शनिवार का दिन था, जब सुबह उठकर 13 वर्षीया प्रभा रानी ने रोज की तरह घर में झाड़ू लगाई, चूल्हा जलाया और जानवरों को चारा डाला. फिर अपनी दोनों छोटी बहनों 12 वर्षीया सविता और 11 वर्षीया अनीता का स्कूल का बस्ता तैयार किया और स्कूल के लिए निकल पड़ी. फतेहाबाद की तहसील रतिया से तकरीबन 20 किलोमीटर दूर स्थित एक गांव का राजकीय माध्यमिक विद्यालय उनके गांव से चार किमी दूर है, जहां तीनों बहनें रोज पैदल पढऩे जाती थीं. लेकिन उस दिन प्रभा और उसकी बहनों को इस बात का तनिक भी अंदाजा नहीं था कि आज वे आखिरी बार स्कूल जा रही हैं. सविता डरी हुई आंखों से उस दिन को याद करती है, ''हेडमास्टर'' सर ने एक दिन पहले बुलाकर कहा कि कल पापा को लेकर आना. हम डर गए कि पता नहीं वे पापा से क्या कहेंगे. ''
प्रभा तो और भी ज्यादा डरी हुई थी. एक दिन पहले उसकी टीचर रूपिंदर कौर ने क्लास में बंद करके उससे कुछ सवाल पूछे और फिर मारा भी. वह कहती है, ''मैडम ने पहले मुझ्से सारी बात पूछी और फिर मुझे जोर से थप्पड़ मारा. उन्होंने सबको बता दिया.''
अगले दिन जब उनके पिता 50 वर्षीय कृपाशंकर स्कूल पहुंचे तो वहां मौजूद हेडमास्टर राजकुमार सिंह ने फरमान सुनाया, ''आपकी बेटियां अब इस स्कूल में नहीं पढ़ सकतीं. '' रतिया के एक सरकारी अस्पताल में भर्ती कृपाशंकर उस दिन को याद कर रोने लगते हैं, ''हेडमास्टर स्कूल के मैदान में बैठे थे. सरपंच (जयचंद) भी वहीं मौजूद थे. वे बोले, प्रभा तो क्या, तुम्हारी तीनों लड़कियां अब यहां नहीं पढ़ सकतीं. उनके यहां रहने से स्कूल का माहौल खराब होगा. ''
13 अक्तूबर का वह दिन उन तीनों के लिए स्कूल का आखिरी दिन था. अब स्कूल के दरवाजे उनके लिए बंद हो चुके हैं और उस दरवाजे के बाहर खड़ी वे तीनों सोचती हैं कि आखिर इन सबमें उनका कसूर क्या था? कसूर यह है कि सबसे बड़ी बहन प्रभा रेप विक्टिम है. हरियाणा के जिला फतेहाबाद से 40 किमी दूर एक गांव में रहने वाली प्रभा के साथ उसी गांव का एक 65 वर्षीय शख्स सोहनलाल पिछले चार महीनों से बलात्कार कर रहा था. वह उसके स्कूल के बाहर फलों का ठेला लगाता था.
प्रभा इतनी छोटी थी कि उसे यह आभास तक नहीं था कि उसके साथ क्या हो रहा है? उसकी मां नहीं है और पिता काम से ज्यादातर बाहर ही रहते हैं. घर में एक बहुत बूढ़े दादा-दादी हैं. लड़की के अकेली होने का फायदा उठाकर सोहनलाल चार माह तक इस कुकृत्य को अंजाम देता रहा. मामला तब जाकर खुला, जब उसे गर्भ ठहर गया. वह कहती है, ''दो महीने से माहवारी नहीं हुई थी. पेट में दर्द रहता था. डॉक्टर के पास गए तो उसने कहा कि पेट में बच्चा है. फिर गोली दी बच्चा गिराने के लिए. ''
मगर यह सवाल दहलाता है कि चार माह तक वह यह सब करता रहा और प्रभा ने मुंह नहीं खोला. क्यों? आज भी इस सवाल का जवाब देती प्रभा के चेहरे पर डर को साफ पढ़ा जा सकता है, ''वह धमकी देता था कि खबरदार, जो किसी को बताया. मैं तुझे जान से मार डालूंगा. मैं डर के मारे कुछ नहीं बोल पाई. '' लेकिन इस न बोलने के पीछे डर सिर्फ मर जाने का नहीं है.
