इन्फोसिस के सह-संस्थापक एन.आर. नारायण मूर्ति ने जिंदगी में वह सब कुछ देखा है: मुट्ठीभर रकम से कारोबार का एक बड़ा साम्राज्य खड़ा करना, वेस्पा स्कूटर की पिछली सीट पर बैठकर सामान बेचने के लिए निकलना, मुनाफा न होने की वजह से जीई (जनरल इलेक्ट्रिक) की डील से इनकार करना, हिंदुस्तान के पहले विशाल सॉफ्टवेयर परिसर की स्थापना, अपनी कंपनी को अमेरिकी स्टॉक एक्सचेंज नैस्डैक में लिस्टिंग कराने वाली हिंदुस्तान की पहली कंपनी बनाना, देश में सर्वश्रेष्ठ कामकाज के मानकों की स्थापना और 6 अरब डॉलर की सालाना आय वाले उपक्रम से सेवानिवृत्ति लेना. चुनौतियों का सामना कर रही इन्फोसिस की मौजूदा सूरतेहाल के मद्देनजर बिजनेस टुडे के एडिटर चैतन्य कालबाग ने मूर्ति के साथ खास बातचीत की जिसके संपादित अंश यहां दिए गए हैं. 66 वर्षीय मूर्ति ने इन्फोसिस के बीते सालों और भविष्य पर विस्तार से बात की और जता दिया कि वे सभी पहलुओं से अब भी उतने ही वाकिफ हैं.
यह बताइए कि इन्फोसिस में अहम कार्यकारी भूमिका से दो साल पहले छुट्टी ले लेने के बाद आप क्या कर रहे हैं? और आपकी नजर में इन्फोसिस कुल मिलाकर कैसा प्रदर्शन कर रही है?
देखिए, मैं अब इसमें सिर्फ एक निवेशक हूं. मैं इसका सबसे बड़ा शेयर होल्डरं. इन्फोसिस एक नए बिजनेस मॉडल इन्फोसिस 3.0 के साथ आया, जिसका मकसद था ऊंचे दर्जे के कारोबार पर ध्यान केंद्रित करना. जब इसे पेश किया गया था उस वक्त पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से गुजर रही थी और ऐसे मुश्किल दौर में कंपनी नए सोच, नए विचारों को लागू करने की कोशिश कर रही थी. मुझे लगता है, इस वजह से उस वक्त इसके लोगों के बीच काफी खींचतान रही होगी.
इसके अलावा, इन्फोसिस की पर कैपिटा रेवेन्यू प्रोडक्टिविटी दूसरी कंपनियों के मुकाबले 20-25 फीसदी ज्यादा रही है. इसलिए, किसी चुनौतीपूर्ण बाजार में ऐसी ऊंची किस्म की रेवेन्यू प्रोडक्टिविटी सेवाओं की बिक्री आसान नहीं, ऐसे बाजार में जो लागत को लेकर बेहद चौकन्ना हो. मुझे लगता है, इन्हीं दो वजहों से पिछले साल इन्फोसिस को चुनौतियों का सामना करना पड़ा. लेकिन पिछली तिमाही में उन्होंने कुछ हद तक बढ़त हासिल कर ली थी.
इस तरह की धारणा तेजी से गहराती जा रही है कि उपभोक्ताओं की ओर कम ध्यान दिया जा रहा है. विश्लेषकों से यही सुनने को मिलता है कि इन्फोसिस के साथ लेन-देन करना बेहद मुश्किल हो गया है.
देखिए, इन्फोसिस कोरे कागज पर दस्तखत कर देने में यकीन नहीं करती. हम हर नियम-कानून समझते हैं. ज्यादातर हिंदुस्तानी कंपनियां कह देती हैं, ''अरे! इसमें क्या है, अभी दस्तखत किए देते हैं. '' वे शायद समझती नहीं कि इससे कितनी बड़ी जिम्मेदारी आ जाती है. दूसरे, हमारा मानना रहा है कि जिन शर्तों पर हम राजी हों, वक्त आने पर उनका पूरा सम्मान करें. हिंदुस्तानी कंपनियों की सबसे बड़ी खामी रही है कि हम सौदों के ब्यौरों को ठीक से देखते भी नहीं.
