
ईरान के राष्ट्रपति डॉ. मसूद पेजेश्कियान 12-13 सितंबर को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होने भारत आए. उस दौरान उन्होंने इंडिया टुडे की ग्रुप एडिटर, फॉरेन अफेयर्स गीता मोहन से खास बातचीत की. उन्होंने भारत से रिश्तों, अमेरिका के साथ जारी जंग, परमाणु हथियारों के मुद्दे और होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी समेत कई सवालों पर अपनी बेबाक राय दी. कुछ अंश:
प्र. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आपकी मुलाकात में सबसे अहम चर्चा किस बात पर हुई?
मेरे राष्ट्रपति बनने के बाद से आपके प्रधानमंत्री के साथ रिश्ते लगातार बेहतर हुए हैं. भारत और ईरान के बीच गहरे सांस्कृतिक रिश्ते और हजारों साल पुराना इतिहास है. यह बदलने वाला नहीं है. हम उन्हीं रिश्तों को और मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि दुनिया में बढ़ रही तानाशाही का मुकाबला करने में एक-दूसरे की मदद कर सकें.
● ईरान में भारत के कई रणनीतिक हित हैं, जिनमें चाबहार बंदरगाह भी है. इलाके में जारी जंग के बीच चाबहार भारत के लिए कितने काम का रह सकता है?
जंग हमने शुरू नहीं की. उन्होंने—इज्राएल और अमेरिका ने—शुरू किया. उन्होंने हमारे लीडर, फौजी कमांडरों और साइंसदानों को शहीद किया. स्कूल में मासूम बच्चों की जान ली और हमारे बुनियादी ढांचे पर बमबारी की. हमने सिर्फ अपना बचाव किया.
जहां तक चाबहार का सवाल है, ईरान इलाके को जोड़ने वाले रास्तों के चौराहे पर है. आसपास के देशों के लिए कारोबारी, सांस्कृतिक, सियासी, वैज्ञानिक और सामाजिक रिश्ते बनाने का यह सबसे आसान और किफायती रास्ता है. हम इस रास्ते को फिर से चालू करने के लिए तैयार हैं.
● अमेरिकी पाबंदियों के बीच ईरान भारतीय कंपनियों समेत दूसरे निवेशकों के लिए कितना भरोसेमंद बाजार है?
अमेरिका ने अब अपनी मर्जी से किसी भी देश पर पाबंदियां लगानी शुरू कर दी है. ब्रिक्स का मकसद इसी मनमानी को खत्म करना है. ब्रिक्स इसलिए बनाया गया कि हम आपसी रिश्तों, कारोबार और सहयोग का तरीका बदल सकें. हम दुनिया को अमेरिका की एकतरफा मनमानी से दूर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं.

● इस टकराव को छह महीने हो चुके हैं. आज ईरान सैन्य, आर्थिक और रणनीतिक तौर पर पहले से कमजोर है या मजबूत?
हर मुल्क के अपने मसले होते हैं लेकिन अमेरिका ने जो किया, उससे हम और एकजुट हो गए. उन्होंने बिना किसी उकसावे के हमारे मुल्क पर हमला किया. उन्हें लगा था कि वे वेनेजुएला की तरह 24 घंटे में हमारे मुल्क पर कब्जा कर लेंगे. ऐसा हुआ नहीं.
उलटे हमारे लोग सड़कों पर उतर आए और हमारे फौजी जवानों ने दुश्मन के सामने डटकर अपनी जान कुर्बान कर दी. इससे हुकूमत अपनी दुश्वारियों से निबट पाई है. जो लोग हुकूमत से कुछ हद तक नाराज थे, वे भी ईरान की एकता और सरहदों की हिफाजत पर जोर दे रहे हैं.
● क्या ईरान परमाणु हथियार बनाना चाहता है? क्या यूरेनियम संवर्धन ऐसा मुद्दा है, जिस पर ईरान कोई समझौता नहीं करेगा?
यह अमेरिका का प्रोपेगेंडा है. हम एनपीटी (परमाणु अप्रसार संधि) के मेंबर हैं. हमारी न्यूक्लियर गतिविधियों की सबसे ज्यादा निगरानी होती है. हमने इंटरनेशनल नियमों के दायरे में काम किया है.
अगर हम एटमी हथियार बनाना चाहते तो एनपीटी के मेंबर ही क्यों बनते? उन्हें ऐसा कौन-सा पुख्ता सबूत मिला जिसके आधार पर हम पर हमला किया गया? ये सब झूठ है.
● फिर इज्राएल वर्षों से यह दावा क्यों करता रहा है कि ईरान के पास परमाणु हथियार हैं या वह उन्हें हासिल करने की राह पर है?
इज्राएल एनपीटी का मेंबर नहीं है और उसके पास बड़ी तादाद में एटमी हथियार हैं. क्या कोई इंटरनेशनल इंस्टीट्यूशन यह सवाल उठा रहा है कि उसके पास ये हथियार क्यों हैं?