एक डर और है, जिसके बारे में उसकी छोटी बहन सविता पहले मुंह खोलती है, ''आदमी कुछ भी करे, नाम तो लड़की का ही खराब होता है. समाज उसे अच्छी नजर से नहीं देखता'' उधर प्रभा आंखों में आंसू भरकर अपनी सफाई देती है, ''बोलण तै डर लागै है जी कि कहीं पापा हमहीं ना कूटन लागैं. '' प्रभा का यह डर बेवजह नहीं था. असल में यही हुआ. वह कहती है, ''पहले तो पापा ने प्यार से पूछा. फिर जब मैंने उन्हें पूरी बात बताई तो उन्होंने मुझे थप्पड़ मारे. ''
प्रभा अपनी बहनों, पिता, दादा-दादी, गांववालों और यहां तक कि अपनी नजरों में भी खुद को ही गुनहगार समझती है. वह कहती है, ''स्कूल में सबको पता चल गया था. लड़कियां मुझे खराब नजर से देखती थीं. मजाक उड़ाती थीं कि यह तो अपनी बहनों को भी बर्बाद कर देगी. '' लेकिन उसे दुख इस बात का है कि मेरी दोनों बहनों को स्कूल से क्यों निकाल दिया गया?
महज 13 साल की एक गरीब, कमजोर किशोरी यदि खुद को पढ़ाई के हक से वंचित किए जाने के लिए स्कूल को कसूरवार नहीं मानती तो यह सुनकर सदमा नहीं लगता. सदमा तब लगता है, जब स्कूल के हेडमास्टर और गांव के सरपंच भी खुद को कुसूरवार नहीं मानते. 40 वर्षीय हेडमास्टर राजकुमार सिंह कहते हैं, ''हमने उन तीनों बहनों को स्कूल से नहीं निकाला. कृपाशंकर ने खुद ही लिखकर दिया कि मैं लड़कियों का नाम कटवाना चाहता हूं. '' जबकि हकीकत यह है कि अनपढ़ कृपाशंकर हस्ताक्षर करना भी नहीं जानते.
वे कहते हैं, ''हेडमास्टर ने मुझ्से जबरदस्ती कागज पर अंगूठा लगवा लिया. '' पिता और बेटी के मुताबिक सरपंच जयचंद इस निर्णय में साझेदार थे, लेकिन उनसे इस बाबत सवाल करने पर वे लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहते हैं, ''मेरी अपनी तीन बेटियां हैं. मैं भला ऐसा क्यों करूंगा? '' इस मामले की जांच कराने वाले फतेहाबाद के अतिरिक्त उपायुक्त राजीव रतन कहते हैं, ''हमने मामले की पड़ताल की तो पता चला कि लड़की के पिता ने खुद ही स्कूल को लिखित में दिया है कि मैं अपनी बेटियों को नहीं पढ़ाना चाहता. ''
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस संबंध में हरियाणा सरकार को नोटिस जारी किया है और पूरी घटना की जांच की मांग की है. हरियाणा की स्वास्थ्य, शिक्षा एवं समाज कल्याण मंत्री गीता भुक्कल कहती हैं, ''हम जांच करवा रहे हैं. लड़कियां फिर से स्कूल जाएंगी और दोषियों को सजा जरूर मिलेगी. '' मानवाधिकार आयोग से लेकर राज्य सरकार तक जांच में जुटी है. मंत्री-अधिकारी बयानों में मग्न हैं. लेकिन स्कूल के सामने से गुजरती प्रभा और उसकी बहनों की आंखों में एक यही सवाल तैरता है, ''स्कूल का दरवाजा हमारे लिए बंद क्यों हो गया? ''
गांव, पीडि़त लड़की और परिवार के लोगों का नाम परिवर्तित