एक अरसे से इन्फोसिस में सीओओ का पद खाली पड़ा है. ऐसे में कोई स्पष्ट उत्तराधिकारी नहीं दिख रहा.
कंपनी को कुछ इस ढंग से पुनर्व्यवस्थित किया गया है कि बाला (वी. बालकृष्णन), बी.जी. श्रीनिवास और अशोक वेमुरी के बीच पूरी कंपनी कवर हो गई है. इनमें से हर एक इसे एक स्वतंत्र कंपनी के तौर पर लेता है. ऐसे में मैनेजमेंट को सीओओ की जरूरत महसूस नहीं हुई.
उत्तराधिकार के लिए संघर्ष की स्थिति बन सकती है...
इन तीनों में कौन किस तरह का और कैसा काम करते हैं, इसे जानने के पैमाने स्पष्ट हैं. इनमें से जो भी बेहतर करेगा, टीम के लोग उसे चुन लेंगे. संभावित उम्मीदवार तो तीनों हैं.
युवाओं के बीच एंप्लायर के तौर पर इन्फोसिस ब्रांड की छवि थोड़ी धूमिल पड़ रही है.
पिछले दो सालों में कंपनी में इस मुद्दे पर खासी बहस हुई कि क्या ज्वाइन करने जा रहे नौजवानों की नियुक्ति फिलहाल टाल दी जाए? हमने कहा कि उन युवाओं ने चार साल कॉलेज में बिताए, मां-बाप ने उन पर खासे पैसे खर्च किए और हमने जाकर उन्हें नौकरी का ऑफर दिया, अब अगर हम उन्हें नौकरी नहीं देंगे तो बच्चों को घर पर बेकार बैठना होगा. वैसे नियुक्ति को कुछ समय के लिए टालने का हमें हक है. कई कंपनियों ने ऐसा किया भी है. पर हमने तय किया कि हम उन नौजवानों का स्वागत करेंगे. पर सच है कि जब कारोबार मंदा चल रहा हो और आपने 25,000 और भी लोगों की भर्ती कर ली तो उनमें ऐसे लोग भी होंगे जिनके पास करने के लिए कुछ खास नहीं होगा.
बतौर मानद चेयरमैन क्या अब भी आप लोगों से मिलने और बात करने के लिए तैयार हैं?
जी बिलकुल. पर वे मेरे पास आएं और बात करें. मैं जाकर बात नहीं करता. कल ही मैंने एक स्ट्रेटजी कॉन्फ्रेंस में जाकर लेक्चर दिया क्योंकि उन्होंने मुझे बुलाया था. हम सबके घरों में एक कहावत है न कि दादा-दादी को तभी बोलना चाहिए जब उनसे पूछा जाए. नहीं तो उनकी इज्जत नहीं रहेगी. तो इसीलिए मैं उस तरह से व्यवहार करता.
फिर भी देखा जाए तो इन्फोसिस आपके बच्चे के भी बच्चे जैसा है और आप सबसे बड़े शेयर होल्डर हैं. पर ऐसी स्थिति तो बनने वाली नहीं कि वे कहें, 'मि. मूर्ति, वापस आ जाइए. ''
नहीं... नहीं, वे सब बहुत अच्छे और स्मार्ट लोग हैं.
तो आपके हिसाब से ऐसी स्थिति कभी नहीं आएगी कि आधिकारिक तौर पर आपकी जरूरत महसूस हो?
