बातचीत/ अदूर गोपालकृष्णन
दिग्गज फिल्मकार अदूर गोपालकृष्णन भारतीय सिनेमा की एक बड़ी हस्ती हैं, जिन्होंने पिछले पांच दशकों में न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पुरस्कार जीते हैं बल्कि वे अपने गृह राज्य केरल के लिए एक तरह के सांस्कृतिक राजदूत रहे हैं. इस अवधि में 81 वर्षीय इस लेखक-निर्देशक ने विश्वचर्चित एलिपथायम और विधेयन समेत 12 फीचर फिल्में और करीब 30 डॉक्युमेंट्री बनाईं. वे 16 बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुके हैं और 2006 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया.
अदूर ने 31 जनवरी को कोट्टयम के के.आर. नारायणन नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ विजुअल साइंस ऐंड आर्ट्स के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. उनका यह कदम प्रतिष्ठित फिल्मकार और प्रशासक शंकर मोहन के इस्तीफे से जुड़ा था, जिन्होंने जातिगत भेदभाव के आरोप को लेकर छात्रों के प्रदर्शन के बाद इंस्टीट्यूट का निदेशक पद छोड़ दिया था. अदूर ने उन हालात को लेकर जीमॉन जैकब से चर्चा की जिनके चलते उनके संस्थान छोड़ने के हालात बने. प्रमुख अंश:
आखिर किन वजहों से आपने कोट्टयम के के.आर. नारायणन नेशनल इंस्टीट्यूट का अध्यक्ष पद छोड़ने का फैसला किया?
और करता भी क्या! मुझे अपनी मान-प्रतिष्ठा बचानी थी. सारी वजहें स्पष्ट करते हुए मैंने पांच पन्ने की चिट्ठी के साथ मुख्यमंत्री को इस्तीफा भेजा था. जातिवाद का आरोप मेरे ऊपर कभी नहीं लगा था. शंकर मोहन का मैंने बचाव किया क्योंकि मैं छात्रों के विरोध के दांवपेच से वाकिफ था.
तीन साल पहले मेरे ही कहने पर शंकर को इंस्टीट्यूट का मुखिया बनाकर लाया गया था. उनके पास अपनी एक दृष्टि थी और इंस्टीट्यूट की एकेडमिक क्वालिटी तथा अनुशासन सुधारने में उनका बड़ा रोल रहा. एकेडमिक और प्रशासनिक स्टाफ के एक तबके ने उनके खिलाफ साजिश की और छात्रों को हड़ताल पर जाने के लिए भड़काया. बाद में उन लोगों ने उन पर दलितों से भेदभाव करने का मसला उठा दिया.
पूर्व आइएएस बी.एस. मावोजी की अध्यक्षता वाले अनुसूचित जाति और जनजाति आयोग ने एक क्लेरिकल स्टाफ के आरोपों और शिकायतों को पूरी तरह से झूठा पाया. शंकर संजीदा आदमी थे और इंस्टीट्यूट को एक अव्वल संस्थान बनाने के लिए उन्होंने तीन साल तक दिलोजान से काम किया. उन पर कीचड़ उछालने का सुनियोजित अभियान चलाया गया और हटाकर जलील किया गया. इससे गलत नजीर कायम हुई और इंस्टीट्यूट की साख को भी बट्टा लगा. इस तरह के हालात में पद छोड़ देना ही मुझे मुनासिब लगा.
आपके ट्रैक रिकॉर्ड और आपकी प्रतिष्ठा से के.आर. नारायणन इंस्टीट्यूट को देश के अव्वल फिल्म संस्थानों में से एक बनाने में मदद मिल सकती थी. आपके इस्तीफे ने इसकी साख को बट्टा लगा दिया. आपको लगता है कि यह एक अप्रिय अध्याय था और हालात इस तरह बिगड़ने से बचाए जा सकते थे?
किसको पड़ी है यहां? कुछ लोग जब किसी संस्थान को तबाह करने पर उतारू ही हो जाएं तो फिर ऐसे ऊंचे आदर्श वाले सपनों की कोई जगह बचती नहीं. केरल में मैं कोई अज्ञात व्यक्ति तो हूं नहीं. मैं गांधीजी सरीखे लोगों के अपनाए मूल्यों में गहरा विश्वास रखता हूं. पूरी जिंदगी मैं अपने पूरे नजरिए और अपने काम में भी सेकुलर रहा हूं.
सत्ता प्रतिष्ठानों के कदमों और घोषणाओं से जब-जब मुझे तकलीफ हुई है तब-तब मैंने आवाज उठाई है. किसी स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था में असंतोष के स्वरों की अहम भूमिका होनी चाहिए. पदों और पुरस्कारों की मुझे कभी कोई चाहत नहीं रही.
