जहां सीबीएसई बोर्ड की परीक्षाएं 2 अप्रैल को खत्म हुईं वहीं आईएससी और आईसीएसई बोर्ड के स्टूडेंट्स ने भी 3 अप्रैल को आखिरी पेपर लिखा. मगर बोर्ड ईयर वाले छात्रों के लिए यह शायद ही आराम लेकर आया हो. जहां 12वीं के बाद छात्र तमाम कंपटिशन की तैयारी में जुट जाएंगे, वहीं 10वीं की परीक्षा दे चुके स्टूडेंट इस समय इस माथापच्ची के बीच होंगे कि 11वीं में आखिर कौन सा विषय लें.
इस बीच इंडिया टुडे के असिस्टेंट एडिटर (डिजिटल) धनंजय कुमार की मुलाकात एक ऐसी शख्सियत से हुई जो नौवीं कक्षा में फेल हो गए थे, लेकिन फिर आईआईटी कानपुर में टॉपर बन वापसी की. उसी आईआईटी में 15 साल तक पढ़ाया और देश के बड़े परमाणु वैज्ञानिक बन गए. डॉ. हरीश चंद्र वर्मा, जिनकी किताबें 'कॉन्सेप्ट्स ऑफ फिजिक्स’ और 'क्वांटम फिजिक्स’ शायद ही किसी साइंस के स्टूडेंट ने न पढ़ी हों, को साल 2020 में फिजिक्स की दुनिया में अपने अपने योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया. छात्रों के बीच एचसीवी के नाम से मशहूर प्रोफेसर वर्मा ने बातचीत में भारतीय शिक्षा पद्धति और स्कूल सिस्टम, परीक्षा एवं फिजिक्स पढ़ाने के तरीकों पर चर्चा की. कुछ अंश:
● कई छात्रों को फिजिक्स विषय काफी मुश्किल लगता है, लेकिन आप एक 'जलेबी’ के उदाहरण से समझाकर इसे जलेबी जितना स्वादिष्ट कैसे बना देते हैं?
देखिए, जलेबी तो स्वादिष्ट है, लेकिन फिजिक्स के केस में इसकी टेढ़ी-मेढ़ी शक्ल से लोगों को डराया जा रहा है. आप सांस लेने से लेकर फोन पकड़ने तक, हर पल फिजिक्स के साथ ही जी रहे हैं, तो फिजिक्स सबको आती है. हमारे स्कूल सिस्टम में जो फिजिक्स पढ़ाई जाती है उसका तरीका ठीक नहीं है. हम असल जिंदगी के फिजिक्स को दरकिनार कर देते हैं, और मुश्किल-मुश्किल सूत्रों का इस्तेमाल करने लगते हैं. सिर्फ एक जलेबी बनाने की प्रक्रिया से बच्चों को उष्मा का संवहन, डूबने-तैरने का सिद्धांत, फर्मेंटेशन-ऑक्सीकरण, दाब परिवर्तन, बॉइलिंग, दहन, जीभ से स्वाद के सूचक, विसरण आदि को समझाया जा सकता है. शिक्षक चाहें तो इसके सहारे विज्ञान के गूढ़ सिद्धांतों को आसान कर सकते हैं.
● बहुत से छात्र फिजिक्स समझने के लिए ट्यूशन का सहारा लेते हैं, लेकिन आप इस व्यवस्था से नाखुश रहते हैं, क्यों?
मुझे समझ नहीं आता कि ट्यूशन वालों को फिजिक्स समझाने की क्या जरूरत है. एक छोटा बच्चा स्कूल जाने के पहले ही फिजिक्स सीख रहा होता है. मिरर में रिफ्लेक्शन, दीवार खड़ी है, जमीन पर चलना आदि. कोई बच्चे को समझाता नहीं है, वह स्वभाविक ही सीख जाता है. समझाने वाले की जरूरत इसलिए है क्योंकि जो समझाना चाह रहे हैं वह असल फिजिक्स नहीं है. ट्यूशन का मतलब हो जाता है कि स्कूल से काम नहीं चल पा रहा है.
ये बच्चे के लिए एक मनोवैज्ञानिक दबाव की तरह है. ट्यूटर की तरफ से बच्चे को अप्रत्यक्ष रूप से यह मैसेज चला जाता है कि तुमसे नहीं हो पा रहा है इसलिए तुम मेरे पास आए हो. यह भावना ही इंसान की स्वभाविक शक्तियों को कम कर देती है. इसलिए स्कूल सिस्टम में ही बच्चों को खुद से सीखने के ज्यादा से ज्यादा मौके देने चाहिए. जैसे ओलंपियाड का पैटर्न होता है, जिसमें 2-3 सवाल होते हैं और लिखने के लिए 4-5 घंटे का समय होता है. इतना समय लगाकर जब कोई लिखता है तो वहां उसकी लर्निंग होती है.
● अगर कोई छात्र इंग्लिश में कमजोर है, तो फिजिक्स समझने में क्या भाषा एक बैरियर का काम करती है?
इसे मैं बिल्कुल भी बाधा नहीं मानता, क्योंकि मैंने हिंदी में ही पढ़ाई की है. आगे चलकर जब मुझे मास्टर्स, पीएचडी, कॉलेज में लेक्चर देना या किताब लिखने जैसी चीजें करनी थीं, तो थोड़ी समस्या आई, लेकिन यह इतनी बड़ी समस्या नहीं है कि आप अपने पैर पीछे खींच लें. अंग्रेजी में शिफ्ट होना ज्यादा से ज्यादा एक साल का ही स्ट्रगल है.
● परीक्षाओं का मौसम चल रहा है, इनको लेकर आपका क्या नजरिया है?
परीक्षाएं देने में मजा आना चाहिए. अभी एग्जाम पैटर्न ऐसा है कि यह लोगों को स्ट्रेस दे देता है. सीखने का सुख सबसे बड़ा है. हमारी परीक्षाएं ऐसी होनी चाहिए जो मूल्यांकन के साथ कुछ सिखा भी दें. परीक्षा कभी भी लोगों की क्षमताओं का आकलन नहीं कर सकती. इसलिए मूल्यांकन बाद में और 'परीक्षाओं से सीखना’ पहली प्राथमिकता होनी चाहिए.
● लेकिन लोगों ने मान लिया है कि मार्क्स ही आपकी प्रतिभा का पैमाना हैं...
चौथी-पांचवीं क्लास के बच्चों के पेरेंट्स स्कूलों में जाकर झगड़ा करते हैं कि आपने मेरे बच्चे का आधा नंबर, एक नंबर कैसे काट लिया. इस अज्ञानता को दूर करने के लिए एक सामाजिक क्रांति की जरूरत है. इसमें एक बड़ी भूमिका मीडिया को भी निभानी होगी.

