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जब अंधेरे में था देश, तब छत्तीसगढ़ में था उजाला

महज एक दशक में छोटा सा राज्य बिजली आत्मनिर्भरता की ओर है. चुस्त मॉनिटरिंग, स्पष्ट नीतियां बनी उसकी सफलता की वजह.

अपडेटेड 5 सितंबर , 2012

तारीख 30 जुलाई, रात के 2 बजकर 31 मिनट पर उत्तरी ग्रिड फेल हुआ. रायपुर स्थित छत्तीसगढ़ स्टेट पावर ट्रांसमिशन कंपनी लिमिटेड (सीएसपीटीसीएल) के लोड डिस्पैच सेंटर में हलचल थी. मौके पर मौजूद एक्जीक्यूटिव इंजीनियर ने अधिकारियों को ग्रिड फेल होने की सूचना दी और सुपरवाइजरी कंट्रोल ऐंड डाटा एक्विजिशन सिस्टम (स्काडा) के जरिए निगरानी बढ़ा दी.

दिल्ली में मीटिंग के लिए गए चीफ इंजीनियर के.एस. मनोथिया को तड़के 6 बजे इसकी जानकारी मिली. उन्होंने फौरन कंट्रोल रूम में फोन कर स्थिति का जायजा लिया. लेकिन अगले दिन 31 जुलाई को उत्तरी, उत्तरी-पूर्वी और पूर्वी ग्रिड एक साथ फेल हो गए, जिससे 21 राज्यों की 60 करोड़ आबादी अंधेरे में डूब गई. लेकिन ऊर्जा के क्षेत्र में करीब-करीब आत्मनिर्भर हो चुका छत्तीसगढ़ न सिर्फ जगमगा रहा था, बल्कि ग्रिड में 300 मेगावाट का योगदान देकर उसने देश की बिजली बहाली में भी योगदान दिया.Power

मुख्यमंत्री रमन सिंह कहते हैं, ''जो लोग राज्य की उपलब्धियों का सही ढंग से आकलन नहीं करते, उनके लिए 31 जुलाई की घटना आंखें खोलने वाली है. जब आधा देश अंधेरे में डूबा था, तब छत्तीसगढ़ उजाले के द्वीप की तरह जगमगा रहा था.'' केंद्र सरकार ने ग्रिड फेल होने की घटना से सबक लेते हुए ओवर ड्रॉ करने वाले राज्यों के मुख्य सचिव को जेल भेजने जैसा कठोर प्रावधान बनाने का मन बनाया है. लेकिन 30-31 जुलाई की घटनाओं से साफ है कि राज्य सरकारें सबक नहीं लेतीं.

इंडिया टुडे को दस्तावेजों से मिली जानकारी के मुताबिक, 30 जुलाई की रात जब उत्तरी ग्रिड फेल हुआ, तो छत्तीसगढ़ अपने पश्चिमी ग्रिड के कोटे में से 86 मेगावाट कम बिजली खींच रहा था, जबकि उत्तरी ग्रिड में पंजाब अपने कोटे से 325, हरियाणा 518, उत्तर प्रदेश 861 और उत्तराखंड 161 मेगावाट अतिरिक्त बिजली खींच रहा था.

इस घटना के बावजूद राज्यों ने सबक नहीं लिया और अगले दिन 31 जुलाई को दोपहर बाद तीन ग्रिड फेल हो गया. 31 जुलाई को दोपहर 1 बजे छत्तीसगढ़ कोटे से 52 मेगावाट कम बिजली ले रहा था, जबकि हरियाणा, राजस्थान, यूपी और उत्तराखंड निर्धारित सीमा से ज्यादा बिजली खींच रहे थे, जिससे ग्रिड फेल हुआ.

छत्तीसगढ़ पर ग्रिड फेल होने का कोई असर नहीं पडऩे की वजह वहां पूरे सिस्टम की दुरुस्त निगरानी प्रणाली है. राज्य के ऊर्जा सचिव अमन सिंह कहते हैं, ''ग्रिड फेल हुआ तो हमने ग्रिड से बिजली खींचने की बजाए 300 मेगावाट उसमें डाला. राज्य में मौसम अच्छा था, सो हमें लोड शेडिंग नहीं करनी पड़ी.''

रायपुर के सीएसपीटीसीएल मुख्यालय में एक निगरानी कक्ष है, जिसमें दीवारनुमा एलसीडी लगा है और दर्जन भर कंप्यूटर पर स्काडा के जरिए कर्मचारी 24 घंटे निगरानी करते हैं. इस सिस्टम के जरिए उत्पादन, तकनीकी गड़बड़ी, लाइन पर  दबाव और ग्रिड से ली जाने वाली बिजली की पूरी सूचना होती है, जो पल-पल बदलती रहती है. इस तरह का सिस्टम और फ्रीक्वेंसी मीटर ऊर्जा विभाग से जुड़े सभी दफ्तरों में लगी है. रोजाना एक रिपोर्ट मुख्य सचिव को भेजी जाती है और पूरी व्यवस्था पर सीधे मुख्यमंत्री की पैनी नजर रहती है.

निगरानी के बारे में सीएसपीटीसीएल के प्रबंध निदेशक जी.एस. कलसी कहते हैं, ''निगरानी के लिए तीन शिफ्ट में हम एक्जीक्यूटिव इंजीनियर स्तर के अधिकारी को तैनात करते हैं.'' ग्रिड फेल होने जैसी स्थिति में कैसे आपूर्ति को बहाल करना है, इसके लिए मॉक ड्रिल भी होता है.

