आयुष मंत्रालय के जरिए मोदी सरकार देशभर में आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए काम कर रही है. मंत्रालय और सरकार की उपलब्धियों के बारे में आयुष मंत्री श्रीपद येसो नाईक ने इंडिया टुडे के विशेष संवाददाता मंजीत ठाकुर से बातचीत की. पेश हैं मुख्य अंशः
आपकी सरकार के तीन साल से ज्यादा गुजर जाने के बाद आयुर्वेद के क्षेत्र में आयुष मंत्रालय की क्या उपलब्धियां हैं?
आयुष मंत्रालय ने अपने अग्रगामी कार्यक्रम राष्ट्रीय आयुष मिशन (एनएएम) के माध्यम से आयुष सेवाओं तक पहुंच में इजाफा किया है, जिसमें आयुर्वेद भी शामिल है. इसके तहत 8,994 पीएचसी, 2,871 सीएचसी और 506 जिला अस्पतालों में आयुष सुविधाएं रखने में सहयोग दिया गया है. 75 क्लासिकल सूत्रों के लिए वैज्ञानिक सुरक्षा के साक्ष्य और प्रभाव के आंकड़े तैयार किए गए.
दो प्रौद्योगिकी/शोध निष्कर्षों को व्यवहार में उतारकर जनता को 15 फार्मा कंपनियों के माध्यम से उपलब्ध कराया गया है— आयुष 82 मधुमेह के लिए और आयुष एसजी आर्थरायटिस के लिए. इसके अलावा आयुष को कैंसर, मधुमेह, कार्डियो-वस्कुलर संबंधी बीमारियों और हृदयाघात के बचाव तथा नियंत्रण संबंधी राष्ट्रीय कार्यक्रम (एनपीसीडीसीएस) के साथ मिलाकर छह राज्यों में शुरू किया गया है.
मधुमेह की रोकथाम के लिए मिशन मधुमेला की शुरूआत की गई है. पूरे देशभर में आयुर्वेद के माध्यम से स्वास्थ्य रक्षण कार्यक्रम की भी शुरुआत की गई है. विभिन्न राज्यों में 50 बिस्तरों वाले 66 आयुष अस्पतालों के विकास में सहयोग किया गया है.
कितने जिलों में आयुर्वेद उपचार केंद्र हैं? क्या आयुर्वेद को संस्थागत करने की कोई योजना है चूंकि यह बाबाओं और स्थानीय वैद्यों के हाथ में केंद्रित हैं?
देश में 26 केंद्रीय आयुर्वेद संस्थान हैं और उपचार के लिए 2,836 आयुर्वेद के अस्पताल तथा 15,527 डिस्पेंसरियां हैं.
मंत्रालय आयुर्वेद के तृतीयक स्तर के अस्पताल भी खोलने की प्रक्रिया में है और ऐसा एक अस्पताल तथा शिक्षण संस्थान"—ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ आयुर्वेद हाल ही में दिल्ली में खोला गया है.
हम आयुर्वेदिक भस्मों और औषधियों के मानकीकरण की दिशा में कहां तक पहुंचे हैं? आयुर्वेदिक औषधियों की फार्माकोपिया बनाने का काम कहां पहुंचा?
मंत्रालय ने आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी और होमियोपैथी औषधियों के गुणवत्तापूर्ण मानक तैयार करने के लिए फार्माकोपिया कमीशन ऑफ इंडियन मेडिसिन और होमियोपैथी की स्थापना की है. अब तक आयुर्वेदिक फार्माकोपिया ऑफ इंडिया में 600 से ज्यादा आयुर्वेदिक औषधियों के मानक प्रकाशित किए जा चुके हैं.
अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक विशुद्ध वैज्ञानिक शोध से भस्मों की सुरक्षा को तय किया गया है.
परंपरागत आयुर्वेदिक औषधियों के वैश्विक व्यापार में संख्यात्मक प्रगति क्या है? हम कितनी आयुर्वेदिक औषधियों का निर्यात कर रहे हैं?
भारत में परंपरागत आयुर्वेद स्वास्थ्य सेवा का बाजार फिलहाल 24,800 करोड़ रु. का है और माना जा रहा है कि यह 20 फीसदी की चक्रवृद्धि ब्याज दर के हिसाब से बढ़ेगा. आयुष मंत्रालय ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के साथ एक समझौता किया है जो आयुष प्रणाली को अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता और ब्रांडिंग के मामले में मदद देगा तथा आयुष प्रणाली के प्रति जागरूकता फैलाएगा. यह आयुर्वेदिक उत्पादों के निर्यात में और मदद देगा.
पौधों का विश्वकोष यानी हर्बीपीडिया के निर्माण का क्या हुआ?
चिकित्सीय पादपों पर डेटाबेस का आठ वॉल्यूम और चार सीटीडी मोनोग्राफ प्रकाशित हो चुका है.
आयुर्वेदिक औषधियों की गुणवत्ता को हम कैसे नियंत्रित करेंगे?
आयुर्वेदिक औषधियों का नियमन ड्रग्स ऐंड कॉस्मेटिक्स कानून 1940 के तहत होता है जिसे समय-समय पर संशोधित किया जाता है और इसे राज्य सरकारें लागू करती हैं. इसके तहत विनिर्माण के अच्छे तरीके अपनाना अनिवार्य है. सभी राज्यों में प्रयोगशाला में औषधियों के परीक्षण को सशक्त किया गया है.
आयुर्वेद में क्लीनिकल परीक्षण की प्रक्रिया क्या है?
क्लीनिकल परीक्षण 2013 में आयुष की ओर से प्रकाशित एएसयू के लिए जीसीपी दिशानिर्देशों के तहत किए जाते हैं जिसमें 1940 के ड्रग्स ऐंड कॉस्मेटिक्स कानून और नैतिक मसलों के लिए आइसीएमआर दिशानिर्देशों का भी अनुपालन किया जाता है.
आयुर्वेद में शोध और पेटेंट की क्या स्थिति है?
भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वायत्त इकाई सेंट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन आयुर्वेदिक साइंसेज (सीसीआरएएस) ने हाल ही में मधुमेह के लिए दो आयुर्वेदिक औषधियों का विकास किया है. इसके अलावा टाटा कैंसर, आइसीएमआर आदि के साथ मिलकर विभिन्न रोग स्थितियों पर शोध हो रहा है. सीसीआरएएस ने अब तक 17 पेटेंट करवाए हैं. आयुर्वेद शिक्षण के प्रमुख संस्थानों जैसे जयपुर के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद, जामनगर के इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्ट ग्रेजुएट टीचिंग ऐंड रिसर्च और अन्य में शोध गतिविधियां चल रही हैं.

