टीम अण्णा के बिखरने के बावजूद अरविंद केजरीवाल ने हिम्मत नहीं हारी. शांति-प्रशांत भूषण सीडी कांड जैसे कई अहम मौके आए, जब उन्हें लगा कि अब सब कुछ खत्म हो जाएगा. धर्म में बहुत ज्यादा आस्था नहीं रखने वाले केजरीवाल मानते हैं कि कोई अदृश्य शक्ति है जो चीजों को चला रही है. अण्णा का साथ नहीं होने से मायूस केजरीवाल मानते हैं कि वे साथ होते तो बहुत फायदा होता. लेकिन महात्मा गांधी के कथन को आत्मसात कर वे राजनीति के मैदान में उतर चुके हैं और अपनी पार्टी में जस्टिस ए.पी. शाह को पहला लोकपाल बनाया है. पार्टी में किसी के खिलाफ प्राथमिक रिपोर्ट भी आएगी तो उसे पार्टी छोडऩी होगी. दिल्ली विधानसभा उनका पहला चुनावी समर होगा. उन्होंने इंडिया टुडे के प्रमुख संवाददाता संतोष कुमार से अपनी नई पार्टी और राजनीति के अहम मसलों पर विस्तृत बातचीत की. पेश हैं उसके अंशः
नई पार्टी के नाम और गठन की तैयारी पर.
पार्टी के नाम का ऐलान हम 26 नवंबर को ही करेंगे. चूंकि अभी पार्टी के आकार लेने का संक्रमण काल है इसलिए संविधान, पदाधिकारियों के नाम तय करके चुनाव आयोग में पंजीकरण के लिए देना होगा. लेकिन बाद में पदाधिकारियों के लिए बाकायदा चुनाव की प्रक्रिया होगी. केंद्र, राज्य, जिला स्तर पर कमेटियां बन रही हैं.
रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ मुहिम पर.
किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों को जागरूक बनाने के लिए जब हमारे पास सबूत आए तो हमने सामने रख दिया. सारी कांग्रेस उन्हें बचाने में लगी है, किसी ने नहीं कहा कि जांच करा लो. जांच में क्या हर्ज है. मुझे नहीं लगता कि इस मामले में कोई जांच होगी.
घोषणा पत्र, उम्मीदवार सब जनता ही तय करेगी. आम सहमति कैसे बनेगी?
बिल्कुल हो सकता है, आम सहमति बनाने के बहुत मॉडल हैं. आने वाले दिनों में हम दिखाएंगे कि कैसे अलग-अलग मुद्दों पर आम सहमति हो सकती है.
रिटेल में एफडीआइ पर क्या राय है?
कुछ बुनियादी मुद्दे हैं जिस पर हमारी प्रतिबद्धता होनी चाहिए. हमलोग कई मुद्दों पर अपनी कमेटी बना रहे हैं, वह कमेटी सभी विरोधाभासी विचारों को ड्राफ्ट में लेकर आएगी. जैसे एफडीआइ इन रिटेल है. इसे कुछ लोग अच्छा तो कुछ खराब मान रहे हैं. मेरा निजी विचार कुछ और हो सकता है. लेकिन कमेटी इन दोनों चीजों को ड्राफ्ट में लेकर आए. उसको हम फिर जनता के बीच में डालें, देश में जगह-जगह चर्चा करवाएं. कम-से-कम अपनी पार्टी के भीतर नीचे तक चर्चा हो. और उसमें जो एक सहमति बनती हुई नजर आए, वह हमारा स्टैंड होना चाहिए. इसके दो फायदे होंगे. एक तो हम वह बोलेंगे जो जनता चाहती है और दूसरा कि बहस होगी तो जनता की भी एक राजनैतिक समझ तैयार होगी.
अल्पसंख्यक आरक्षण और पदोन्नति में आरक्षण पर.
मैंने अभी बताया कि इन सब मुद्दों पर अभी बातचीत चल रही है और इन सब चीजों पर हम लोगों से बातचीत करेंगे.
