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डार्क मोड

'मेरे बेटे के कातिल उसके दोस्त हैं'

बैंस परिवार को उम्मीद है कि दो साल पहले हुई उनके बेटे की मौत को हत्या मानकर उसकी फिर से जांच होगी. पुलिस ने मामले को दुर्घटना बताकर रफा-दफा कर दिया था.

अपडेटेड 1 अक्टूबर , 2012

आपका बेटा मर चुका है. '' इन शब्दों ने दो साल पहले पूरे परिवार को तबाह कर दिया था. 63 वर्षीय  गुरबख्श सिंह बैंस 28 सितंबर, 2010 की सुबह पटियाला पुलिस के एएसआइ हरि सिंह के फोन को याद करते हुए कहते हैं, ''एक पल में, हमारी दुनिया उजड़ गई.''

पुलिस ने बताया कि उनके 20 वर्षीय पुत्र गगनदीप सिंह की चंडीगढ़-पटियाला राजमार्ग पर राजपुरा में एक कार दुर्घटना में मृत्यु हो गई है. वह पटियाला की थापर यूनिवर्सिटी में एमबीए का छात्र था. हरि सिंह ने बैंस को बताया कि उनकी गाड़ी एक खड़े ट्रक से टकरा गई और उनके बेटे और एक अन्य छात्र गौरव वर्मा की मौत घटनास्थल पर ही हो गई.

पटियाला के तत्कालीन उप-डिवीजनल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) गुरमीत सिंह के पुत्र जोरावर सिंह और जसकरन सिंह जिंदा बच गए. वे हाइवे पर एक मशहूर ढाबे पर खाना खाने गए हुए थे.

इस मामले को दुर्घटना के रूप में दर्ज कर किनारे लगा दिया जाता क्योंकि पंजाब की सड़कें धनी युवाओं की बड़ी चमचमाती मोटर कारों में भयानक मौत से अपरिचित नहीं हैं. सचाई से परदा उठाने में, न्याय के लिए दुखी पिता की निरंतर कोशिश और हरियाणा-पंजाब हाइकोर्ट की निगरानी और हस्तक्षेप में दो साल लग गए.

बहरहाल, कभी न भरने वाले नुकसान के बाजवूद बैंस का मानना है कि इसमें बहुत कुछ था. गगनदीप ने दुर्घटना से एक दिन पहले चंडीगढ़ के नजदीक मोहाली में अपना घर छोड़ा था और एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह  छात्रावास पहुंचने की खबर अपने माता-पिता को दी थी. बैंस कहते हैं, ''वह जिम्मेदार था. मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि गगन इतनी देर रात को बाहर निकलेगा. वह इस तरह का नहीं था.''

बैंस को पहली बार उस समय संदेह हुआ जब उन्हें अपने बेटे का शव देखने नहीं दिया गया. वे कहते हैं, ''उन्होंने (पुलिसकर्मियों) कहा कि उनके दिल को सदमा पहुंचेगा.'' बाद में जांच करने वाले एएसआइ कुलदीप सिंह ने बैंस पर जोर दिया के वे पहले से तैयार एक बयान पर दस्तखत कर दें, जिसमें बच्चे की मौत को एक दुर्घटना माना गया है. उन्होंने कहा, ''मैं तब भी उन्हें संदेह का लाभ देना चाहता था क्योंकि मुझे ऐसा कोई नजर ही नहीं आ रहा था जो मेरे बेटे को मारना चाहता हो.''

बैंस के मुताबिक, एक महीने बाद उन्हें पटियाला पुलिस की दुर्घटना की कहानी में विसंगतियां नजर आने लगीं. उन्हें पता चला कि बच जाने वाले दो युवक जोरावर और जसकरन कथित कार दुर्घटना के समय उस गाड़ी में नहीं थे. टेलीफोन रिकॉर्ड बता रहे थे कि जोरावर और दूसरा मरने वाला युवक गौरव 'दुर्घटना' के समय एक-दूसरे से 16 किमी दूर थे. दुर्घटना स्थल की तस्वीर में गगन की लाश को दुर्घटनाग्रस्त गाड़ी के नीचे असंभव कोण (स्थान) पर दिखाया गया था. बैंस पूछते हैं, ''जब वह ड्राइवर के बगल वाली सीट पर था तो वह गाड़ी के नीचे कैसे आ सकता है.''

तस्वीर से यह भी पता चल रहा था कि खड़े ट्रक को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है हालांकि पुलिस का दावा था कि एसयूवी काफी रफ्तार में उससे सीधे टकरा गई थी. निजी जांच शुरू करने के बाद बैंस ने एक सीसीटीवी कैमरे में दुर्घटना के बारे में जसकरन और जोरावर के बयान को रिकॉर्ड किया.

उन्होंने कहा, ''उन लोगों ने जो कहा उसमें विसंगतियां थीं.'' मिसाल के तौर पर दोनों ने अलग-अलग ढाबे का नाम बताया था जहां वे 'कार दुर्घटना' से पहले गए थे. पुलिस के बयान के विपरीत उन्होंने पाया कि बच जाने वाले दोनों व्यक्ति जोरावर और जसकरन को बिना किसी गंभीर इलाज के चंडीगढ़ के सरकारी सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी. जसकरन का बाद में मोहाली के निजी अस्पताल कॉस्मो हॉस्पिटल में इलाज हुआ.

