● एशिया के 50 श्रेष्ठ रेस्तरांओं में शुमार हो जाने पर कैसा लग रहा है?
सचमुच, खुशी जाहिर करने को मेरे पास शब्द नहीं हैं. पर इस तरह की पहचान हासिल करने की नार की कभी सोच ही नहीं रही. हमने इस जज्बे के साथ इसे खड़ा किया था कि भोजन के हिंदुस्तानी तत्वों, पहाड़ी समाजों और इलाकाई रस्मों-रिवाजों के पहलुओं को गंभीरता से लिया जाना चाहिए.
● आपने कसौली जैसी गैर-पारंपरिक जगह पर रेस्तरां खोलने का फैसला क्यों किया?
कश्मीरी होने के नाते मैं हमेशा से चाहता था कि पहाड़ों में एक रेस्तरां हो. कसौली का चुनाव अपने दोस्त और पार्टनर दीपक गुप्ता की वजह से किया गया. बुटीक होटल अमाया उन्हीं का है, जो कि हम लोगों का बेस है.
● नार में खाने की आखिर खासियत क्या है?
इसकी बुनियाद है हिंदुस्तानी हिमालय क्षेत्र का खानपान जो कि कश्मीर से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक फैला है. ऐसे में जाहिर है, भोजन के अहम तत्वों, जायकों और प्रीजर्वेशन की तकनीक वगैरह के मामलों में विविधता का कोई ओर-छोर ही नहीं. ऐसे में इसका कोई तयशुदा रोडमैप नहीं.
● आप खानपान में नवाचार की अगुआई करने वालों में से हैं, ऐसे में आपको रेस्तरां किस दिशा में बढ़ते दिख रहे हैं?
भविष्य में रेस्तरांओं का स्वरूप ज्यादा निजी किस्म का, स्थानीय और अपनी जमीन में रचा-बसा होगा. अर्से तक दुनिया भर की चीजें हर जगह एक-सी परोसते रहने के बाद अब हम शहरों से बाहर एक पूरा अनुभव-एहसास कराने वाले रेस्तरांओं की दिशा में बढ़ना शुरू कर ही चुके हैं.
—नीलांजन दास.