सत्ता के लिए अन्य दलों से गठबंधन पर.
आपको लगता है कि कोई ऐसी पार्टी है जो इन सब मुद्दों पर वही सोचती है जो हम सोचते हैं. ऐसा दिखता नहीं है, मुश्किल है.
कश्मीर समस्या के समाधान पर.
अभी इस मुद्दे पर चर्चा हो रही है.
भूमि अधिग्रहण नीति क्या हो?
जमीन अधिग्रहण के मुद्दे का बार-बार आंदोलन में जिक्र हुआ था और इस पर हमारा स्टैंड है. हमारा कहना है कि जमीन का बिना जनता की मर्जी के अधिग्रहण नहीं किया जाना चाहिए. पेसा के अंदर ‘कंसल्टेशन’ शब्द लिखा है, हम उससे सहमत नहीं हैं. जनता की मर्जी कैसे सुनिश्चित की जाएगी? ग्राम सभा या मुहल्ला सभा जो हमारी पूरी की पूरी राजनीति का फाउंडेशन है, गांवों के अंदर पंचायत है, ग्राम सभा जो खुला लोकतंत्र है. बिना ग्राम-मुहल्ला सभा की मंजूरी के जमीन अधिग्रहण नहीं होना चाहिए. अगर वह कहती है कि जमीन अधिग्रहण हो तो किन शर्तों पर, वह भी वही तय करे. इसका एक अच्छा उदाहरण देता हूं, लोग कहते हैं विकास नहीं हो पाएगा. छत्तीसगढ़ में एक जिले के अंदर दो कंपनी को अपने प्लांट लगाने थे. 13 आदिवासी गांवों की जमीन जानी थी. पेसा कानून लागू होना था. ‘पेसा’ एक संशोधन है. जिसमें कंस्लटेशन के बिना संभव नहीं है. 13 गांव की साझा मीटिंग हुई. उन्होंने 15 मांगें रखीं, खूबसूरत मांग., पेड़ कटेंगे तो इतने लगेंगे, हर घर से एक रोजगार. रेट भी रिजनेबल था. जो वित्त, प्रकृति, पर्यावरण को लेकर था. सरकार ने उस प्रस्ताव को फाड़कर फेंक दिया और पुलिस भेजकर जमीन अधिग्रहीत कर ली. और वे सारे के सारे गांव नक्सलियों के पास जाकर मिल गए. धरना-प्रदर्शन से कुछ नहीं मिलता. आज अगर एक कंपनी को जमीन चाहिए तो क्यों नहीं सीधे गांव में जाकर बात करे. ग्राम सभा बैठेगी, शर्त रखेगी. यही हमारी नीति और सोच है.
नक्सलवाद से निपटने के तरीके पर.
मुझे लगता है कि आज देश के अंदर बहुत-सी ऐसी ताकतें हैं जो देश को तोडऩे या अलग-थलग करने की कोशिश कर रही हैं. इसकी वजह यह है कि सत्ता का दिल्ली और राज्यों की राजधानी में केंद्रीकरण हो गया है और जनता के पास इनके सामने गिड़गिड़ाने के सिवा कोई चारा नहीं बचा है. स्कूल काम नहीं कर रहा, राशन दुकान काम नहीं कर रहा, अस्पताल काम नहीं कर रहा. कोई काम नहीं करता और आपके पास केवल और केवल गिड़गिड़ाने के सिवाए कोई चारा नहीं बचा है. उसके बाद आदमी थक जाता है, हार जाता है. अगर आप यह सारी ताकत जनता को दे दें, ग्राम सभा को दे दें. स्कूल या अस्पताल चाहिए तो ग्राम सभा तय करे. अगर अपना गांव चलाने की जिम्मेदारी उनको दे दी जाए, केंद्र और राज्य की कुछ पॉलिसी में डायरेक्ट अगर जनता की भागीदारी हो जाए. मुझे लगता है कि इससे अलगाववादियों की ताकत देश में कम हो जाएगी.
