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बिहार: नीतीश का भी अपना ‘जंगल राज्य

नीतीश कुमार की अधिकार रैली ने बाहुबलियों को अपने हाथ दिखाने के लिए मुहैया कराई सरकारी ऑक्सीजन.

अपडेटेड 4 दिसंबर , 2012

सात साल पहले अपराध पर काबू पाने के लिए नीतीश कुमार की सरकार ने जब अपराधियों पर लगाम कसनी शुरू की थी तब ज्यादातर अपराधी सलाखों के पीछे चले गए थे. जो कार्रवाई से बच गए थे, उन्होंने सरकार की सख्ती के कारण अलग रास्ता अख्तियार कर लिया था. तब से बाहुबल के बूते राजनैतिक पहचान कायम करने वाले लोग ऐसे मौके की ताक में थे कि उन्हें सरकारी ऑक्सीजन मिले और वे फिर से अपने हाथ खोल सकें.

जेडी (यू) ने अधिकार रैली के जरिए इन लोगों को 4 नवंबर को ऐसा ही मौका उपलब्ध कराया. यूं तो इस रैली को सफल बनाने में जेडी (यू) के बड़े नेताओं की भूमिका अहम रही, लेकिन दमदार उपस्थिति दिखाने को लेकर दबंगों में कुछ ज्यादा ही होड़ मच गई.

रैली के दौरान ‘छोटे सरकार’ उपनाम से चर्चित अनंत कुमार सिंह का अंदाज ही निराला था, उन्होंने तिरछी टोपी और काला चश्मा पहन रखा था. साथ में समर्थकों का बड़ा हुजूम, जो विधायक और मुख्यमंत्री का बैनर लिए थे. मजबूत सुरक्षा व्यवस्था के बीच चलने वाले अनंत सिंह वीआइपी गैलरी की बजाए भीड़ के बीच से मंच पर पहुंचे.

ऐसा इसलिए कि जब पार्टी की ओर से उन्हें मौका मिला ही है तो उनकी क्षमता का एहसास बड़े नेता और मौजूद लोगों को भी हो. वे मीडिया के लिए सुरह्नित बैरिकेडिंग को पार कर गए, जिससे अनायास ही लोगों का ध्यान उन पर चला गया. फिर उन्होंने कुर्सी पर खड़े होकर लोगों का अभिवादन किया. दबंग विधायकों मनोरंजन सिंह, सुनील पांडेय और उनके भाई हुलास पांडेय ने भी पूरे जोर-शोर के साथ अपनी मौजूदगी दर्ज कराई. विधायक अमरेंद्र पांडेय के समर्थकों ने उन्हें कंधे पर उठाकर उनकी ताकत का एहसास कराया.

पटना में पखवाड़े भर पहले से ही रैली के पोस्टरों से दबंगों का दबदबा दिखने लगा था, जिन्होंने मुख्यमंत्री के साथ बड़े-बड़े पोस्टर और होर्डिंग्स लगा रखे थे. जिनसे कई महापुरुषों की प्रतिमाएं भी बैनरों से ढक गई थीं. विरोधियों ने जब हाय-तौबा मचाना शुरू किया तो रैली से कोई तीन दिन पहले मुख्यमंत्री के निर्देश पर ऐसे कई स्थानों से बैनर-पोस्टर हटा दिए गए. लेकिन रैली में दबंगों की इस कार्यप्रणाली से विरोधियों को अच्छा मौका मिल गया. आरजेडी के प्रधान महासचिव सांसद रामकृपाल यादव ने कहा, ‘‘गांधी मैदान में लोकनायक जयप्रकाश नारायण, जननायक कर्पूरी ठाकुर और राममनोहर लोहिया का कटआउट नहीं दिखा.’’

