उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक हिंसा की बढ़ती घटनाओं ने ऊपरी हलकों में खतरे की घंटी बजा दी है. इंटेलिजेंस ब्यूरो (आइबी) ने राज्य के ''नाजुक हालात'' के बारे में केंद्र को चेताया है. शुक्रवार की रात गाजियाबाद के मसूरी इलाके में हुई हिंसा में छह लोग मारे गए. यह संकेत है कि राज्य सांप्रदायिक विस्फोट के मुहाने पर है. ऐसे मुहाने पर जिसमें एक छोटी चिंगारी भी दंगा भड़का सकती है.
उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सरकार बनने के बाद यह सातवां दंगा है. आइबी ने केंद्र को सूचना दी है कि यूपी की नाजुक स्थिति एक बड़ी चेतावनी बन सकती है. उसके मुताबिक, ज्यादातर दंगों का तौर-तरीका एक जैसा रहा है—मामूली से मामले में हुआ स्थानीय विवाद बड़े पैमाने पर फैल गया. मसूरी हिंसा की शुरुआती जांच से पता चलता है कि किसी ने जानबूझकर एक धार्मिक ग्रंथ का अपमान किया, उस पर आपत्तिजनक चीजें लिखीं और उसे खास समुदाय की बहुलता वाले इलाके में फेंक दिया.
गाजियाबाद के एसएसपी प्रशांत कुमार मानते हैं, ''जो हुआ वह एक साजिश का हिस्सा है, जिसे हिंसा के कई घंटे पहले रचा गया था. हमलावर घातक हथियार लिए घूम रहे थे, जिससे संकेत मिलता है कि वे पेशेवर अपराधी थे.''
उन्होंने कहा, ''हम इसे खुफिया नाकामी मानते हैं. मसूरी पुलिस थाना प्रभारी पी.के. सिंह को निलंबित कर दिया गया है. हमने लोकल इंटेलिजेंस यूनिट (एलआइयू) के तीन अधिकारियों को भी निलंबित करने की सिफारिश की है. इस घटना के सिलसिले में अज्ञात हमलावरों और अफवाह फैलाने वालों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है. '' अब सपा सरकार पर इस बात का दबाव काफी बढ़ गया है कि वह प्रदेश में सौहार्द्र और कानून-व्यवस्था कायम करे.
गृह मंत्रालय के नवीनतम आंकड़ों से खुलासा होता है कि यूपी सरकार सांप्रदायिक हिंसा से प्रभावी तरीके से निबटने में नाकाम रही है. पिछले तीन साल में देश में सबसे ज्यादा सांप्रदायिक घटनाएं (364) यूपी में हुई हैं, जिनमें 64 लोग मारे गए हैं और 1,298 घायल हुए हैं. यहां तक कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी पिछले हफ्ते राज्यों के डीजीपी को संबोधित करते हुए यूपी और चार अन्य राज्यों (मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल) को सांप्रदायिक हिंसा के लिहाज से अति संवेदनशील बताया.
सांप्रदायिक घटनाओं से सपा विरोधियों को सरकार पर हमले का मौका मिल गया है. बसपा ने आरोप लगाया है कि सरकार मुसलमानों की रक्षा करने में नाकाम साबित हुई है. हर कोई यह जानता है कि सपा को सत्ता में वापस लाने में मुसलमानों की अहम भूमिका रही है. बसपा के इस आरोप से मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग प्रभावित भी दिखते हैं क्योंकि ऐसा माना जा रहा है कि पिछली मायावती सरकार के समय कानून-व्यवस्था की हालत इससे बेहतर थी.
लेकिन सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का बीजेपी को फायदा मिलता दिख रहा है. जुलाई में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में बीजेपी को अच्छे परिणाम मिले हैं. उसने कई बड़े शहरों जैसे गाजियाबाद, लखनऊ, कानपुर, मेरठ, आगरा, गोरखपुर, मुरादाबाद, अलीगढ़, झांसी और वाराणसी के मेयर पद पर जीत हासिल की है. पार्टी को विधानसभा चुनावों के अंतिम दौर में भी अच्छी सफलता मिली थी, जो पश्चिम उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बहुल इलाकों में हुए थे.
हालांकि सपा इस बात से इनकार करती है कि राज्य में कानून-व्यवस्था की गंभीर समस्या है. सपा प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी कहते हैं, ''जैसे ही सपा सत्ता में आई, हमारे विरोधियों ने चीखना शुरू कर दिया कि राज्य में कानून-व्यवस्था खत्म हो गई है.'' वे कहते हैं, ''सांप्रदायिकता एक सामाजिक समस्या है. यह सिर्फ उत्तर प्रदेश के मौजूदा शासन से जुड़ी बात नहीं है. कोई भी पता कर सकता है कि सांप्रदायिकता से लडऩे में सपा सबसे आगे रही है.''