मैं अपनी अंतरात्मा की आवाज पर आवाज उठाता हूं. इंस्टीट्यूट के भविष्य के बारे में फैसला करना अब सरकार का काम है. मीडियॉकर लोगों को कुर्सी पर बिठाने से भला किसी संस्थान की प्रतिष्ठा बढ़ी है! किसी भी शैक्षिक संस्थान में राजनीति को तभी न्यौतना चाहिए जब वहां बाकी हर तरह के रास्ते बंद हो गए हों. वह आखिरी उपाय के रूप में इस्तेमाल होना चाहिए.
क्या आपको लगता है कि सियासी दखलअंदाजी सांस्कृतिक जगत के लिए एक बड़ा खतरा है?
यह कोई नई बात नहीं है. जब आप सत्ता में होते हैं तो चाहते हैं कि हर कोई आपकी बात माने या आपकी विचारधारा को स्वीकार करे. अब इस उम्र में तो मैं बस अपने घर पर सुकून से रहते हुए अपने मन का मालिक हो सकता हूं. सोशल मीडिया पर मैं हूं नहीं और न ही कभी इस बारे में सोचा कि मेरे बयान वायरल हुए या नहीं. किसी भी नागरिक को असंतुष्ट होने का अधिकार होना चाहिए. सत्ता में बैठे लोगों के कुछ गलत करने पर हमें उनकी आलोचना का भी अधिकार होना चाहिए. शासन में लोकतांत्रिक भावना का प्रवाह बने रहना चाहिए.
आपने कहा कि आपके पास इंस्टीट्यूट को देश के अव्वल संस्थानों में से एक के रूप में विकसित करने की योजनाएं थीं...
हमने दो साल के सघन पाठ्यक्रम के रूप में कोर्स तैयार किए थे. सभी मॉडर्न उपकरणों वाला प्रोजेक्शन-कम-साउंड मिक्सिंग स्टुडियो बनवाया गया जो अब काम कर रहा है. फिल्म एप्रीसिएशन का प्रोफेसर दुनिया की उम्दा फिल्मों को छात्रों के सामने पेश करेगा. फिल्मों की स्क्रीनिंग के बाद चर्चा सत्र होंगे जिनमें शिक्षक और छात्र फिल्म पर बात करेंगे और इस तरह से उसमें इस्तेमाल टेक्नीक और आर्ट के बारे में और गहरे से जान पाएंगे. इस तरीके से बहुत सारी चीजें सीखी जाती हैं.
हमने अरसे से खाली तमाम पदों पर नियुक्तियां करवाईं और अब देश के कुछ अव्वल टीचर हमारे यहां पढ़ाने वालों में शुमार हैं. उनमें से कुछ तो विश्वस्तरीय हैं और अब भी दुनिया के प्रतिष्ठित संस्थानों में स्पेशल गेस्ट लेक्चर देने जाते हैं. फिल्ममेकिंग की पढ़ाई क्लासरूम में लगने वाली क्लास और किताबों के ज्ञान तक ही महदूद नहीं रहती. फिल्म बनाने वालों को प्रत्यक्ष ज्ञान के लिए बड़े सब्र के साथ बैठकर फिल्में देखनी चाहिए और फिर छात्रों के सर्कल में उन पर बहस होनी चाहिए.
यह शर्म की बात है कि संस्थान के छात्र पढ़ने-जानने से ज्यादा जातिवाद के झूठे और आधारहीन आरोप मढ़ने को लेकर ज्यादा उत्साहित-उत्तेजित हैं. हमारी योजना हर विषय के अव्वल छात्रों को लेकर एक फीचर फिल्म बनाने की भी थी. इस पर पूरा एक साल लगना था और छात्रों को 'एडवांस्ड कोर्स इन फिल्ममेकिंग’ नाम से पोस्ट डिप्लोमा सर्टिफिकेट दिया जाना था. फिल्म का बजट निजी तौर पर जुटाया जाना था. सुनने में यह सब भले कपोल-कल्पना लगे पर सपने तो ऐसे ही आकार लेते हैं.
आपके ऊपर जातिवादी होने का आरोप लगाया उन्होंने. आपको दुख नहीं हुआ?
(हंसते हुए) बिल्कुल नहीं. अंधों को हमेशा अलग-अलग किस्म के कई हाथी दिखाई पड़ते हैं.
फिल्म इंस्टीट्यूट से (पूर्व निदेशक) शंकर को हटाने के लिए सुनियोजित अभियान चलाया गया. इससे गलत मिसाल कायम हुई. मुझे लगा मुझको भी पद छोड़ देना चाहिए
पूरी जिंदगी मैं अपने नजरिए में और अपने काम में धर्मनिरपेक्ष बना रहा हूं. और जिंदगी के इस मुकाम पर मुझे अपने ऊपर लगाए गए जातिवाद के आरोपों की रत्ती भर भी परवाह नहीं.

