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डार्क मोड

दयामनी बारला: प्रतिरोध की नायिका

मजलूमों के हितों के लिए लडऩा उनकी फितरत है और हक की खातिर टकराना उनकी आदत.

अपडेटेड 2 दिसंबर , 2012

आदिवासी अधिकार और मुद्दों से जुड़े मामलों को जोर-शोर से उठाने वाली 47 वर्षीया दयामनी बारला ने जेल से अपने मित्र फैसल अनुराग को तीन पन्ने का पत्र लिखा, ‘‘मैंने झारखंड की धरती को धोखा नहीं दिया. झारखंड की जनता के सवालों से कभी समझौता नहीं किया...मैंने सरकार को दिखाया कि उसकी नीति और सिद्धांतों से जनता का कोई भला नहीं हो रहा है. नगड़ी भूमि अधिग्रहण मामले में भी यही हो रहा है...इस मामले में आज मैं जेल में हूं. लेकिन मैं आंदोलन की राह नहीं छोड़ूंगी.’’

दयामनी आदिवासी अधिकार की जुझारू पैरोकार बनकर उभरी हैं और उनकी रिहाई के लिए आंदोलन चल रहा है. विवाद रांची से सटे नगड़ी की उस 227 एकड़ उपजाऊ जमीन को लेकर है जिस पर सरकार आइआइएम, केंद्रीय लॉ यूनिवर्सिटी और आइआइआइटी स्थापित करना चाहती है. ग्रामीणों को आपत्ति है कि जमीन अधिग्रहण से उनकी एकमात्र उपजाऊ जमीन चली जाएगी, सरकार को रांची में ही बंजर भूमि पर इन संस्थानों की स्थापना करनी चाहिए. तकरीबन पांच दशक पहले सरकार ने इस जमीन का अधिग्रहण बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के सीड्स बैंक की स्थापना के उद्देश्य से किया था जो कभी बन नहीं पाया.

ग्रामीण भी भूल गए थे कि उसकी जमीन अधिग्रहीत कर ली गई है सो वे इस पर खेती करते आ रहे थे. दयामनी 16 अक्तूबर से जेल में बंद हैं. पहले वे 2006 के एक आंदोलन के मामले में जेल गई थीं. कोर्ट से जमानत मिलने के बाद भी उन्हें एक अन्य मामले में जेल जाना पड़ा.

उन पर आरोप है कि उन्होंने निषेधाज्ञा का उल्लंघन करते हुए ग्रामीणों को नगड़ी की विवादित जमीन पर हल चलाने के लिए उकसाया और बंद के दौरान हिंसा की. बेशक कई लोग इस आंदोलन का श्रेय लेने और इसकी आड़ में अपनी नेतागीरी चमकाने की होड़ में हैं. पर इस आंदोलन की बुनियाद दयामनी की ही देन है, जब 2010 में ग्रामीणों ने उनसे मदद की गुहार लगाई थी. 2009 में आर्सेलर मित्तल को उनके आंदोलन की वजह से खूंटी के तोरपा से अपना बोरिया बिस्तर समेटना पड़ा था.

यह विस्थापन उनके निजी जीवन की भी त्रासदी रही है जिसकी वजह से उन्हें अपने गांव अरहरा (गुमला जिला) से विस्थापित होकर रांची अपने माता-पिता के साथ आना पड़ा. उनके पिता के पास थोड़ी-बहुत जमीन थी जिसे वहां के महाजनों ने धोखे से हड़प लिया और गांव छोडऩे के लिए मजबूर कर दिया. उनकी मां सब्जी बेचती थीं और वे स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ घरों में भी काम करती थीं. आज भी रांची के स्टेशन रोड के पास उनकी चाय की दुकान है जिसे उन्होंने अपने पति नेल्सन बारला की मदद से शुरू किया था जो उनकी आय का एकमात्र स्रोत है.

1996 में उन्होंने एक अखबार के लिए रूरल रिपोर्टिंग शुरू की. सन् 2000 में उन्हें पी. साईंनाथ के हाथों रूरल रिपोर्टिंग के लिए काउंटर मीडिया अवार्ड मिला. 2004 में उन्हें नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया फेलोशिप मिली. वे कहती हैं, ‘‘राजनीति से अधिक जरूरी जन नीति है. संघर्ष तो चलता ही रहेगा. अब पीछे मुड़कर देखने का समय नहीं है.’’

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