उसने गजा और लेबनान में 70,000 से ज्यादा लोगों को मार डाला. पानी, खाने और दूसरी जरूरी चीजों के रास्ते बंद कर दिए. पूरी दुनिया यह देख रही है, फिर भी कोई इज्राएल से कुछ क्यों नहीं कहता?
● ईरान और अमेरिका के बीच जंग की क्या स्थिति है? क्या लड़ाई रुकी हुई है? युद्धविराम और बातचीत बार-बार नाकाम क्यों हो रही है?
जब उसने जंग शुरू की तब हम बातचीत की मेज पर थे. हमले के बाद हम फिर बातचीत के लिए लौटे. हम आखिरी समझौते के करीब थे, तभी उसने दोबारा हम पर हमला कर दिया. उसके बाद फिर कुछ बातचीत हुई.
इतने बर्बर हमलों के बाद हम एक तरह की रजामंदी पर पहुंचे और एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग पर दस्तखत किए, लेकिन उसने उसे भी फाड़ दिया. अब हम बातचीत कैसे शुरू करें और कैसे यकीन करें कि वह अपने वादे निभाएगा?

● राष्ट्रपति ट्रंप लगातार कहते रहे हैं कि वे मौजूदा सरकार से नहीं, ईरान के “असली नेताओं” से बात कर रहे हैं. ये नए नेता कौन हैं?
मुझे लगता है कि यह सवाल आपको उन्हीं से पूछना चाहिए. वे हर दिन अलग बात कहते हैं. एक दिन कहते हैं कि वे ईरान को तबाह करना चाहते हैं और अगले दिन कहते हैं कि वे ईरान के दोस्त हैं.
● पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका से बातचीत हुई और एक समझौता ज्ञापन भी बना. क्या पाकिस्तान की कोशिश नाकाम हो गई? क्या ओमान बेहतर मध्यस्थ था?
पाकिस्तान हमारा दोस्त और पड़ोसी मुल्क है. उसने अमन कायम करने के लिए काफी कोशिश की. क़तर भी उसी एमओयू पर मदद कर रहा था. मुझे नहीं पता कि दिक्कत क्या थी क्योंकि अब वे—अमेरिकी—चाहते हैं कि हम फिर से बातचीत करें.
अहम मुद्दा यह था कि अमेरिका अपनी पाबंदियां हटाए और बंद रास्ते खोले. हम इंटरनेशनल स्तर पर माने गए नियमों के दायरे में काम करने को तैयार हैं. हमने जो कहा है, वही हमारा रुख है. न्यूक्लियर मुद्दे पर अब और क्या चर्चा बाकी है? हम तो एनपीटी और इंटरनेशनल नियमों के दायरे में दोबारा बातचीत के लिए पूरी तरह तैयार हैं.
● अगर ट्रंप ईरान से सीधी बातचीत करना चाहें तो क्या आप तैयार हैं?
अभी हम यह फैसला नहीं कर सकते. जिस पक्ष ने हमारे लीडर को शहीद किया, वही अब हमसे सीधे बात करना चाहता है. हमारे लोग बेहद फिक्रमंद हैं. हम पर थोपी गई इस तबाही को वे भूल नहीं सकते. हमें पहले यह भरोसा होना चाहिए कि वे वादे पर कायम रहेंगे और उसी तय दायरे में आगे बढ़ेंगे.
● सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए मक्का समझौते पर ईरान का क्या रुख है? खासकर हूती हमलों और सऊदी अरब के साथ ईरान के तनाव को देखते हुए?
हमारी जंग सऊदी अरब के साथ नहीं है और (यमन में) हूतियों के अपने मुद्दे हैं. सऊदी अरब, तुर्की, पाकिस्तान और इलाके के सभी देशों को साथ बैठकर अमन और सलामती कायम करनी चाहिए. हर मुल्क अपने हित और पहचान बरकरार रख सकता है, लेकिन सेक्यूरिटी का ढांचा साझा होना चाहिए और हमें मिलकर साझा अर्थव्यवस्था बनानी चाहिए.
● ईरान अमेरिका के जवाब में खाड़ी देशों पर हमले कर रहा है. क्या पश्चिम नहीं चाहता कि आपस में फूट बनी रहे?
ईरान में अलग-अलग एथनिक समुदाय हैं और वे उन्हें आपस में लड़ाना चाहते हैं. पड़ोसी मुल्कों में भी यही होता है. उनका मकसद अरब देशों को ईरान के खिलाफ खड़ा करना है ताकि हम आपस में लड़ते रहें. फिर वे हमारे तेल का फायदा उठाएं और अरब मुल्कों को हथियार बेचें. मैंने शुरू से ईरान में एकता और स्थिरता बनाए रखने की कोशिश की है.