अधिकार रैली की तैयारी के समय से ही दबंगों के प्रदर्शन की पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी जिसका असल प्रदर्शन 4 नवंबर को देखने को मिला. आरोप है कि लोगों को दबंगों का पहला प्रदर्शन 27 सितंबर को खगडिय़ा में मुख्यमंत्री की अधिकार यात्रा के दौरान देखने को मिला, जब जेडी (यू) विधायक पूनम देवी यादव के बाहुबली पति रणवीर यादव ने बॉडीगार्ड की कार्बाइन छीनकर उसे प्रदर्शनकारियों पर ही तान दिया था.

रणवीर सामूहिक नरसंहार के एक मामले में सजायाफ्ता हैं. ताज्जुब यह कि प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई हुई लेकिन रणवीर इस जद से बाहर रहे. उनके बचाव में कहा गया कि पुलिस की कार्बाइन भीड़ में गिर गई थी, जिसे उन्होंने उठा लिया था. लेकिन हद तब हो गई जब मंच से कहा गया कि रणवीर यादव के कारण  ही मुख्यमंत्री मंच तक पहुंच पाए.

यही नहीं, अधिकार यात्रा के दौरान 8 अक्तूबर को करोड़ों रु. के खनन घोटाले के आरोपी गोविंदपुर के विधायक कौशल यादव के नवादा स्थित आवास पर मुख्यमंत्री के ठहरने की घटना से रैली में दबंगों को तवज्जो दिए जाने की बात को बल मिला है. छह साल पहले इसी सरकार ने कौशल यादव और एमएलसी सलमान रागीब के खिलाफ दो करोड़ रु. के खनन घोटाले में कार्रवाई की थी, मामला कोर्ट में लंबित है.

रैली के नाम पर मुजफ्फरपुर शहीद खुदीराम बोस केंद्रीय कारा में बंद पूर्व विधायक विजय कुमार शुक्ला उर्फ मुन्ना शुक्ला के रंगदारी मांगने की घटना ने सरकार की व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए. आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने सवाल उठाया, ‘‘हमारी सरकार पर अपराधियों को संरक्षण देने का आरोप लगता था, अब जनता को देखना चाहिए कि मौजूदा सरकार में किस तरह अपराधी बेलगाम हैं.’’ उन्होंने कहा कि न सिर्फ जेडी (यू) नेता बल्कि पुलिस और प्रशासनिक महकमा भी जबरन उगाही में शामिल हैं. उनके डर से लोग आवाज नहीं उठा पाते.

पेशी के लिए कोर्ट पहुंचे शुक्ला ने रैली में पहुंचने का परचा बांटकर रही-सही कसर भी पूरी कर दी. इस सिलसिले में कई पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया. पर रैली के दौरान दबंगों की इस कार्यशैली ने सरकार की उस साख पर सवाल खड़ा कर दिया, जिसे स्थापित करने में उसे बड़ी मुश्किल से सफलता मिली थी.

मुख्यमंत्री बिहार को विशेष राज्य के दर्जे के सवाल पर 38 साल पुरानी, 1974 को हुई ऐतिहासिक जेपी रैली की पुनरावृत्ति चाहते थे. इसीलिए लोगों को आमंत्रित करने के लिए उन्होंने खुद 30 जिलों का दौरा किया. लेकिन लगता है कि भीड़ जुटाने की जुगत में सरकार वैसे लोगों के प्रति नरम दिल हो गई, जिन पर सख्ती ही उनकी ब“त बड़ी खूबी थी.

दबंगों की इस कार्यप्रणाली से सरकार को काफी आलोचना झेलनी पड़ी और रैली का मूल विषय भी प्रभावित हुआ, जिसके लिए सरकार महीनों से प्रयासरत थी. सवाल उठता है कि जब ऐसे लोग प्रभावी भूमिका में आने लगेंगे तब मौजूदा सरकार के सुशासन और पिछली सरकार के कथित ‘जंगलराज्य’ में क्या फर्क रह जाएगा! सुशासन का दम भरने वाली सरकार को इस पर सोचना चाहिए.

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