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हां, मुसलमानों के साथ भेदभाव होता है: वजाहत हबीबुल्लाह

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष वजाहत हबीबुल्लाह का मानना है कि मुसलमानों के मामले में पुलिस को संवेदनशील बनाया जाना चाहिए और इसके लिए उसे खास ट्रेनिंग दी जानी चाहिए. हबीबुल्लाह से लोदी एस्टेट स्थित उनके घर पर डिप्टी एसोसिएट एडिटर मोहम्मद वकास की बातचीत के अंश.

अपडेटेड 4 अगस्त , 2012

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष वजाहत हबीबुल्लाह का मानना है कि मुसलमानों के मामले में पुलिस को संवेदनशील बनाया जाना चाहिए और इसके लिए उसे खास ट्रेनिंग दी जानी चाहिए. हबीबुल्लाह से लोदी एस्टेट स्थित उनके घर पर डिप्टी एसोसिएट एडिटर मोहम्मद वकास की बातचीत के अंशः

पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां मुसलमानों के साथ भेदभाव करती हैं?
कमीशन ने अपने तजुर्बे में ऐसा पाया है. खास तौर से जब फिरकावाराना हादसा हो या कोई वाकया हो जिसमें फिरकेवारानियत है तो अकसर पुलिस का विजन एक जाति की तरफ जाता है, यकीनन भेदभाव होता है. कमीशन ने अपने तजुर्बे में ऐसा पाया है. पुलिस के अंदर अकलियत, खासकर मुसलमानों का रिप्रजेंटेशन आबादी के लिहाज से बहुत कम है. सिर्फ चार फीसदी है, और इसमें जम्मू-कश्मीर शामिल नहीं है.
भेदभाव की कोई मिसाल दें.
मक्का मस्जिद में ब्लास्ट के फौरन बाद मीडिया और पुलिसवालों ने नाम बता दिए कि इन लोगों ने ब्लास्ट किया है. पुलिस ने उन्हें फौरन पकड़ लिया. 20-22 लड़कों को काफी वक्त तक हिरासत में रखा और फिर उनसे कनफेशन भी लिया कि हां, यह काम हमने किया है. स्टेट माइनॉरिटी कमीशन ने लीडिंग लॉयर राज मोहन से तहकीकात कराई और पाया कि इनमें से कोई ऐसा लड़का था ही नहीं.
उसी दौरान असीमानंद ने मालेगांव के बारे में कनफेशन कर लिया कि यह मैंने किया है. उसने यह भी कह दिया कि हैदराबाद में भी हमारे लोगों ने ही किया और सारे लोग रिहा हो गए. लेकिन केस खत्म नहीं हुआ. तीन-चार पुलिस अफसरों ने उन बच्चों को टॉर्चर करके उनसे कनफेशन लिया. अदालत के सामने यह मामला आया तो उसने पाया कि इस केस में तो जान ही नहीं है और उसे स्टेट के खिलाफ बगावत नाम दिया. इसमें मक्का मस्जिद का नाम ही नहीं आया. दोषी पुलिसवालों के खिलाफ कार्रवाई के लिए मैंने मुख्यमंत्री (किरण) रेड्डी से बात की लेकिन उन्होंने पुलिसवालों के खिलाफ कार्रवाई करने से इनकार कर दिया.
मुसलमानों की अपराधी छवि बनाने के लिए जिम्मेदार कौन है?
इसके लिए जिम्मेदार पुलिस है. पुलिस की तरबियत से उनकी सोच में बदलाव लाने की जरूरत है. मैं जब गोपालगढ़ गया तो वहां के पुलिस स्टेशन में गुज्‍जर ज्‍यादा थे. वहां मेव की आबादी ज्‍यादा है. गुज्‍जर और मेव में झ्गड़ा हो गया, जाहिर है, गुज्‍जर अपने गुजरों की तरफ चले गए. हालांकि एक सरकारी मुलाजिम के तौर पर कोई मजहब तो होना नहीं चाहिए, हरेक के साथ बराबरी में सुलूक करना चाहिए लेकिन यहां हिंदुस्तान में ऐसा नहीं होता है.
कांग्रेस की हुकूमत में मुसलमानों पर ज्‍यादा जुल्म होता है, मुलायम-मायावती की सरकार में ऐसा नहीं होता?
बिलकुल नहीं. उत्तर प्रदेश के कोसीकलां, प्रतापगढ़ में क्या हुआ, जहां मुलायम सिंह (के बेटे अखिलेश यादव) की सरकार है. सरकार आती जाती हैं. प्रशासनिक ढांचा चलता रहता है. इसमें बदलाव लाना है तो अंदर से लाना होगा. अगर पुलिस में तअस्सुब है तो हर जगह है. उसकी तरबियत में रिविजन की जरूरत है. इसके लिए मैंने चिदंबरम को खत लिखा है.
पश्चिम बंगाल में बेहद कम पढ़े-लिखे लोगों की नौकरी में भी मुसलमान भर्ती नहीं हुए.
पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की 25 फीसदी आबादी है. लेकिन वे सरकारी मलाजमत में सिर्फ चार फीसदी हैं. जादवपुर यूनिवर्सिटी से हमारा लंबा झ्गड़ा चल रहा है. परवेज नाम के शख्स को कमेटी ने रिकमेंड किया लेकिन उसे लेक्चरर नहीं रखा. एक भी आदमी उसमें मुसलमान नहीं है. वहां बहुत तअस्सुब है.

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