कर्नाटक में अब सत्तारूढ़ बीजेपी की प्रदेश इकाई में अध्यक्ष पद के लिए घमासान शुरू हो गया है. यह लड़ाई आरएसएस और पार्टी के पुराने पहरुओं के बीच है. यह पद इसलिए अहम है क्योंकि इस पर बैठा व्यक्ति ही मई, 2013 में होने वाले विधानसभा चुनावों में पार्टी टिकटों के बंटवारे को नियंत्रित करेगा.
पिछले दो महीने से उप-मुख्यमंत्री के.एस. ईश्वरप्पा ही प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष का पद भी संभाले हुए हैं लेकिन बीजेपी के आदर्श वाक्य 'एक व्यक्ति-एक पद' के अनुपालन में उन्हें अपना पद छोड़ने की जरूरत है. ऐसा नहीं कि वे अनिच्छुक हैं लेकिन ईश्वरप्पा के पास राजस्व और ग्रामीण विकास जैसे दो महकमे भी हैं. बीजेपी के लोग मानते हैं कि इसके चलते उन्हें पार्टी का काम करने का समय नहीं मिल पा रहा.
गंभीर गुटबाजी की वजह से पार्टी अपना नया प्रदेश अध्यक्ष चुनने में हिचकिचा रही है. इससे स्थिति विस्फोटक हो गई है. पार्टी के एक विचारक ने इंडिया टुडे को बताया, ''हमने नियुक्ति को टालने की कोशिश की है ताकि सभी गुटों के बीच संतुलन बना रहे. आखिरकार अध्यक्ष कौन बनता है, यह उन कारकों पर निर्भर करेगा जो नियुक्ति की मजबूरी पैदा करेंगे.''
दो पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा और डी.वी. सदानंद गौड़ा अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने की खातिर परदे के पीछे से काम कर रहे हैं. भ्रष्टाचार के आरोपों और जेल की हवा खा चुकने के बावजूद येदियुरप्पा के पास मुखर समर्थकों का मजबूत जनाधार है. गौड़ा की जिद है कि बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व के इशारे पर पूर्व में मुख्यमंत्री पद के उनके 'बलिदान' को पार्टी अध्यक्ष पद देकर पुरस्कृत किया जाना चाहिए. येदियुरप्पा और गौड़ा दोनों ही पूर्व में इस पद को संभाल चुके हैं.
पार्टी सूत्रों ने इंडिया टुडे को बताया कि आरएसएस दोनों में से किसी के पक्ष में नहीं है. एक पार्टी नेता ने स्पष्ट किया, ''आगामी चुनावों में पार्टी की नैया पार लगाने के लिए येदियुरप्पा और लिंगायतों के बीच उनका जनाधार पार्टी के लिए बहुत जरूरी है. लेकिन येदियुरप्पा के सिर पर लटकते नए मामलों की तलवार देख आरएसएस उनके साथ कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता. उनकी मंडली ने गौड़ा को बाहर रखने के लिए उनके खिलाफ भी ऐसे मामलों को दाखिल किया जाना सुनिश्चित किया है. आरएसएस गौड़ा की तरफ थोड़ा अधिक झुकाव रखता था.
आरएसएस और बीजेपी सूत्रों ने स्वीकार किया कि संघ के वरिष्ठ नेता प्रभाकर भट्ट कल्लादका—तटीय कर्नाटक के बीजेपी के गढ़ में जिनकी बात ही कानून का दर्जा रखती है—अपने क्षेत्र के एक उम्मीदवार की पैरवी कर रहे थे. संघ के एक पदाधिकारी कहते हैं, ''कल्लादका येदियुरप्पा को वश में नहीं रख सकते. उनका जोर गौड़ा पर चल सकता है क्योंकि वे तटीय क्षेत्र के नेता हैं और चुने जाने के लिए आरएसएस की सद्भावना पर निर्भर हैं. लेकिन गौड़ा के खिलाफ भी मामले होने की वजह से उन्हें भी बाहर ही समझिए.''
इस गंभीर आंतरिक कलह ने आरएसएस के सामने ऐसे प्रतिष्ठित पद पर लगभग एक अज्ञात व्यक्ति को थोपने की स्थिति पैदा कर दी है. कल्लादका ने बीजेपी के प्रदेश संगठन सचिव संतोष के माध्यम से सभी को हैरत में डालते हुए पहली बार मंगलौर से सांसद बने नलिन कुमार कतील का नाम सुझाया. बीजेपी के एक मंत्री ने कहा, ''कल्लादका टिकटों के बंटवारे और धन के प्रवाह पर नियंत्रण बनाए रखना चाहते हैं. यह येदियुरप्पा या वरिष्ठ बीजेपी नेता और राष्ट्रीय महासचिव अनंत कुमार के प्रदेश अध्यक्ष बन जाने पर मुमकिन नहीं होगा. तभी तो कतील का नाम सामने आया है.''
इससे आरएसएस की सद्भावना पर निर्भर रहने वाले गौड़ा खामोश हो सकते हैं लेकिन येदियुरप्पा इतनी आसानी से इसे स्वीकार नहीं करेंगे. उन्होंने दिल्ली में अरुण जेटली से मुलाकात की और कहा कि उन्हें अध्यक्ष बनाना मुमकिन न हो तो मुर्गेश नीरानी या शोभा करांदलाजे सरीखे उनके किसी समर्थक को यह पद दिलाया जाए. बताते है कि जेटली ने येदियुरप्पा को आश्वासन दे दिया है. पर पार्टी अभी भी वक्त चाह रही है क्योंकि आरएसएस-बीजेपी के झगड़े में कोई भी नहीं पड़ना चाहता.
येदियुरप्पा ने अपनी लोकप्रियता का प्रदर्शन करते हुए सूखा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर प्रतिस्पर्धा तेज कर दी है. गौड़ा और उनकी विरोधी लॉबी ने उनके खिलाफ बयान जारी कर पलटवार किया है. पर कतील ने चुप्पी ओढ़ रखी है. हालांकि बीजेपी कार्यकर्ता चुनाव के सिर पर होने के बावजूद नेतृत्व के मुद्दे को लटकता छोड़ दिए जाने से नाखुश हैं.

