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सरकार ने नहीं एक इंसान ने अपनी इच्छाशक्ति से बना दिया पुल

सरकार ने गांववासियों की तकलीफों की सुध नहीं ली तो एक अकेले शख्स ने बेसों नदी पर पुल बनवाने का बीड़ा उठाया.

अपडेटेड 13 अक्टूबर , 2012

इतनी बड़ी दुनिया में ऐसे कितने लोग होंगे, जो दूसरों की भलाई के लिए अपनी हैसियत, संसाधन और ऊर्जा खर्च करते होंगे. लेकिन उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के गांव भदेठी में रहने वाले 30 वर्षीय मोहम्मद जावेद के दिल में अपना-पराया जैसी भावना कभी थी ही नहीं. इसीलिए तो भदेठी समेत आसपास के आधा दर्जन से अधिक गांवों में रहने वाले लोगों की तकलीफों और जरूरत को देखते हुए उन्होंने बेसों नदी पर अपने पैसों से 40 मीटर लंबे पुल का निर्माण करवाया है. इस पर तकरीबन 35 लाख रु. की लागत आई.

उनका गांव बेसों नदी के किनारे बसा है, जिसकी आबादी तकरीबन 3,500 है. यह नदी भदेठी और भादो गांव के बीच बहती है, जिस पर पुल न होने के कारण लोगों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था. उन्हें या तो तैरकर जाना पड़ता या फिर घंटों नदी किनारे नाव का इंतजार करना पड़ता. आखिर जरूरत की सारी चीजें एक ही गांव में तो मुहैया होती नहीं. इसलिए नदी के उस पार जाना भी जरूरत और मजबूरी थी. तभी जावेद ने नदी पर पुल बनाने का फैसला किया.

वे कहते हैं, ''रोजमर्रा के कामों के लिए नदी पार जाने की तकलीफ तो थी ही, साथ ही बेटियों की शादी में भी काफी दिक्कत आती थी. नदी पार करना किसी चुनौती से कम नहीं था. गांव के लोग विधायकों और सांसदों को अपना दुखड़ा सुना-सुनाकर थक चुके थे, लेकिन किसी ने सुध नहीं ली. लिहाजा मैंने निर्णय लिया कि अब यह काम मुझे ही करना होगा.” जौनपुर नगर के पूर्व विधायक जावेद अंसारी कहते हैं, ''भदेठी के लोग मेरे पास अपनी मांग लेकर आए थे और मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश करने का वादा भी किया था.”

बेसों नदी पर पहला पुल जावेद के दादा हाजी शम्सुद्दीन ने 1996 में बनवाया था. तब जावेद 14 बरस के थे. 30 लाख रु. की लागत से बना यह पुल 5-6 महीने में बनकर तैयार भी हो गया. अपने दादा के इस परोपकार का जावेद के दिमाग पर काफी गहरा असर हुआ. उसी वक्त इस नदी पर दूसरे पुल का निर्माण कार्य भी शुरू हुआ था, लेकिन किसी वजह से वह अधूरा ही रह गया. फिर जावेद ने उसे बनवाने का जिम्मा उठाया और अब जाकर वह दूसरा पुल बनकर तैयार हुआ है. इस पर आवागमन शुरू हो गया है. यह पुल भदेठी और भादो गांवों के अलावा दो जिलों, जौनपुर और आजमगढ़ को भी जोडऩे का काम करता है. इसकी लंबाई 40 मीटर है.

जावेद का जन्म एक धनी परिवार में हुआ. उनके दादा हाजी शम्सुद्दीन बड़े जमींदार थे. उनके पिता मोहम्मद जकरिया और परिवार के काफी सदस्य अब सिंगापुर में रहते हैं, जहां उनका फैमिली बिजनेस है. भदेठा में उनके पास खानदानी 100 बीघा जमीन है. जावेद खुद भी काफी समय तक सिंगापुर में रहे, लेकिन वहां मन न लगने के कारण वापस लौट आए.

वे हर साल अपने खर्च पर गरीबों की शादियां करवाते हैं और अब तक 30 जोड़ों की शादियां करवा चुके हैं. साथ ही उन्होंने 20 गरीब लोगों का घर भी बनवाया है. जावेद के लिए यह मामूली बातें हैं, लेकिन गांववालों के लिए तो वे खुदा का रूप हैं. भदेठी के मोहम्मद रफीउद्दीन कहते हैं, ''मैं गरीब आदमी हूं.” मुझे चिंता थी कि बहन की शादी कैसे करूंगा. लेकिन उन्होंने शादी के लिए दो लाख रु. देकर मुझे उबार लिया.” अपने नेक कामों से जावेद ने गांववालों के दिल में अपनी खास जगह बना ली है.

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