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कॉपीराइट विवाद: फोटोकॉपी पर मचा कोहराम

धड़ल्ले से हो रही किताबों की फोटोकॉपी के मामले में कॉपीराइट विवाद पहली बार बन रहा बड़ा मुद्दा.

अपडेटेड 30 सितंबर , 2012

आखिरकार कॉपीराइट का वह मुद्दा बीच बहस में आ ही गया, जिस पर अभी तक दूर-दूर से बातें होती आ रही थीं. मुद्दा न सिर्फ उठा बल्कि अदालत के जरिए सीधी कार्रवाई तक जा पहुंचा. शैक्षणिक किताबों के तीन प्रकाशकों की शिकायत पर दिल्ली हाइकोर्ट ने पिछले महीने रामेश्वरी फोटोकॉपी सर्विसेज़ नाम की दुकान पर किताबों की फोटोकॉपी करने पर रोक लगा दी. यह दुकान दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस स्थित दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स के परिसर के अंदर ही चलती है.

प्रकाशकों—ऑक्सफोर्ड, कैंब्रिज और फ्रांसिस ऐंड टेलर—का आरोप था कि इस दुकान पर कॉपीराइट कानून को तोड़कर लेखकों की किताबें फोटोकॉपी करके बेची जा रही थीं, जिससे लेखकों और प्रकाशकों दोनों का नुकसान हो रहा था. इस फैसले ने जैसे बर्र के छत्ते को छेड़ दिया. छात्रों के एक बड़े तबके ने मुट्ठियां तान लीं. फेसबुक पर बाकायदा अभियान छेड़ दिया गया. कई शिक्षकों ने भी फैसले के विरोध में खुलकर टिप्पणियां कीं पर कई पक्ष में भी खड़े हुए.Photocopy

विश्वविद्यालय क्षेत्र में फोटोकॉपी की बीसियों दुकान वाले तो सहमे दिखाई दिए. एक दुकानकार (नाम न बताने की शर्त पर) छूटते ही कहते हैं, ''यहां तो जी किताबों की कोई फोटोकॉपी नहीं करता. करता भी रहा होगा तो अब तो बिल्कुल भी नहीं करेगा. '' दरअसल, देश भर के ज्यादातर विश्वविद्यालयों/कॉलेजों के पुस्तकालयों में और उनके आसपास किताबों की फोटोकॉपी इतने बड़े पैमाने पर होती रही है कि वह एक चलन का हिस्सा जैसा बन गया.

तभी तो रामेश्वरी फोटोकॉपी सर्विसेज़ के धरमपाल सिंह कहते हैं, ''हम तो 15 साल से इसी परिसर में दुकान कर रहे हैं. हमें तो पता भी नहीं था कि किताबों की फोटोकॉपी करना कानून के खिलाफ है.'' वे देश-दुनिया के पचीसेक लेखकों की किताबों के अलग-अलग हिस्सों का करीब 250 पन्नों का कोर्स पैक बनाकर 200-200 रु. में बेचते थे.

मगर दिल्ली से बाहर के तमाम दुकान वाले तो फैसले के बाद भी अनजान ही बने दिखे. लखनऊ-हज़रतगंज में फोटोकॉपी की एक प्रमुख दुकान पर किताबों की फोटोकॉपी हो रही थी. वाराणसी काशी विद्यापीठ के पास दुकान चलाने वाले अमित कुमार कहते हैं, ''किताब की फोटोकॉपी क्यों नहीं करेंगे? हमारा धंधा है. किताबें इतनी महंगी हो गई हैं कि गरीब छात्रों के लिए उन्हें खरीद पाना आसान नहीं.''Photocopy

यही है वह महातर्क जो कॉपीराइट कानून से बार-बार टकरा रहा है. किताबों की कीमतों पर नजर रखने वालों ने तुलनात्मक सूची देकर बताना चाहा कि भारत में अकादमिक किताबों की कीमतें, यूरोप ही नहीं बल्कि पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों के मुकाबले भी कम हैं. इसके बावजूद चौतरफा यही स्वर उठ रहे हैं कि किताबें महंगी होने की वजह से ही फोटोकॉपी का विकल्प अपनाना पड़ रहा है.

एनएसयूआइ ने तो दिल्ली विवि छात्र संघ के चुनावों में इसे प्रमुखता से उठाया और जीती. अध्यक्ष बने इसके अरुण हुडा की सुनिए, ''छात्रों के हितों की रक्षा हर कीमत पर की जाएगी. ''

पर तस्वीर का दूसरा पहलू भी है. असल में प्रकाशकों के अलावा लेखकों और दूसरे रचनाकर्मियों के अधिकारों को लेकर विश्व स्तर पर जागरूकता तेजी से बढ़ी है. भारत में इनके हितों के रक्षक और 2002 से बड़े पैमाने पर सक्रिय इंडियन रिप्रोग्राफिक राइट्स ऑर्गनाइज़ेशन (आइआरआरओ) के अब तक 8,000 से ज्यादा सदस्य बन चुके हैं.

इसके कैशियर शक्ति मलिक बताते हैं, ''ब्रिटेन की कॉपीराइट लाइसेंसिंग एजेंसी साल में 176 करोड़ रु. किताबों की फोटोकॉपी और ऐसे ही अधिकारों के लाइसेंस के रूप में जुटाकर संबंधित लेखकों-प्रकाशकों में बांटती है.'' कुछ समझौते हो गए तो इसमें से दो करोड़ रु. आइआरआरओ के जरिए भारतीय लेखकों-प्रकाशकों को मिलेंगे.

फोटोकॉपी वाले मामले में 26 सितंबर को फिर सुनवाई होनी है. ऐसे में दिल्ली विवि की ही लॉ फैकल्टी में असिस्टेंट प्रोफेसर अश्विनी सिवाल की बात गौरतलब है, ''कॉपीराइट कानून का उल्लंघन खूब होता आया है. ऐसे में बेहतर होगा कि छात्रों के हितों को भी ध्यान रखते हुए कोई रास्ता निकाल लिया जाए. ''
-साथ में राहुल यादव

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