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उत्तर प्रदेश: शीतनिद्रा से बाहर आतीं पार्टियां

उत्तर प्रदेश में बीते विधानसभा चुनाव में मुंह की खाने के करीब छह महीने बाद सूबे में मुख्य राष्ट्रीय पार्टियां शीतनिद्रा से बाहर निकलीं और बीजेपी और कांग्रेस में जमीनी स्तर पर कुछ हलचल हुई.

अपडेटेड 30 सितंबर , 2012

उत्तर प्रदेश में बीते विधानसभा चुनाव में मुंह की खाने के करीब छह महीने बाद सूबे में मुख्य राष्ट्रीय पार्टियां शीतनिद्रा से बाहर निकलीं और बीजेपी और कांग्रेस में जमीनी स्तर पर कुछ हलचल हुई. शायद इन पार्टियों के कर्ताधर्ताओं को इस बात का अंदाजा हो गया है कि अगर अब नहीं चेते तो बहुत देर हो जाएगी.

शुरुआत हुई 29 अगस्त से, जब बीजेपी ने कोयला आवंटन में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस्तीफे की मांग करते हुए सूबे के सभी जिलों में जोरदार प्रदर्शन किया और प्रधानमंत्री का पुतला फूंका. इसके बाद पुतला फूंकने का मानो सिलसिला शुरू हो गया. कांग्रेस भी चुप नहीं बैठी और अगले ही दिन 30 अगस्त को राजधानी लखनऊ में निवर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा-जोशी की अगुआई में कार्यकर्ताओं ने बीजेपी के प्रदेश दफ्तर के बाहर उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी का पुतला फूंका.

इसके बाद कानपुर में बीजेपी कार्यकर्ताओं ने केंद्रीय कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल के घर के सामने उनका पुतला फूंकने की कोशिश की. इसका विरोध करने वाले कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ उनकी जमकर झड़प हुई. पुलिस ने लाठीचार्ज कर मामला शांत करने की कोशिश की और इस पूरे घटनाक्रम में दोनों पक्षों के तीन दर्जन से अधिक लोग घायल हुए. विधानसभा चुनाव के बाद यह पहला मौका था, जब बीजेपी-कांग्रेस सूबे में सड़क पर लड़ती दिखाई दीं. शायद उन्हें अंदाजा हो गया है कि लचर संगठन और जनता के मुद्दों से मुंह फेरकर पार्टी अगले लोकसभा चुनाव में और गर्त में चली जाएगी.Laxmikant Interview

विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद कांग्रेस और बीजेपी के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष क्रमश: रीता बहुगुणा-जोशी और सूर्यप्रताप शाही ने हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे की पेशकश कर दी, लेकिन नए अध्यक्ष का चुनाव और संगठन को दुरुस्त करने की कवायद में बीजेपी ने सूबे में कांग्रेस से बाजी मार ली.

अप्रैल के दूसरे हफ्ते में बीजेपी ने न केवल मेरठ से विधायक डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी को प्रदेश का नया अध्यक्ष मनोनीत कर दिया, बल्कि पार्टी के नवनिर्वाचित विधायकों ने कैराना से विधायक हुकुम सिंह को बीजेपी विधानमंडल दल का नेता चुन लिया. जनता में पकड़ रखने वाले नेताओं को कमान थमाकर बीजेपी ने यह संदेश देने की भी कोशिश की कि पार्टी में आगे बढऩे का मापदंड जनता के बीच का काम होगा.

विधानसभा चुनाव में हार के जख्म तब भरे, जब जून-जुलाई में हुए स्थानीय निकाय चुनाव में बीजेपी ने 12 में से 10 नगर निगमों में अपना मेयर जितवा लिए. पार्टी के वरिष्ठï नेता राजनाथ सिंह कहते हैं, ''निकाय चुनाव नतीजों ने जनता के बीच बीजेपी के जनाधार को साबित किया है.''  निकाय चुनाव के नतीजों से उत्साहित पार्टी के लिए सूबे में सदस्यता अभियान शुरू करने का अनुकूल मौका हाथ लगा. सूबे में पार्टी के इतिहास में पहली बार सालभर चलने वाले सदस्यता अभियान से इतर एक महीने (15 जुलाई से 15 अगस्त) तक चलने वाले सघन सदस्यता अभियान की शुरुआत हुई.

