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डार्क मोड

पवार के घर में पड़ गई दरार

अजित पवार का इस्तीफा कांग्रेस के लिए एक आफत है तो शरद पवार के लिए एक गंभीर चेतावनी.

शरद पवार
शरद पवार
अपडेटेड 6 अक्टूबर , 2012

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार से बीते 24 सितंबर को उनके दिल्ली आवास पर मुलाकात की. बातचीत में पवार ने अपने भतीजे अजित पवार के खिलाफ मीडिया में आई खबरों की ओर इशारा किया, जो राज्य में उप-मुख्यमंत्री भी हैं. इशारा साफ था: पवार मान कर चल रहे थे कि ये खबरें मीडिया में चव्हाण ने ही लीक की हैं. चव्हाण ने भी इसे हलके में ही लिया और जवाब दिया कि सूचना के अधिकार के दौर में कुछ भी गोपनीय नहीं है.

चौबीस घंटे के अंदर ही जब चव्हाण पुणे जाने के लिए मुंबई एयरपोर्ट पर थे तभी उनके दफ्तर में एक चिट्ठी आई जो उनके प्रधान सचिव ए.के. जैन को मिली. यह अजित पवार का इस्तीफा था. घंटे भर बाद राज्य सरकार में शामिल एनसीपी के बाकी 19 मंत्रियों ने भी अपने इस्तीफे चव्हाण को नहीं, बल्कि एनसीपी राज्य इकाई के अध्यक्ष मधुकर पिचड़ को सौंप दिए. एक दिन बाद सरकार का समर्थन करने वाले 16 निर्दलीय विधायकों ने साफ कहा कि वे समर्थन तभी जारी रखेंगे जब अजित पवार कैबिनेट में रहेंगे. इसके पीछे कौन था यह जाहिर था. यह खेल शरद पवार तो निश्चित ही नहीं खेल रहे थे.

अपने इस्तीफे के तुरंत बाद मुंबई स्थित मंत्रालय में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अजित पवार ने कहा कि उन्होंने इस्तीफा इसलिए दिया है ताकि करोड़ों रु. के सिंचाई घोटाले में अपने खिलाफ चल रही जांच को वे प्रभावित न कर पाएं. उन पर आरोप है कि 1999 से 2009 के बीच जल संसाधन मंत्री रहते हुए 20,000 करोड़ रु. की सिंचाई परियोजनाएं मंजूर करने में उन्होंने अनियमितताएं बरती थीं और नियमों को तोड़-मरोड़कर इन परियोजनाओं के टेंडर विदर्भ सिंचाई विकास परिषद की प्रशासकीय इकाई से अनिवार्य मंजूरी मिले बगैर जारी कर दिए थे. इस साल मई में मुख्यमंत्री ने घोषणा की थी कि वे घोटाले पर श्वेत पत्र लाएंगे जिसमें उस अवधि की जांच की मांग होगी जब अजित पवार मंत्री थे.

अजित पवार पर आरोप से जुड़े दस्तावेज जब एक राष्ट्रीय दैनिक को चुनिंदा तौर पर लीक किए गए तो वे और भड़क गए. एनसीपी कार्यकर्ताओं ने इसके लिए मुख्यमंत्री कार्यालय को दोषी ठहराया. अजित पवार ने कहा कि उनके फैसले कानूनी दायरे में थे.

मंत्रालय में पत्रकारों से उन्होंने कहा, ‘‘मैं फाइलों को अटकाने में विश्वास नहीं करता. इसलिए मैंने विपक्षी दलों की मांग पर परियोजनाओं को हरी झंडी दे दी. राज्यपाल की ओर से मंत्री को परियोजनाएं मंजूर करने के विशेष अधिकार मिले हुए हैं.’’ अजित पवार ने कहा कि वे इस्तीफा तब तक वापस नहीं लेंगे जब तक कि श्वेत पत्र जारी नहीं हो जाता और उन पर लगे आरोप धुल नहीं जाते.