महिला आरक्षण पर.
हमने तो अपनी पार्टी के अंदर कमिट किया है कि हमारे एक-तिहाई उम्मीदवार और एक-तिहाई पदाधिकारी महिलाएं होंगी.
उम्मीदवार चयन में जात-पांत पर.
आज की वोट बैंक की राजनीति की वजह से इन पार्टियों ने देश और समाज को धर्म और जाति के आधार पर बुरी तरह से तोड़ दिया है. हमें यह लगता है कि आंदोलन ने एक वो माहौल पैदा किया है जिसकी वजह से काफी हद तक ये दीवारें टूटी हैं. राजनीति ने ही देश को तोड़ा है और हमें लगता है कि राजनीति ही देश को जोड़ सकती है. हम पूरी ईमानदारी के साथ यह कोशिश करेंगे कि इस राजनीति को बदला जाए जो आज देश को तोड़ रही है और जोडऩे की कोशिश की जाए. जब जनचेतना का उभार आता है, जैसे इस आंदोलन के दौरान आया. कई ऐसे भ्रष्टाचारी अधिकारी थे जिनको किसी ने नहीं बोला कि रिश्वत नहीं लीजिए. उनकी आत्मा ने झकझोरा और उन्होंने आकर हमसे कहा कि हमने रिश्वत लेना बंद कर दिया है. उसी तरह से यह चुनाव भी आंदोलन बन जाए, तो मुझे लगता है कि ये दीवारें धीरे-धीरे टूटनी चालू हो जाएंगी. भ्रष्टाचार आज देश के लिए सबसे बड़ा सेक्यूलर मुद्दा है.
चुनावी चंदा जुटाने पर.
पैसे की कभी दिक्कत नहीं होगी. अगर हम पैसे के बल पर चुनाव लड़ेंगे तो हार जाएंगे क्योंकि पैसा, बाहुबल, जाति और धर्म इनके नाम पर चुनाव लडऩा तो उनका अखाड़ा है. अगर उनके अखाड़े में जाकर लड़ेंगे तो हम सब हार जाएंगे, वे तो हमें दो मिनट में हवा में उड़ा देंगे. हमारा अखाड़ा है, आंदोलन, ईमानदारी और पारदर्शिता. अगर हमने उनको अपने अखाड़े में बुला लिया चुनाव लडऩे के लिए और बिना पैसे के, तो वहां वो नहीं टिक पाएंगे. हमारे पास लोग आते हैं काम बंद करके, उम्मीद से. वे देश बदलना चाहते हैं. अगर हर घर से महिलाएं, बच्चे, बूढ़े, जवान निकल पड़ेंगे चुनाव प्रचार के लिए तो पैसा किस लिए चाहिए. इस चुनाव को ही आंदोलन बनाना है.
अण्णा का साथ छूटने पर.
(मायूसी से) बहुत प्रभाव पड़ेगा, इसमें कोई शक नहीं है. अण्णा जी अगर सक्रिय रूप से साथ होते तो काफी फायदा होता और अच्छा रहता.
कपिल सिब्बल के खिलाफ चुनाव लडऩे के अण्णा के सुझाव पर?
मैंने इस बारे में सोचा नहीं है.
राम जन्मभूमि विवाद सुलझने पर.
इसमें अभी पार्टी ने कोई चिंतन नहीं किया है.
राजनीति में सभी खराब हैं, तो आप क्यों कूदे? परिवार की क्या सोच है?
यही कि कीचड़ में जाकर साफ करना पड़ेगा. अभी अपने ऊपर तो विश्वास है क्योंकि इन्कम टैक्स विभाग भी वैसा ही कीचड़ था, पर मुझे छू नहीं पाया. कोई कीचड़ मुझे नहीं छू पाएगा, लेकिन हमारी पार्टी के अंदर ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि अगर कहीं कुछ गड़बड़ी हो तो उसे समुचित ढंग से ठीक किया जा सके, नहीं तो लोगों का विश्वास उठ जाएगा.