इस सदस्यता अभियान के लिए राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र, विनय कटियार, और शाही समेत सभी बड़े नेताओं को निगरानी का जिम्मा सौंपा गया. 15 अगस्त को अभियान की समाप्ति के बाद पार्टी के पास जो आंकड़े आए उसके मुताबिक, सूबे में बीजेपी के सदस्यों की संख्या दोगुनी से भी ज्यादा हो गई. इस अभियान में 15.38 लाख नए सदस्य बनाए गए. इससे पहले पार्टी के 14.30 लाख सदस्य थे.

पूर्व प्रदेश मंत्री और सदस्यता अभियान के प्रभारी देवेंद्र सिंह चौहान कहते हैं, ''अभी सदस्यता फॉर्म दर्ज करने का काम चल रहा है. अंतिम आंकड़े आने पर नई सदस्यता में और इजाफा हो सकता है. '' पार्टी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष कलराज मिश्र कहते हैं, ''सपा सरकार के मुस्लिम तुष्टिकरण और बसपा की पूर्व सरकार और केंद्र में कांग्रेस की सरकार के भ्रष्टाïचार से आम नागरिक आजिज आ चुका है. जनता अब बीजेपी की ओर रुख कर रही है.''Nirmal Khatri

संगठन में नए प्राण फूंकने की गरज से बीजेपी ने संगठनात्मक चुनावों को हरी झंडी दिखाई है. 31 अक्तूबर तक बीजेपी की राज्य इकाई अपने प्रदेश अध्यक्ष का भी चुनाव कर देगी. 12 वर्षों के बाद यह पहला मौका होगा जब पार्टी के पास निर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष होगा. वर्ष 2000 में कलराज मिश्र के निर्वाचन के बाद विनय कटियार, केशरीनाथ त्रिपाठी, रमापति राम त्रिपाठी और शाही मनोनीत होकर अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठे.

पार्टी के बड़े नेता बताते हैं कि हर नए अध्यक्ष के मनोनयन के बाद संगठनात्मक चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन पार्टी के भीतर गुटबाजी के चलते इसे बीच में रोकना पड़ा. यही गुटबाजी विधानसभा और निकाय चुनाव में भी दिखाई दी थी. ऐसे में इस बार संगठनात्मक चुनावों को बिना किसी विवाद और गुटबाजी के संपन्न कराना पार्टी के लिए एक कठिन चुनौती है. लेकिन पार्टी ने पिछले दिनों एक साथ 334 कार्यकर्ताओं का बाहर का रास्ता दिखाकर अनुशासहीनता बर्दाश्त न करने का स्पष्ट संकेत दे दिया. जनता से सीधे जुडऩे के क्रम में पार्टी ने गंगा अभियान का सहारा लिया है और इसका जिम्मा उमा भारती को सौंपा है.

गंगा सागर से गंगोत्री तक चलने वाले 'समग्र गंगा अभियान' की विधिवत शुरुआत 21 सितंबर को गंगा सागर से होगी और बंगाल, झारखंड व बिहार से होते हुए उमा भारती का कारवां 9 अक्तूबर को प्रदेश में दाखिल होगा. 14 दिनों तक यूपी में गंगा के किनारे चलने वाले इस अभियान को हालांकि पार्टी गैर-राजनैतिक कार्यक्रम बता रही है, लेकिन आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद के नेताओं व कार्यकर्ताओं ने पहले से ही गांवों में गोष्ठियां करके इस अभियान के लिए माहौल बनाना शुरू कर दिया.