गगन के फेसबुक एकाउंट से बैंस को धक्का लगा. इससे उन्हें जोरावर के अपने दोस्तों के साथ चैट का पता चला. उनका कहना है कि 30 अगस्त से 17 सितंबर, 2010 के बीच इस सोशल नेटवर्क पर दर्ज बातों से पता चलता है कि ''मेरे बेटे को मारने की साजिश की जा रही थी.'' उनके मुताबिक, इसका सुराग एक इंट्री से लगा जो 'क्रैश' के बाद पोस्ट की गई थी. उसमें जोरावर इस बात की पुष्टि करता दिखता है कि मौत दुर्घटना के कारण नहीं हुई थी, ''सारे भाइयों की मदद से यह लक्ष्य पूरा हुआ था.''

अब एसडीएम गुरमीत सिंह का आरोप है कि बैंस जानबूझकर उनके बेटे के खिलाफ केस बना रहे हैं. गुरमीत सिंह ने जोरावर के फेसबुक वॉल पर डाली गई बातों का प्रिंट आउट दिखाते हुए कहा,''वे फेसबुक के उन्हीं पृष्ठों को दिखा रहे हैं जिससे हत्या की उनकी कहानी को मदद मिलती है.'' वे बच्चों की 'खुशी भरी' तस्वीरें भी दिखाते हैं और दावा करते हैं कि वे लोग आपस में 'अच्छे मित्र' थे. बैंस का कहना है कि फेसबुक पर प्रकट किया गया दुख ''सिर्फ संदेह को खत्म करने की कोशिश थी. मुझे विश्वास है कि मेरे बेटे को उसके दोस्तों ने मारा है.''

बैंस ने पंजाब पुलिस के आला अधिकारियों तक पहुंचने की कई बार कोशिश की ताकि उनके बेटे के मामले की जांच हत्या के तौर पर की जाए. वे उस समय अकेले ही जंग लड़ रहे थे. उन्होंने कहा, ''यहां तक कि गौरव के परिवार वाले भी उस केस को जारी रखने के लिए तैयार नहीं थे.'' दिल्ली के व्यापारी एस.के. वर्मा दिल के दौरे के बाद स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे और उन्होंने कहा था कि वे बैंस की मुहिम में साथ देने में असमर्थ हैं.

गुरमीत इस आरोप का खंडन करते हैं कि उन्होंने किसी भी समय जांच को प्रभावित करने की कोशिश की. वे कहते हैं, ''मेरे जैसा एक अकेला एसडीएम पुलिस के बड़े अधिकारियों को कैसे प्रभावित कर सकता है?'' वे जोर देकर कहते हैं कि बैंस उनके परिवार को बर्बाद करने की 'साजिश' कर रहे हैं. इस मामले में छह जांच हो चुकी हैं और एक को छोड़कर बाकी सबका कहना है कि यह ''सीधा-साधा एक्सीडेंट का मामला है. आखिर वह अपने बेटे की हत्या वाली कहानी पर क्यों अड़ा हुआ है?''

पंजाब के तत्कालीन मुख्य सचिव सुबोध अग्रवाल और गृह सचिव धनबीर बैंस (मृतक से कोई संबंध नहीं है) के कहने पर दिसंबर, 2011 में तत्कालीन डीआइजी (क्राइम) कुंवर विजय प्रताप सिंह को जांच शुरू करने का आदेश दिया गया. उनकी रिपोर्ट 27 दिसंबर, 2011 को पेश की गई, जिसमें उन्होंने कहा कि पटियाला पुलिस ने 'दुर्घटना' की मनगढ़ंत एफआइआर तैयार की थी.

उन्होंने 'स्वतंत्र और निष्पक्ष एजेंसी' के जरिए इसमें 'शामिल लोगों को हिरासत में लेकर पूछ-ताछ' के द्वारा हत्या के मामले के तौर पर इसकी फिर से 'जांच' की सिफारिश की. उनके अनुसार, खड़े ट्रक के खलासी समेत मुख्य गवाहों के बयान को नजरअंदाज कर दिया गया था. उसने दो व्यक्तियों को कार से घसीटकर 'घटनास्थल' पर पटकते देखने का दावा किया था.

पुलिस अधिकारियों ने इंडिया टुडे से कहा कि खड़े ट्रक के ड्राइवर और खलासी के खिलाफ आइपीसी 297, 304 ए, 337 र 427 के तहत दर्ज की गई एफआइआर अवैध है. ''खड़ी गाड़ी के ड्राइवर पर 'तेज रफ्तार से और लापरवाही' के साथ गाड़ी चलाने का चार्ज कैसे लगाया जा सकता है? उस पर ज्यादा से ज्यादा गैरकानूनी तौर पर पार्क करने का आरोप लगाया जा सकता है.'' उन्होंने यह भी कहा कि ''अगर यह दुर्घटना थी तब भी जोरावर सिंह को पकड़ा जाना चाहिए क्योंकि फोर्ड गाड़ी वही चला रहा था.''

