जमकर खाए जाते रहे गुटखे पर पाबंदी से उसके उपभोक्ताओं में हलचल मच गई है और इसके निर्माताओं का सिरदर्द खासा बढ़ गया है. हाल में दिल्ली और गुजरात की सरकारों ने तंबाकू या निकोटिन वाले गुटखा उत्पादों और पान मसाले पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी है. बारह दूसरे राज्यों ने पहले ही इसी तरह के प्रतिबंधों का ऐलान कर रखा है.
खाद्य सुरक्षा और मानक (बिक्री निषेध और रोक) नियमन, 2011 के नए नियम के तहत राज्यों को इस तरह के प्रतिबंध लगाने को मजबूर होना पड़ रहा है. नए नियम के मुताबिक, तंबाकू और निकोटिन को किसी खाद्य उत्पाद की सामग्री के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. राज्य ऐसे उत्पाद की बिक्री पर एक साल के लिए प्रतिबंध लगा सकते हैं और प्रतिबंध समाप्त होने की तारीख से पहले इसे फिर से एक साल के लिए बढ़ा सकते हैं यानी व्यावहारिक तौर पर स्थायी प्रतिबंध लगाया जा सकता है.
अनुमानों के मुताबिक, भारत में तंबाकू का इस्तेमाल करने वाले करीब 27.5 करोड़ लोगों में से 20.6 करोड़ लोग बिना धुएं वाले उत्पाद जैसे गुटखा (तंबाकू, सुपारी आदि का मिश्रण) और खैनी खाते हैं. कभी-कभी बच्चे भी इन उत्पादों का उपभोग करते देखे जाते हैं, जबकि इनमें 3,095 रसायनों के अंश पाए जाते हैं जिनमें से 28 से कैंसर होने की बात साबित हो चुकी है. दूसरी तरफ गुटखा उत्पादकों के मुताबिक इन उत्पादों को ‘खाद्य उत्पाद’ श्रेणी में नहीं रखा जा सकता क्योंकि इनका रेगुलेशन सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद कानून के तहत होता है.
अभी सबसे ज्यादा तंबाकू खाने वाले राज्यों (असम और ओडिसा) ने गुटखे पर प्रतिबंध नहीं लगाया है. उधर उत्तर प्रदेश सरकार ने यह कहते हुए प्रतिबंध लगाने से इनकार कर दिया कि एक ओर जहां इससे काफी लोग बेरोजगार हो जाएंगे, वहीं ये बीड़ी-सिगरेट पीने लगेंगे. ब्रोकरेज फर्म एडेलवीस रिसर्च की एक रिपोर्ट में गुटखा कारोबार 15,000 करोड़ रु. से 20,000 करोड़ रु. होने का अनुमान लगाया गया है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस प्रतिबंध से सिगरेट उद्योग को फायदा होगा क्योंकि कई गुटखा उत्पादक सिगरेट के उत्पादन में लग सकते हैं. इसकी वजह यह है कि अवैध रूप से मिलने वाले गुटखे और सस्ती किस्म की सिगरेट की कीमत में बहुत कम फासला रह जाएगा. रिपोर्ट में कहा गया है: ‘‘आइटीसी और वीएसटी जैसी कंपनियों ने हाल में सस्ती सिगरेट (दो रु.) उतारी हैं जो ग्राहकों की एक नई जमात को आकर्षित कर उन्हें इनका मुरीद बना सकता है.’’ मुंबई की सिक्युरिटी फर्म आनंद राठी का कहना है कि देश में सिगरेट की करीब 45 फीसदी बिक्री गुटखे पर प्रतिबंध वाले 14 राज्यों में ही होती है.
धर्मपाल सत्यपाल लिमिटेड के माउथ फ्रेशनर कारोबार प्रमुख सी.के. शर्मा ने कहते हैं, ‘‘काफी समय से गुटखा उद्योग पिटने वाला बच्चा बना हुआ है. इस कार्रवाई से लगता है कि सरकारें सिगरेट उद्योग के प्रति पक्षपात दिखा रही हैं.’’ मगर विभिन्न राज्यों के जारी प्रतिबंध के आदेशों में खुले तंबाकू या धुएं वाले तंबाकू उत्पादों की बिक्री पर रोक का कोई उल्लेख नहीं है.
जुलाई में महाराष्ट्र सरकार के लगाए गए प्रतिबंध के खिलाफ माणिकचंद समूह और घोडावट पान मसाला उत्पाद जैसे कई गुटखा उत्पादक बॉम्बे हाइकोर्ट की शरण में चले गए थे. लेकिन 15 सितंबर के अपने आदेश में हाइकोर्ट ने भी इस प्रतिबंध को बरकरार रखा.
करीब एक साल से भी ज्यादा समय से गुटखा और पान उद्योग मुश्किलों का सामना कर रहा है. फरवरी, 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने इन उत्पादों में प्लास्टिक सैशे के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी जिसके बाद इसके विकल्प तलाशने में कई कंपनियों को अपने कारखाने कुछ समय के लिए बंद करने पड़े.
जानकारों के मुताबिक गुटखे का बाजार काफी बिखरा हुआ है जिसके करीब 80 फीसदी हिस्से पर क्षेत्रीय खिलाडिय़ों का प्रभुत्व है. धर्मपाल सत्यपाल फर्म के शर्मा ने कहा, ‘‘प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लाखों किसान, श्रमिक, खुदरा कारोबारी इस सेक्टर पर निर्भर हैं. इस प्रतिबंध से उनकी जीविका पर भारी संकट आ गया है.’’

