमत होंगे तो इससे एक विवाद खड़ा हो जाएगा.’’
राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के एक साल बाद अय्यर और राजीव, दोनों ही अपने पुराने विद्यालय दून स्कूल के स्वर्ण जयंती समारोह में शामिल होने गए. रास्ते में अय्यर ने अपने पूर्व प्रधानाध्यापक जॉन मार्टिन की पत्नी मैडी मार्टिन की एक किताब पढ़ी. उन्होंने लिखा था कि जब जवाहरलाल नेहरू अपने 11 वर्षीय नाती राजीव से मिलने आए तो वे कहीं मिल ही नहीं रहे थे. तब उन्हें याद आया कि वे शर्मीले होने की वजह से अक्सर मैले कपड़े रखने वाली टोकरी में छिप जाया करते थे.
जब मणिशंकर अय्यर ने इसके बारे में राजीव गांधी से पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया तो उन्होंने बताया कि वे एकांतप्रिय नहीं थे. ऐसा नहीं था कि स्कूल में उनके कोई विचार नहीं थे, बस इतना कि वे नहीं चाहते थे कि उनके ऊपर अपने नाना जवाहरलाल नेहरू के अंधानुकरण या उनके विरोध का आरोप लगे.
अब उस मैले कपड़ों वाली टोकरी से राहुल के बाहर निकलने का वक्त आ गया है. क्योंकि यदि एक दिन उन्हें मनमोहन सिंह की जगह लेनी है तो देश को यह जानने की जरूरत है कि वे किन बातों का समर्थन करते हैं.

