राहुल गांधी की दो दिनों की झारखंड यात्रा के बेहतर प्रबंधन के लिए राज्य कांग्रेस के नेता काफी चौकस थे. वे कांग्रेस महासचिव को सब कुछ बढिय़ा दिखाना चाहते थे, शायद इसीलिए जब रांची में मेकॉन के कम्युनिटी सभागार में उनके समारोह का इंतजाम चल रहा था तो पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने हिदायत दी कि कोई कमी न रहे.
उधर, राहुल शायद केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश से राज्य कांग्रेस के बारे में जरूरी फीडबैक ले चुके थे जो हर महीने झारखंड आते रहते हैं. राहुल ने पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करने से पहले चमकीले कागजों पर छपे राज्य कांग्रेस की उपलब्धियों के लेखा-जोखा को जरूर पढ़ा होगा जिसे उन्होंने अपने भाषण में शामिल नहीं किया. उन्होंने अपने इरादे साफ कर दिए, ''जो नेता तीन बार चुनाव हार चुके हों उन्हें चुनावी राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए.”
वे भाषण के दौरान कई बार अपनी आस्तीन चढ़ाते दिखे. वे बेहतर काम के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे और अपनी नाराजगी भी जता रहे थे. उन्हें इस बात का गुस्सा था कि झारखंड में गुटबाजी अपने चरम पर है और पार्टी नेता जनता से कट चुके हैं. पिछले कुछ साल में झरखंड कांग्रेस आधिकारिक रूप से दो फाड़ हो चुकी है. एक खेमे का नेतृत्व राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष प्रदीप कुमार बालमुचू कर रहे हैं जबकि दूसरे का केंद्रीय पर्यटन मंत्री सुबोधकांत सहाय.
राहुल ने स्पष्ट संकेत दिए कि वे 2014 के चुनावी मिशन के लिहाज से राज्य कांग्रेस को दुरुस्त करना चाहते हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी सिर्फ एक सीट जीत सकी थी जबकि पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस झारखंड विकास मोर्चा (जेवीएम) के साथ चुनावी तालमेल के सहारे 14 सीटें जीत पाई थी.
राहुल गांधी कहानियों के माध्यम से संकेत देते रहे कि वे जमीन से कटे हवाई नेताओं को टिकट देना पसंद नहीं करेंगे सो उन्होंने बताया कि जिम जाने के दौरान अकसर उनकी मुलाकात हरियाणा के एक युवक से होती थी जिसने चुनाव लडऩे की इच्छा जाहिर की, ''मैंने उससे कहा कि अपना बायोडाटा भेजो. जब प्रदेश नेतृत्व ने मुझे उम्मीदवारों की लिस्ट भेजी तो उसमें उसका नाम सब से ऊपर था. मैंने उसका नाम कटवा दिया, क्योंकि वह जमीन से जुड़ा नहीं था.”
मगर यह कहानी दुश्वारियों का इलाज नहीं है और झारखंड में तो कतई नहीं. बिल्कुल सुस्त और लचर पड़ चुकी राज्य कांग्रेस प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका में एकदम नहीं दिख रही है. विधानसभा से लेकर आंदोलन करने के मामले तक यह भूमिका जेवीएम के मुखिया बाबूलाल मरांडी ने झ्टक ली है. वक्त-बेवक्त कांग्रेस को चुनौती देने वाले मरांडी ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि वे कांग्रेस से आगे कोई तालमेल नहीं करेंगे. ऐसे में राहुल गांधी को 2014 के लिए या तो नए सहयोगी ढूंढने होंगे या फिर पार्टी में अकेले चलने के लिए जान फूंकनी होगी.
हिंदीपट्टी के राज्यों में राहुल बेशक तालियां बटोर लेते हों लेकिन ये तालियां वोट में तब्दील नहीं हो पा रहीं. झारखंड में एक के बाद एक चुनावी हार ने पार्टी को अजीब ऊहापोह की स्थिति में डाल दिया है. पार्टी के आंतरिक मतभेद हिंसक झ्ड़पों और सरेआम टोकाटाकी में बदल चुके हैं. हाल ही में संपन्न हुए हटिया विधानसभा उप-चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे सहाय के छोटे भाई सुनील सहाय न सिर्फ पार्टी की परंपरागत सीट गंवा बैठे बल्कि अपनी जमानत भी नहीं बचा सके.
राहुल की झारखंड यात्रा को ऐतिहासिक कहते हुए बालमुचू कहते हैं, ''उनका व्यक्तित्व चमत्कारिक है. उनके आगमन से पार्टी का आधार और भी बढ़ेगा.” पिछले साल जमशेदपुर लोकसभा उप-चुनाव के दौरान पार्टी में हुई गुटबाजी और अनुशासनहीनता को लेकर गठित की गई के.एन. झा कमेटी की रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. बालमुचू भी निशाने पर हैं उनका कार्यकाल 2008 में ही खत्म हो गया है लेकिन वे हर बार सेवा विस्तार पा लेते हैं.
पार्टी के वरिष्ठ नेता शिकायत करते हैं, ''जब भी नए प्रदेश अध्यक्ष के बहाल करने की मांग की जाती है तो हर बार बेîदे बहाने बनाए जाते हैं. कभी तेलंगाना में राजनैतिक संकट तो कभी बंगाल में चुनाव के नाम पर केंद्रीय नेतृत्व समय के अभाव का बहाना बनाता है.”
इस बार राहुल शायद बेहतर मंशा के साथ यहां आए हों. पार्टी प्रमुख सोनिया गांधी अक्तूबर महीने तक अपनी टीम का पुनर्गठन कर लेना चाहती हैं. राहुल की रिपोर्ट शायद कुछ काम आ जाए.