वे कहते हैं, ''उत्पादन, लोडिंग, ग्रिड से ओवर ड्रॉ-अंडर ड्रॉ, फ्रीक्वेंसी मॉनिटर, कम्युनिकेशन मॉनिटरिंग और ग्रिड अनुशासन का पालन करने पर राज्यों का बिजली विभाग ध्यान दे तो ग्रिड फेल होने जैसी घटना कभी भी नहीं होगी.''

बिजली के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने के बारे में रमन सिंह की सोच है, ''बिजली जैसी सुविधा किसी भी राज्य की समृद्धि का प्रतीक होता है.'' इसी पर अमल करते हुए उन्होंने कदम आगे बढ़ाया. सरकार ने इलेक्ट्रिसिटी ऐक्ट-2003 के तहत पावर प्लांट के क्षेत्र में निवेश को आकर्षित करने के लिए लाइसेंस की प्रक्रिया को खत्म किया और भूमि अधिग्रहण से लेकर राज्य स्तर से मिलने वाली अनुमति की प्रक्रिया को तेज किया.

निवेशकों से 30 फीसदी बिजली लेने का हक सरकार के पास है. अमन सिंह कहते हैं, ''आज की स्थिति में हम कह सकते हैं कि छत्तीसगढ़ देश का पावर हब बनने की ओर है और 12वीं योजना के आखिर तक हम 20 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन करने की स्थिति में होंगे, जबकि 10 हजार मेगावाट की परियोजना केंद्र से कोयले की आपूर्ति सुनिश्चित नहीं होने के कारण लंबित है. ''

आज छत्तीसगढ़ ऊर्जा के क्षेत्र में बेहद तेजी से बढ़ रहा है, तो इसकी वजह स्पष्ट नीति और निवेश का बेहतर माहौल रहा है. मार्च 2001 में राज्य का उत्पादन 1360 मेगावाट था, जबकि अभी राज्य के पास सभी स्त्रोतों से कुल 3431 मेगावाट बिजली उपलब्ध है. अब पीक सीजन में भी अधिकतम मांग 3300 मेगावाट तक होती है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक छत्तीसगढ़ में शहरीकरण महज दो फीसदी ही हुआ है. राज्य में बिजली की अधिकता की संभवत: यह भी एक वजह है, क्योंकि इस वजह से कुल खपत और जरुरत कम है. रमन सिंह कहते हैं, ''जब राज्य बना तो बिजली की प्रति व्यक्ति खपत 300 यूनिट थी, लेकिन अब 1560 यूनिट हो गया है.

गुजरात, गोवा के बाद प्रति व्यक्ति बिजली खपत में हम तीसरे स्थान पर है. अगले छह महीने में हमारा खुद का उत्पादन 3424 मेगावाट होगा. देश में कहीं भी इतने बड़े पैमाने पर उत्पादन नहीं हो रहा. हमने इस क्षेत्र में 15-16 हजार करोड़ रु. का निवेश किया है.''

राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी भी इंडिया टुडे से कहते हैं, ''हमारा सौभाग्य है कि हम पावर सरप्लस स्टेट हैं और ग्रिड फेल होने से हम पर कोई असर नहीं पड़ा. ''  राज्य का बिजली विभाग अपनी सरप्लस बिजली की बैंकिंग भी करता है. कलसी कहते हैं, ''जब हमारे यहां बिजली की खपत कम होती है, तो हम इसे जम्मू-कश्मीर और पंजाब को देते हैं और जब वहां सरप्लस होता है तो वे बिजली लौटा देते हैं. इन राज्यों के साथ बिजली बैंकिंग प्रणाली से हमें लाभ मिलता है क्योंकि मौसम के हिसाब हमारी जरूरतें अलग हैं. ''

राज्य पावर डिस्ट्रिब्यूशन कंपनी लि. के प्रबंध निदेशक सुबोध कुमार सिंह कहते हैं, '' देश के मेट्रो शहरों में भी लोड शेडिंग आम बात है, लेकिन छत्तीसगढ़ जैसा राज्य अपनी अपनी क्षमता से लोगों को 24 घंटे बिजली दे रहा है, जो अनुकरणीय है. ''

मॉनिटरिंग का स्काडा सिस्टम अन्य राज्यों में भी है, लेकिन खुद का उत्पादन अधिक नहीं होने से ग्रिड पर लोड बढ़ाते हैं या बिजली कंपनियां लोड शेडिंग करती है. तकनीकी तौर पर यहां खेल होता है. जब ग्रिड से बिजली सप्लाई का दबाव तय मापदंड से नीचे होता है तब बिजली लेना महंगा होता है और औसतन एक यूनिट के लिए 14 रु. तक देने पड़ते हैं. ऐसे में कंपनियां बिजली खरीदने के बजाए लोड शेडिंग करती है. लेकिन छत्तीसगढ़ इससे बचा हुआ है.

अगर बाकी राज्य दुरुस्त निगरानी के साथ ग्रिड अनुशासन का ईमानदारी से पालन करे तो ग्रिड फेल जैसी घटना से बचा जा सकता है. छत्तीसगढ़ इस मामले में बाकी राज्यों को दो-चार सबक सिखा सकता है.

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