बहरहाल, उस समय के डीजीपी अनिल कौशिक ने प्रताप की रिपोर्ट को नजरअंदाज कर दिया और उन्होंने विशेष जांच दल (एसआइटी) को ताजा जांच का आदेश दे दिया जिसमें पटियाला के एसएसपी भी शामिल थे. उन्होंने शुरू में जांच की निगरानी की थी.

हालांकि बाद में गृह सचिव बैंस ने इसे 'अवैध' कहकर भंग कर दिया लेकिन एसआइटी ने अपनी जांच जारी रखते हुए रिपोर्ट पेश की. गुरबख्श बैंस ने कहा कि रिपोर्ट ''पूरी तरह से गुमराह करने वाली है जिसमें गगनदीप और गौरव की मौत को हादसा करार देने की कोशिश की गई है.''

गृह सचिव बैंस ने कहा कि उन्हें यह जानकर 'आघात' लगा कि भंग एसआइटी ने बिना कानूनी अधिकार के न सिर्फ अपनी जांच जारी रखी बल्कि उनकी रिपोर्ट हाइकोर्ट तक पहुंच गई, जहां गुरबख्श बैंस की स्वतंत्र अर्जी पर सुनवाई की जा रही थी. बैंस को लगता है कि उनके बेटे की 'हत्या' की जांच को बाधित करने के लिए 'पैसे का लेन-देन किया गया.' उन्होंने कहा कि देरी का बहाना बनाकर ''जोरावर कनाडा चला गया.'' गुरमीत का कहना है कि उनका बेटा कनाडा की वाटरलू यूनिवर्सिटी में नेटवर्किंग का कोर्स कर रहा है.

आखिरकार 23 जुलाई, 2012 को पंजाब और हरियाणा हाइकोर्ट ने डीआइजी प्रताप से अपनी सामान्य रिपोर्ट पेश करने को कहा. उनसे खास तौर से कहा गया कि इसकी दोहरी हत्या के मामले के तौर पर जांच की जाए. लेकिन अभी बैंस की परीक्षा शायद खत्म नहीं हुई थी. डीआइजी प्रताप को एक बार फिर जांच रोक देने के लिए कहा गया. इसकी पुष्टि करते हुए गृह सचिव बैंस ने बताया कि ऐसा प्रताप के नाम पर गुरमीत के आपत्ति जताने के कारण हुआ कि हो सकता है वे पक्षपात करें. गृह सचिव ने कहा, ''मैंने डीजीपी को मामले को किसी दूसरे अधिकारी को सौंपने को कहा है.''

गुरमीत का कहना है कि डीजीपी सुमेध सिंह समेत कई पुलिस अधिकारी हत्या के सिद्धांत से असहमत हैं. उन्होंने कहा कि वे ''सीबीआइ जांच के लिए भी तैयार हैं लेकिन ऐसे अधिकारी से जांच नहीं करवा सकते जो पहले से ही मेरे बेटे को हत्यारा मानता है. ''

बैंस हार मानने के लिए तैयार नहीं हैं. उन्होंने कहा, ''मैं कैसे छोड़ सकता हूं? मैंने अपने हाथ से अपने बच्चे का दाह-संस्कार किया है, मेरे जीवन का हर पल उसके लिए न्याय मांगने के लिए समर्पित है.'' उनकी हठ को 64 वर्षीय एस.के. वर्मा के रूप में एक सहयोगी मिल गया है जिनका बेटा गौरव भी गगन के साथ मरा था. उनका कहना है कि वे भी लड़ाई में शामिल होंगे. उन्होंने कहा, ''मुझे'' गुरमीत ने गुमराह किया. उसने कहा कि उसका बेटा जोरावर इस दुर्घटना के कारण अपनी आंखों की रोशनी खो रहा है. मैं अब सुन रहा हूं कि वह कनाडा में है.''

परिवार के सबसे छोटे सदस्य की असामयिक  मौत ने बैंस के घर पर बुरा प्रभाव डाला है. सुरजीत कौर मुश्किल से ही बोल पाती हैं. बेटे की मौत के बाद उनको याद नहीं है कि कभी उनको चैन से नींद आई हो. उन्होंने कहा, ''ईश्वर गगनदीप को मारना नहीं चाहता था. किसी दूसरे ने मेरे बेटे को मारा है. उन्होंने जो किया है उन्हें वह भोगना ही पड़ेगा.'' गगन से 12 साल बड़े उनके बेटे मंदीप अपने भाई की मौत के बाद से अवसादग्रस्त हो गए हैं. उन्होंने कहा, ''वह मेरे बेटे की तरह था. काश! बीता दो साल डरावना सपना होता. काश! गगन लौटकर घर आ जाता.''

गुरबख्श बैंस के मुताबिक, ''वे जानते हैं कि सचाई पर से परदा हटने से उनका बेटा वापस नहीं आ जाएगा लेकिन सचाई का पता लगाया जाना चाहिए और उसे बताया जाना चाहिए. इसी वजह से तो इसे सच कहते हैं?''

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