इस अभियान के चलते पार्टी मल्लाह, निषाद समेत उन पिछड़ी जातियों पर भी अपनी पकड़ बनाना चाहती है, जो गंगा किनारे बसती हैं. इस अभियान से बीजेपी नेतृत्व और संघ सूबे में पार्टी के संगठन की परीक्षा भी लेगा. विधानसभा चुनाव से पहले चले गंगा यात्रा, गाय, गंगा और गरीब व जलयात्रा जैसे कार्यक्रम पार्टी के भीतर नेताओं के असहयोग की भेंट चढ़ गए थे.

बीजेपी में संगठनात्मक चुनावों के बाद सरगर्मी बढ़ी है तो विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के प्रदेश कार्यालय में पहली बार उस वक्त गहमागहमी दिखी, जब 11 सितंबर को नवनिर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री कार्यभार ग्रहण करने पहुंचे. विधानसभा चुनाव में हार के बाद प्रदेश कांग्रेस का छह माह का बहीखाता देखा जाए तो एकमात्र काम, कांग्रेस विधानमंडल दल के नेता पद पर काबिज वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी को हटाकर मथुरा से पार्टी के एमएलए और साफ-सुथरी छवि वाले प्रदीप माथुर को तैनात किया गया.

इस दौरान स्थानीय निकाय के चुनाव में भी पार्टी की काफी किरकिरी हुई है. नगर निगमों में पार्टी अपना एक भी मेयर नहीं जिता सकी, जबकि चुनाव के पहले पार्टी के पास तीन मेयर थे. पार्टी के नेता बताते हैं कि विधानसभा चुनाव के बाद नए प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव में देरी से पार्टी दिशाहीन हो चुकी है. इस सुस्ती का असर युवा कांग्रेस के सदस्यता अभियान पर भी दिख रहा है.

 युवा नेताओं में उत्साह भरने के लिए 16 जुलाई से यूथ कांग्रेस कमेटी का सदस्यता अभियान शुरू हुआ, लेकिन 13 अगस्त को समाप्ति तक यह फीका ही रहा. तीन वर्ष पहले 2009 में चले सदस्यता अभियान में कुल 2.66 लाख युवाओं ने यूथ कांग्रेस की सदस्यता ली थी, लेकिन दस बार सदस्यता नवीनीकरण और नए सदस्य बनाने के अभियान ने पूर्व की संख्या का आधा आंकड़ा ही छुआ. अभियान की दुर्गति देखते हुए पार्टी ने इसे और यूथ कांग्रेस की समितियों के चुनाव को अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया है.

युवा कांग्रेस के एक नेता बताते हैं कि विधानसभा चुनाव और उसके बाद स्थानीय निकाय चुनाव में पार्टी की बुरी हार के बाद यूथ कांग्रेस की सदस्यता लेने से हिचकिचा रहे हैं. सदस्यता अभियान का जिम्मा संभालने वाले एक युवा नेता का तर्क है कि पार्टी ने उस समय सदस्यता अभियान की शुरुआत की जिस वक्त पूरे प्रदेश में जमकर बरसात हो रही थी. साथ ही यह वह समय था जब किसान अपने खेतों में खरीफ की फसल की बोआई कर रहे थे. इसके चलते सदस्यता अभियान जमीनी स्तर पर पकड़ नहीं बना पाया. उत्तर प्रदेश यूथ कांग्रेस कमेटी (मध्य जोन) के उपाध्यक्ष डॉ. उमाशंकर कहते हैं कि सदस्यता अभियान जारी है और इसमें पिछली बार की तुलना में काफी बढ़ोत्तरी होगी.

बहरहाल, बीजेपी और कांग्रेस चाहे जो दावे कर रही हों लेकिन यह हकीकत है कि दोनों पार्टियों के जमीनी कार्यकर्ता अपनी उपेक्षा से उदासीन हैं. बड़े नेताओं की जमात में आम कार्यकर्ता गुम हो गया है. अगर यही हालात रहे तो अगले लोकसभा चुनाव में इन पार्टियों का दमदार बनने का सपना धरा रह जाएगा.

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