मुझे नहीं लगता, पर भविष्य की कौन जानता है. अहम लोगों के साथ कुछ हो जाए, उनका स्वास्थ्य खराब हो जाए, कौन जानता है? 'कतई नहीं' मैं नहीं कहना चाहता. लेकिन आंकड़ों को देखें; मेरे सामने जो हो रहा है उसे देखें; जो लोग वहां हैं, उन्हें देखें; उनकी प्रतिभा, ऊर्जा और प्रतिबद्धता को देखें तो कह सकते हैं कि मुझे या किसी को भी इन्फोसिस वापस आने की जरूरत नहीं पड़ेगी.
आपने स्ट्रेटजी कॉन्फ्रेंस में भाषण दिया. आज के समय के हिसाब से इन्फोसिस नेतृत्व को आपका क्या सुझाव होगा?
असल में मैंने इस पर बात की कि प्रतिस्पर्धियों के साथ फासले को लगातार बनाए रखना होगा. मैंने कहा कि खेल के सिद्धांतकारों के मुताबिक तो रणनीति यह होनी चाहिए कि जो प्रतिस्पर्धी तुम्हें पछाडऩे की कोशिश कर रहा हो, उसे पछाड़ो. पर मेरा मानना है कि एक ठोस किस्म का फासला पैदा करना चाहिए, जिससे ग्राहकों को बेहतर मुनाफे के लिए बेहतर काम दिया जा सके. मेरे हिसाब से यह फासला बहुत अहमियत रखता है, ग्राहकों को बेहतर मूल्य और बेहतर मुनाफा देना भी बेहद अहम है. मैं समझता कि जब आप विश्लेषण करें तो हमारी डेप्रिसिएशन पॉलिसी और जो हम मुहैया करा रहे हैं, इसके अलावा हर कर्मचारी के प्रशिक्षण पर जो खर्च कर रहे हैं, उसे देखना बहुत महत्वपूर्ण है. उसके बाद आप मुनाफे की गणना करें.
तो आपका कहना है कि डेप्रिसिएशन के आपके नियम बहुत अलग हैं?
हम ज्यादातर टेक्नॉलॉजी को दो साल में डेप्रिसिएट कर देते हैं. सॉफ्टवेयर को हम उसी साल बट्टे खाते में डाल देते हैं. 5,000 रु. से नीचे की किसी भी चीज को हम बट्टे खाते में डाल देते हैं. हम इमारतों की कीमत 28 साल की एक तयशुदा अवधि की बजाए 15 साल में ही कम कर देते हैं. ग्राहकों से अगर हमें 180 दिनों के अंदर पैसे नहीं मिले तब हम और प्रावधान करते हैं. कंपनी में किसी-न-किसी को यह विश्लेषण करना होगा और हमारे सही मुनाफे के बारे में बताना होगा.
और यह बात गौर करने की है कि उन प्रावधानों के बाद कंपनी का मुनाफा अच्छा रहा...
एकदम. यह हमारे खून का ऐसा हिस्सा बन गया है कि सेल्स के हमारे लोग अब कीमतों को कम नहीं करना चाहते, क्योंकि अगर आप कीमत कम करेंगे तो मुनाफा कम हो जाएगा. लिहाजा एक मुश्किल बाजार में बेचना और मुश्किल हो जाएगा. मेरा हमेशा से नजरिया रहा है, मैं टॉप लाइन (कुल बिक्री और राजस्व) की नहीं बल्कि बॉटम लाइन (शुद्ध मुनाफे) की परवाह करता हूं. 2000/2001 में हमें 100 फीसदी की बढ़त मिली थी. 10 या 11 अप्रैल, 2001 को मैंने एक विश्लेषण तैयार किया और मैं 30 फीसदी से ही संतुष्ट था. सबने कहा कि अब क्या होगा? स्टॉक की कीमत गिर जाएगी. मैंने कहा कि मैं इस कंपनी को शेयर की कीमतों पर नहीं चलाता. मैं इस कंपनी को इस आधार पर चलाता कि हम अपने ग्राहकों को कैसे संतुष्ट रख सकते हैं और हमारे कर्मचारी कितने खुश हैं. यही सलाह मैंने (सीईओ एस.डी.) शिबूलाल को भी दी है.