● ईरान अरब देशों से आगे बढ़कर संपर्क क्यों नहीं करता और उस शिया-सुन्नी दूरी को खत्म क्यों नहीं करता, जिसका पश्चिम ने फायदा उठाया है?
हम पहले ऐसा कर चुके हैं. लेकिन मुश्किल यह है कि अमेरिका ने इन मुल्कों में सैन्य अड्डे बना रखे हैं और वहीं से हम पर हमले करता है. हम केवल अपना बचाव करते हैं.
अपना बचाव करते वक्त हम कहां निशाना लगाएं? उसी जगह, जहां से हमारे देश पर हमला करने वाले जहाज उड़ते हैं. जाहिर है, इससे फ्रिक्शन पैदा हुआ. क्या आप उम्मीद करते हैं कि हम कुछ न करें?
● इसका नतीजा होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी है, जिसकी आंच भारत भी महसूस कर रहा है. होर्मुज की अभी क्या स्थिति है? क्या हूती, हिज्बुल्लाह और हमास की मदद से जंग बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य तक फैल गई है?
न हिज्बुल्लाह ने इसकी शुरुआत की और न हमने. दुश्मन हमला कर रहा है और ये सभी गुट अपना बचाव कर रहे हैं. अमेरिकी हमारे इलाके पर हमला क्यों कर रहे हैं, हमारे रास्ते क्यों रोक रहे हैं और फिर हमसे चुप बैठने की उम्मीद क्यों रखते हैं? अगर हम जिंदा हैं तो हमें जवाब देना होगा.
अमेरिका जंग चाहता है तो फौजी ठिकानों और फौजियों से लड़े. वह पाबंदियों के जरिए आम लोगों को निशाना बनाकर गरीबी, नाराजगी और दूसरी मुश्किलें क्यों पैदा कर रहा है? समुद्री रास्ते आसान हैं, लेकिन वे इकलौते रास्ते नहीं हैं. अगर वे बंद करेंगे तो हम सरेंडर नहीं करेंगे.
● क्या आपने प्रधानमंत्री मोदी को होर्मुज जलडमरूमध्य में भारतीय जहाजों और नाविकों की सुरक्षा का भरोसा दिया है?
हम समुद्री आवाजाही के एक खास ढांचे पर ओमान से बातचीत कर रहे हैं. अरब मुल्कों के विदेश मंत्री ओमान के साथ बैठक करके समझौते पर पहुंचेंगे. इंटरनेशनल स्तर पर तय नियमों के तहत जलमार्ग फिर खोला जाएगा, बशर्ते अमेरिका अपनी नाकेबंदी खत्म करे.
● पश्चिम का आरोप है कि रूस और चीन ईरान को सैन्य, रणनीतिक और तकनीकी मदद दे रहे हैं. आप इसका क्या जवाब देंगे?
रूस और चीन के साथ हमारे दोस्ताना रिश्ते हैं, ठीक वैसे ही जैसे हम आपके मुल्क के साथ अपने रिश्ते बढ़ाना चाहते हैं. फिर हम पर खुफिया जानकारी साझा करने का आरोप लगाया जाता है.
अमेरिका, इज्राएल और यूरोपीय देशों के पास तकनीक है और वे जो चाहते हैं, करते हैं. वे यह सोच भी नहीं सकते कि उस बड़ी ताकत के सामने हमारी तकनीक नहीं, बल्कि हमारे लोग खड़े हुए थे. वे हमें हरा नहीं पा रहे, इसलिए मान लेते हैं कि हमें बाहर से मदद मिल रही है.
● आपके नए सर्वोच्च नेता कैसे काम कर रहे हैं? उन्हें लेकर काफी अटकलें और रहस्य बने हुए हैं.
ख़ुदा का शुक्र है कि हमारे सुप्रीम लीडर जिंदा हैं और पूरी ईमानदारी से अपना काम कर रहे हैं. वे उनकी सही जगह का पता नहीं लगा पा रहे, इसलिए ऐसी अटकलें फैलाते हैं. उन्हें उम्मीद है कि वे उनके साथ भी वही कर पाएंगे. असल दहशतगर्द इज्राएल और अमेरिका हैं.
देखिए, वे सीरिया, लेबनान, गजा, इराक, क़तर और यहां तक कि ईरान में क्या कर रहे हैं. वे जिसे चाहते हैं, मार देते हैं और फिर दावा करते हैं कि वह दहशतगर्द था. वे पुलों और कारखानों को निशाना बनाते हैं. क्या वे भी दहशतगर्द हैं?
● ईरान में सत्ता हस्तांतरण का मामला कहां तक पहुंचा है? आखिरी फैसला कौन करता है—आयतुल्लाह, आइआरजीसी या आप?
जाहिर है, आखिरी फैसला सुप्रीम लीडर का होता है. पहले दिन से यही व्यवस्था रही है और आज भी कायम है.

