भारतीय संसदीय इतिहास का यह पहला मौका होगा जब केंद्रीय मंत्रिमंडल में पूर्वी और पूर्वोत्तर के राज्यों का एक भी कैबिनेट मंत्री नहीं है, दिल्ली से पूरब की ओर चलें तो यूपी में गोंडा (बेनी प्रसाद वर्मा) के बाद एक भी कैबिनेट मंत्री नहीं है. इस इलाके से लोकसभा में 182 सांसद आते हैं.
यूपीए-2 के संभवतया आखिरी फेरबदल को आगामी लोकसभा चुनाव के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा था, लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोंडा से आगे और बिहार, झारखंड, ओडीसा, छत्तीसगढ़, सिक्किम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, असम, नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा को कांग्रेस ने या तो राजनैतिक रूप से अनुपजाऊ मानते हुए अनदेखा किया है या फिर सामाजिक समीकरण साधने में कांग्रेस विफल रही है.
हालांकि कांग्रेस नेता पूरब की अनदेखी के आरोपों को बेहद सहज तरीके से लेते हैं. कांग्रेस प्रवक्ता और राहुल गांधी की टीम के अहम सिपहसालार संदीप दीक्षित इंडिया टुडे से कहते हैं, ''यह एक संयोग हो सकता है, जान-बूझकर नहीं किया गया है.” मनमोहन सरकार और कांग्रेस के बचाव में उनकी दलील है, ''सरकार में पूरब से श्रीकांत जेना, पवन घटोवार जैसे मंत्री हैं जो स्वतंत्र प्रभार वाले हैं. पूर्वोत्तर से भी कई मंत्री बनाए गए हैं.
कैबिनेट में सामाजिक-राजनैतिक-क्षेत्रीय संतुलन का ध्यान रखना पड़ता है, इसलिए इसे कैबिनेट या राज्यमंत्री में बांटकर नहीं, बल्कि मंत्रिमंडल में दिए गए पूरे प्रतिनिधित्व के रूप में देखना चाहिए.” लेकिन पूरब से किसी को भी कैबिनेट मंत्री नहीं बनाए जाने के सवाल पर दीक्षित कहते हैं, ''मंत्री बनाए जाते वक्त वरिष्ठता और अन्य कई पहलुओं का ध्यान रखना पड़ता है.”
लेकिन मुख्य विपक्षी दल बीजेपी को कांग्रेस की दलील हजम नहीं हो रही. ओडीसा के रहने वाले और बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव धर्मेंद्र प्रधान आरोप लगाते हैं, ''कैबिनेट फेरबदल से साफ हो गया है कि कांग्रेस ने सिर्फ आंध्र, राजस्थान, दिल्ली, कर्नाटक जैसे राज्य में पार्टी के नफा-नुकसान को ही ध्यान में रखा है और बंगाल, ओडीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़ और समूचे पूर्वोत्तर के राज्यों की उपेक्षा की है.”
वे कहते हैं, ''कांग्रेस ने देश के गरीब और पिछड़े प्रांत की जान-बूझ्कर उपेक्षा की है.” प्रधान तो यहां तक आरोप लगाते हैं कि मनमोहन कैबिनेट में पूर्व, पूर्वोत्तर के साथ-साथ मध्य भारत की घोर उपेक्षा हुई है. उनके मुताबिक वाजपेयी सरकार के समय जहां मध्य प्रदेश से चार-चार मंत्री हुआ करते थे, अब कांग्रेस राज में सिर्फ कमलनाथ हैं.
हालांकि कांग्रेस की दलीलों से इतर यह भी एक तथ्य है कि संयुक्त मोर्चा की सरकार के वक्त कैबिनेट मंत्री रहे ओडीसा के श्रीकांत जेना यूपीए सरकार में महज स्वतंत्र प्रभार के मंत्री बने रहने को मजबूर हैं. पहली बार राज्यमंत्री बनाए जाने पर उन्होंने अपनी नाराजगी का इजहार भी किया था. असम के पवन घटोवार को भी 2011 में स्वतंत्र प्रभार का मंत्री बनाया गया था और इस बदलाव में उन्हें पदोन्नति मिलने की संभावना जताई जा रही थी.
पूर्वी भारत का प्रतिनिधित्व मनमोहन सरकार की दूसरी पारी में वैसे भी बेहद कम था. बंगाल से प्रणब मुखर्जी और ममता बनर्जी बतौर कैबिनेट मंत्री सरकार का हिस्सा थे. लेकिन मुखर्जी अब राष्ट्रपति बन चुके हैं, तो ममता सरकार से अलग हो चुकी हैं.
पूरब की अनदेखी की अहम वजह यह भी हो सकती है कि असम को छोड़कर बाकी अन्य राज्यों बिहार, ओडीसा, झारखंड, बंगाल में कांग्रेस मुख्य राजनैतिक मुकाबले से बाहर हो चुकी है. बिहार और ओडीसा में तो कांग्रेस की जड़ें उखड़ चुकी हैं. जाहिर है कि पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत की अनदेखी कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है.