हालांकि जांच पिछले चार माह से जारी है, फिर सवाल उठता है कि अजित पवार ने अपने गठबंधन सहयोगी से रिश्ता तोडऩे में इतना वक्त क्यों लिया? एक वजह तो यह है कि उनका इस्तीफा कांग्रेस के लिए जितनी बड़ी चुनौती है, उतनी ही बड़ी चेतावनी उनके चाचा शरद पवार के लिए भी है. जब से शरद पवार ने संकेत देना शुरू किया कि उनकी सियासी उत्तराधिकारी उनकी बेटी सुप्रिया सुले होंगी, तभी से अजित पवार पार्टी पर अपने वर्चस्व को कायम करने में लग गए थे जिसमें कुछ हद तक उन्हें कामयाबी भी मिली. एनसीपी के 62 विधायकों में से 50 की आस्था शरद पवार के साथ नहीं, अजित के साथ है. शायद यही सोचकर शरद पवार अपनी बिटिया को दिल्ली लाए और उसके लिए अपनी पसंदीदा बारामती लोकसभा सीट भी त्याग दी.

एनसीपी के एक सांसद कहते हैं, ‘‘दोनों का इलाका हमेशा से बंटा रहा है. सुप्रिया केंद्र में हैं और अजित राज्य में. ’’ इस साल जून में शरद पवार ने एनसीपी की आधिकारिक महिला इकाई राष्ट्रवादी युवती कांग्रेस का गठन किया जिसका अध्यक्ष सुप्रिया को बनाया. सुले ने इसके बैनर तले राज्य की कई लोकसभा सीटों पर रैलियां कर जमीनी स्तर पर पहुंचने की कोशिश की.

राज्य के एक कांग्रेसी विधायक कहते हैं, ‘‘इसके गठन के वक्त शरद पवार ने मायावती जैसी नेत्रियों की ताकत का बखान किया. इससे लगा जैसे वे अजित के विकल्प के तौर पर सुप्रिया को प्रमोट कर रहे हैं.’’ यह बात और साफ  तब हो गई जब शरद पवार ने 21 सितंबर को यशवंतराव चव्हाण प्रतिष्ठान ट्रस्ट के अध्यक्ष की कुर्सी बिटिया के लिए खाली कर दी. अजित पवार हालांकि ऑन द रिकॉर्ड यही कहते हैं, ‘‘पवार बनाम पवार मीडिया का गढ़ा हुआ है. साहेब (शरद पवार) को हमने अंतिम फैसला लेने का पूरा अधिकार दिया है. कोई मतभेद नहीं है.’’

ऐसी अटकलों पर सुले सबसे पहले लगाम लगाती हैं. वे अजित पवार को दादा कहती हैं. उनका दावा है कि वे दोनों रोज बात करते हैं. यह पूछने पर कि उनके बीच क्या बातें होती हैं, उन्होंने कहा, ‘‘यह भाई-बहन के बीच की बातचीत है. आपको इसे जानने की जरूरत नहीं है.’’

इन चचेरे भाई-बहनों में जमीन-आसमान का फर्क है. शानदार परिधान पहनने वाली आकर्षक सुले को प्रचार से परहेज नहीं है. वे अपनी छवि सरोकारी महिला की बना रही हैं जिसकी चिंता के केंद्र में महिला अधिकार, शिक्षा और कुपोषण हैं. टीवी पर खूबसूरत दिखने वाली सुले आजकल विभिन्न मसलों पर मीडिया को एनसीपी का पक्ष समझती नजर आती हैं. उनके ठीक उलट 53 साल के अजित की मौजूदगी भी पता नहीं चलती. राजनीति में आने से पहले वे दूध और पोल्ट्री का खानदानी कारोबार देखते थे. उनकी बातचीत लठमार होती है. 2010 में उप-मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने अंग्रेजी सीखने की कोशिश भी शुरू की थी, लेकिन जल्द ही हाथ खड़े कर दिए.

