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गुजरात: विवेकानंद के कंधों पर चुनावी सफर

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने आगामी विधानसभा चुनाव के लिए स्वामी विवेकानंद को प्रतीक के तौर पर चुना है.

अपडेटेड 30 सितंबर , 2012

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी दिसंबर में होने वाले विधानसभा चुनावों की खातिर स्वामी विवेकानंद को अपना प्रतीक बनाने के लिए कड़ी मशक्कत कर रहे हैं. इसके माध्यम से उन्हें अपनी पहुंच बढ़ाने के साथ ही आरएसएस की कट्टरपंथी लाइन से जुड़े रहने में भी मदद मिलेगी.

गुजरात के 182 विधानसभा क्षेत्रों में से 150 विधानसभा क्षेत्रों में उन्हें ले जाने वाले यात्रा कार्यक्रम को 11 सितंबर को झंडी दिखाकर रवाना किया गया. 1893 में 11 सितंबर को ही विवेकानंद ने शिकागो की विश्व धर्म संसद में अपना प्रसिद्ध भाषण दिया था. उनके वाहन को स्वामी विवेकानंद युवा विचार विकास यात्रा रथ नाम दिया गया है.

सरकार ने स्वामी विवेकानंद के नाम से कई लोकलुभावन योजनाओं की घोषणा की है. इसमें 13,000 पंचायतों और नगरीय वार्डों में से प्रत्येक को 35,000 क्रिकेट किट और वॉलीबॉल दिया जाना भी शामिल है, जिस पर 12 करोड़ रु. की लागत आएगी. सभी 13,000 गांवों में विवेकानंद युवा मंडल का गठन किया जा रहा है.

सभी प्रमुख सरकारी पुस्तकालयों में एक विवेकानंद कॉर्नर और सभी म्युनिसिपल उद्यानों में विवेकानंद स्वास्थ्य केंद्र जिम्नेजियम होगा. विवेकानंद कौशल विकास योजना के तहत लगभग 4,00,000 युवाओं को कौशलपूर्ण कामों में प्रशिक्षित किया जाएगा. और यह सब कुछ विवेकानंद के जन्म के 150वें वर्ष में होगा. 

आरएसएस लंबे समय से स्वामी विवेकानंद की विरासत पर दावा जताने की कोशिश करता रहा है. स्वामी विवेकानंद अतिवादी नहीं थे  लेकिन शक्तिशाली हिंदुत्व में विश्वास करते थे. बताया जाता है कि संघ के पूर्व प्रमुख एम.एस. गोलवलकर नागपुर के हिस्लाप कॉलेज का छात्र रहते हुए स्वामी के आदर्शों के जबरदस्त अनुयायी थे. वरिष्ठ बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी भी कराची में 1942 से 1946 के बीच रामकृष्ण मिशन में उनके विचारों से प्रभावित हुए थे.

विवेकानंद की तस्वीरों और मोदी के दो चुनावी नारों 'रामशे गुजरात, जीतशे गुजरात' (खेले गुजरात, जीते गुजरात) तथा 'खेले गुजरात, खिले गुजरात' वाली क्रिकेट किट और वॉलीबॉल बांटकर मुख्यमंत्री ने विवेकानंद के खेल प्रेम को गुजराती गौरव से जोडऩे की कोशिश की है.

कलाविद् ज्योतिंद्र जैन का मानना है कि मोदी विवेकानंद की पुर्नस्थापना करना चाहते हैं और यह बात उनके रोजाना के ट्विट में भी दिखती है. इस तरह मोदी ने अखिल भारतीय उपस्थिति दर्ज कराने की उम्मीद लगा रखी है. जैन कहते हैं, ''स्वामी विवेकानंद कर्मकांडी नहीं थे. वे धर्मनिरपेक्ष थे और उन्हें पश्चिम, विशेषकर अमेरिका में पसंद किया जाता था. इस पर भी वे एक गर्वीले हिंदू थे. मोदी अपने लिए भी इसी तरह की छवि चाहते होंगे.''

यह निश्चित रूप से प्रधानमंत्री पद की उनकी महत्वाकांक्षा का भी पोषण करता है. विवादास्पद स्वामीनारायण संप्रदाय के विपरीत विवेकानंद की विरासत कट्टरवाद या कर्मकांड से अछूती है. उनके उपदेश भी व्यावहारिक हैं. जैसा कि मोदी ने यात्रा के शुरू में अपने भाषण में कहा, ''स्वामी समर्थ और सशक्त भारत में विश्वास करते थे.''

जेएनयू के इतिहासकार आदित्य मुखर्जी का मानना है कि रामकृष्ण मिशन को, जिसकी स्थापना विवेकानंद ने अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस की प्रेरणा से की थी, इस कदम का उसी तरह जबरदस्त विरोध करना चाहिए जिस तरह विधिवेत्ता दिवंगत ननी पालखीवाला ने 1992 में वल्लभभाई पटेल को एक कट्टरपंथी के रूप में चित्रित करने के बीजेपी के प्रयास का विरोध किया था, ''गृह मंत्री के रूप में वल्लभभाई पटेल ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने का साहस दिखाया था. इससे पता चलता है कि वे अपने दृष्टिकोण में कितने धर्मनिरपेक्ष और गैर-सांप्रदायिक थे.''

मुखर्जी कहते हैं, ''बीजेपी इतिहास को फिर से लिखने की कोशिश कर रही है लेकिन उसके पास व्यापक पसंद वाला कोई प्रतीक नहीं है और उसके पास प्रतीकों को उधार लेने के अलावा कोई चारा नहीं है. भारत की धर्मनिरपेक्ष ताकतों की यह जिम्मेदारी है कि वे प्रतीकों के इस इस्तेमाल को रोकें.''

बीजेपी नेता पारेंदु भगत मुख्यमंत्री का बचाव करते हुए कहते हैं, ''मोदी के लिए स्वामी जी कोई राजनैतिक उपकरण नहीं हैं. बचपन से ही वे विवेकानंद से प्रेरणा ग्रहण करते रहे हैं.''

कहने की जरूरत नहीं कि उन्हें उम्मीद होगी कि मुख्यमंत्री की यात्रा 25 अक्तूबर को समाप्त होने तक विवेकानंद के नाम से उत्पन्न होने वाले कुछ सकारात्मक प्रतीक उनकी छवि चमका चुके होंगे. जनवरी से ही गुजरात स्वामी विवेकानंद के जन्म के 150वें वर्ष को युवा शक्ति वर्ष के रूप में मना रहा है.

मोदी के अनुसार, शिकागो सम्मलेन में भाग लेने के लिए विवेकानंद को लिंबडी के राजा सहित तीन गुजरातियों ने 1891 में प्रदेश की उनकी यात्रा के दौरान प्रेरित किया था. स्वामी विवेकानंद का गुजरात से कुल जमा इतना ही संबंध काफी है.

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