इन भाई-बहन के बीच कोई सीधा मतभेद नहीं है. 2009 में कांग्रेस ने जब अशोक चव्हाण को मुख्यमंत्री बनाया था तो शरद पवार ने भतीजे अजित की उपेक्षा करते हुए उप-मुख्यमंत्री की उम्मीदवारी के लिए एनसीपी की ओर से छगन भुजबल का नाम चुना था. 2010 में कांग्रेस ने जब अशोक चव्हाण की जगह पृथ्वीराज चव्हाण को लाया तब अजित ने विधायकों के समर्थन से अपनी ताकत दिखाई और शरद पवार को अपनी उम्मीदवारी के लिए राजी कर लिया.

शरद पवार ने एनसीपी के मंत्रियों के सामूहिक इस्तीफों को ज्यादा महत्व न देते हुए मीडिया से कहा, ‘‘ऐसे हालात में मेरी पार्टी के कार्यकर्ता मेरे लिए भी यही करते.’’ उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार श्स्थिर्य है. हालांकि सामूहिक इस्तीफे का नाटक रच अजित पवार ने साफ कर दिया है कि उनके चाचा सरकार के स्थिर होने का चाहे जितना भी दावा कर लें, ऐसा है नहीं. शरद पवार ने पृथ्वीराज को कहा है कि वे अजित का इस्तीफा मंजूर कर लें. उन्होंने यह कह कर कि एनसीपी अब उपमुख्यमंत्री पद पर अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं करेगा, एक तरह से अजित पवार की ताकत को मान लिया है.

अभी तक अजित पवार ने एनसीपी के विधायक दल से इस्तीफा नहीं दिया है. उन्होंने तो अपने इस्तीफे से खाली हुए दो मंत्रालयों-वित्त और ऊर्जा के लिए दो नाम भी आगे बढ़ा दिए हैं. यह अहम बात है क्योंकि मंत्रिपद बांटने का काम शरद पवार के अधिकार क्षेत्र में आता है. पार्टी सूत्र इशारे में कहते हैं कि कांग्रेस के खिलाफ पिछले दिनों एनसीपी की बगावत के फुस्स हो जाने से अजित हताश हैं.

ध्यान रहे कि इस साल अगस्त में शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल ने केंद्रीय कैबिनेट से यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया था कि महाराष्ट्र और दिल्ली दोनों ही जगह कांग्रेस ने उनके साथ खराब व्यवहार किया है. अजित इस स्थिति का फायदा उठा कर लगातार मुख्यमंत्री बदलने का दबाव बना रहे थे, लेकिन शरद पवार ने उनकी मांग को तार्किक निष्कर्ष तक नहीं पहुंचने दिया. अजित को उम्मीद थी कि लंबित कैबिनेट फेरबदल के चक्कर में चव्हाण को दिल्ली बुला लिया जाएगा, लेकिन 24 सितंबर को अपनी दिल्ली यात्रा में चव्हाण ने सोनिया गांधी से मुलाकात कर उनका आशीर्वाद ले लिया कि उनकी कुर्सी सुरक्षित रहेगी.

अजित पवार को उम्मीद थी कि अपनी राजनीतिक आक्रामकता से वे सज्जन पृथ्वीराज से पार पा लेंगे, लेकिन वे गलत साबित हुए. चव्हाण के ऊपर 10 जनपथ का हाथ है और उसी की ताकत थी कि वे अपने उप-मुख्यमंत्री पर ही चढ़ बैठे. उन्होंने सितंबर 2011 में महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक में प्रशासकों की नियुक्ति कर अजित के पैसे कमाने के स्रोतों पर ही चोट कर दी. इससे बैंकों के फंड का नियंत्रण अजित पवार के हाथ से निकल गया.

अब अजित ने पलटवार किया है. शरद पवार और चव्हाण दोनों जानते हैं कि अजित के पास इतनी ताकत है कि इन दोनों के हाथों से राज्य की लगाम सरक सकती है. अब हर किसी को श्वेत पत्र का इंतजार है.

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